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Karnataka News Today: जब अदालत कहे कि कानून के नाम पर गिरफ्तारी सिर्फ सवालिया निशान हैं, तो समझ जाइए यह कोई मामूली फैसला नहीं है. यह आपदा के बीच उम्मीद की किरण है. इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण अध्याय रचा है, जब उसने राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी (NIA) की याचिका खारिज कर दी, जिसमें वह कर्नाटक हाईकोर्ट के जरिये मुस्लिम नौजवान सलीम खान को दी गई जमानत को चुनौती दी थी.
सलीम खान पर आरोप था कि वह 'अल‑हिंद' नाम के एक संगठन से जुड़ा थे, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए साफ किया कि यह अनलॉफुल एक्टिविज प्रिवेंशन एक्ट (UAPA) के तहत 'अल‑हिंद' प्रतिबंध संगठनों की लिस्ट में शामिल नहीं है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां की, जो काफी महत्वपूर्ण है.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस के.वी. विश्वनाथ की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कड़ी टिप्पणी की. सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने आगे कहा कि हाईकोर्ट ने सलीम खान को तब जमानत दी, जब यह साफ हो गया कि सिर्फ मीटिंग में शामिल होना या संगठन से जुड़ना किसी भी तरह से अपराध नहीं है. जबकि संगठन भी प्रतिबंधित नहीं है. इसलिए ऐसे में अकेले सलीम खान की संगठन के साथ बैठक को गैर-कानूनी नहीं ठहराया जा सकता है.
बता दें, जनवरी 2020 में कर्नाटक पुलिस की क्राइम ब्रांच ने कुछ लोगों के खिलाफ UAPA की कई धाराओं के तहत केस दर्ज किया था. बाद में यह मामला NIA को सौंप दिया गया. इस मामले में एक आरोपी सलीम खान को कर्नाटक हाईकोर्ट ने जमानत दे दी थी, क्योंकि उनके खिलाफ सिर्फ इतना ही आरोप था कि वह "अल-हिंद" नाम की एक संगठन की मीटिंग में शामिल हुए थे.
ट्रायल के दौरान कोर्ट ने यह भी देखा कि यह संगठन सरकार की प्रतिबंधित संगठनों की लिस्ट में नहीं है. इसलिए सिर्फ किसी मीटिंग में शामिल होना या कुछ मदद करना, कानूनन अपराध नहीं माना जा सकता है. दूसरी तरफ एक और आरोपी मोहम्मद जैद की जमानत याचिका खारिज कर दी गई, क्योंकि उस पर आरोप था कि वह डार्क वेब के जरिए ISIS जैसे खतरनाक आतंकवादी संगठन के संपर्क में था. इसलिए उसे राहत नहीं दी गई.
NIA ने सलीम खान की जमानत को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया और साफ कर दिया कि इसमें कोई दखल नहीं दिया जाएगा. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि इस केस की सुनवाई दो साल के अंदर पूरी की जाए और किसी आरोपी को बिना ट्रायल के ज्यादा समय तक जेल में न रखा जाए.