SC on Takiya Masjid Demolition Case: उज्जैन की 200 साल पुरानी तकिया मस्जिद के विध्वंस को सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा, अधिग्रहण प्रक्रिया सही, मुआवजा दिया भी दिया गया है. कोर्ट ने मस्जिद के पुनर्निर्माण की मांग की याचिका नामंजूर करते हुए कहा कि अब मामले में दखल की कोई वजह नहीं है.
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Ujjain Takiya Masjid Demolition Case: मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित तकिया मस्जिद को प्रशासन ने बीते दिनों हटा दिया था. इस मामले में मुस्लिम पक्ष ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने दो सौ साल पुरानी मस्जिद के विध्वंस को सही ठहराया था. इसके बाद हाईकोर्ट के आदेश के चुनौती देते हुए मस्जिद में नमाज पढ़ने वाले 13 स्थानीय लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का रूख किया था.
शुक्रवार (7 नवंबर) को देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मुस्लिम पक्ष को काफी निराशा हुई. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की ओर दायर याचिका को खारिज कर दिया. इस याचिका मस्जिद में नमाज पढ़ने वाले 13 स्थानीय लोगों ने मस्जिद को दोबारा बनाने और हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग की थी. याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि 200 साल पुरानी तकिया मस्जिद को महाकाल मंदिर की पार्किंग विस्तार के लिए तोड़ दी गई.
मुस्लिम पक्ष की तरफ से याचिका में यह भी कहा गया कि तकिया मस्जिद को वक्फ बोर्ड में 1985 में रजिस्टर्ड किया गया था. इस मस्जिद का लंबे समय से धार्मिक स्थल के रूप में इस्तेमाल हो रहा था. हालांकि, उज्जैन प्रशासन ने महाकाल मंदिर के पार्किंग के विस्तार का हवाला देते हुए इसे जनवरी 2025 में गिरा दिया था. हैरान करने वाली बात यह कि 200 साल पुरानी मस्जिद के विश्वंस से पहले प्रशासन ने इसे अवैध करार दिया था.
हिंदुस्तान में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि मस्जिद वाली जमीन का अधिग्रहण कानूनी प्रक्रिया के तहत हुआ, प्रभावित पक्षों को मुआवजा भी दिया गया. इसलिए हाईकोर्ट के फैसले में दखलअंदाजी करने की कोई वजह नहीं बनती है. कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून के तहत अधिग्रहण के दौरान मुआवजा देना जरुरी होता है और इस कार्रवाई से पहले इस प्रक्रिया को पूरा किया गया है.
मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ वकील एम.आर. शमशाद ने कोर्ट में दलील दी कि मस्जिद तोड़ने का तरीका गलत था. उन्होंने बेंच के सामने दलीली दी कि हाईकोर्ट ने यह कहकर याचिका खारिज कर दी कि लोग अपने घर या कहीं भी नमाज पढ़ सकते हैं, जो कानूनी रूप से सही तर्क नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि किसी दूसरे धार्मिक स्थल के पार्किंग विस्तार के लिए मस्जिद को तोड़ना गंभीर मामला है.
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने तथ्यों के आधार पर फैसला दिया है, मस्जिद हटाने की प्रक्रिया और मुआवजा दिए जाने को कानून के मुताबिक बताया गया था. जब वकील ने कहा कि मस्जिद का मुआवजा गलत लोगों को दिया गया है, तो अदालत ने कहा कि इसके लिए कानून के मुताबिक अलग से तरकीब मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल किया जा सकता है. कोर्ट ने यह भी नोट किया कि इसी मामले में पहले एक रिट याचिका दाखिल की गई थी, जिसे बाद में वापस ले लिया गया था.
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया था कि मस्जिद को गिराना पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम 1991, वक्फ अधिनियम 1995 और भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 का उल्लंघन है. साथ ही अधिग्रहण प्रक्रिया में गड़बड़ी की गई है और अवैध कब्जाधारियों को मुआवजा देने के दावे भी किए गए थे. इससे पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की सिंगल और डबल बेंच दोनों ने मस्जिद दोबारा बनाने की मांग को खारिज कर दिया था, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, जहां अब याचिका नामंजूर कर दी गई है.