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SC on Benazir Hina Talaq Case: सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय में प्रचलित कुछ तलाक तरीकों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बुधवार को सुनवाई करने पर सहमति जताई है. न्यायमूर्ति सूर्य कांत की अगुवाई वाली बेंच ने दो याचिकाकर्ताओं के तर्क सुनने के बाद मामले की अगली सुनवाई 26 नवंबर तय की है.
मामले की सुनवाई पत्रकार हिना बेनज़ीर की याचिका पर हो रही थी. उन्होंने आरोप लगाया कि उनके पति ने खुद तलाक उच्चारित किए बिना अपने वकील के माध्यम से भेजे गए तलाकनामा से उन्हें तलाक देने की कोशिश की थी. उन्होंने तर्क दिया कि यह तरीका न केवल इस्लामी प्रथाओं के खिलाफ है, बल्कि उनके अधिकारों का भी उल्लंघन है.
उनके वकील ने कोर्ट को बताया कि 11 पन्नों के तलाकनामे पर पति के दस्तखत तक नहीं हैं और तलाकनामा किसी तीसरे शख्स के जरिए दिया गया है. उन्होंने कहा कि इस तरह की प्रक्रिया से उन्हें यह खतरा है कि दूसरे विवाह की स्थिति में उन्हें दो पुरुषों की पत्नी माना जा सकता है.
वकील ने कोर्ट से कहा कि उसकी जिंदगी दांव पर है और दावा किया कि अमान्य तलाक उन्हें ऐसी स्थिति में धकेल सकता है जो बहुपति प्रथा जैसी हो सकती है. कोर्ट को यह भी बताया गया कि हिना के पति ने दूसरी शादी कर ली है और एक बच्चा भी है.
पति की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एम.आर. शमशाद ने कहा कि तलाक का अधिकार किसी और को सौंपना (delegation) इस्लाम में प्रचलित है.
बेंच ने इस प्रथा पर कड़ा रुख दिखाते हुए कहा कि मुद्दा आप दोनों के बीच है, लेकिन यह भेदभावपूर्ण तरीका कैसे विकसित हो गया? कोई किसी को नियुक्त कर देता है. पति अपनी पत्नी को भी प्रतिनिधि बना सकता है, लेकिन वकील उसके लिए तलाक कैसे दे सकता है? क्या वह इतना अहंकारी है कि अपनी पत्नी को सीधा तलाक भी नहीं बोल सकता? महिलाओं की गरिमा का क्या?"
उन्होंने आगे कहा कि पति अपनी जिंदगी आगे बढ़ाकर पत्नी की जिंदगी बर्बाद करने का अधिकार नहीं रखता. कोर्ट ने आश्वासन दिया कि वह इस मामले की गंभीरता से जांच करेगा और कहा कि तलाक-ए-हसन अभी भी मौजूद है, लेकिन हमें देखना होगा कि किस हद तक हस्तक्षेप जरूरी है.
तलाक-ए-बिद्दत (तीन तलाक) के विपरीत, तलाक-ए-हसन में पति पत्नी को एक बार तलाक बोलता है और दोनों तीन महीनों के लिए अलग रहते हैं और इसके बाद दोनों का अगर मन बनता है तो शादी कर सकते हैं. हालांकि तलाक-ए- बिदअत में ऐसा करना मुमकिन नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक करार दिया था.
एक अन्य याचिकाकर्ता नज़री निशा ने व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होकर बताया कि उनके पति ने भी इसी तरह अनियमित तरीके से तलाक देने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि पति के हस्ताक्षर न होने के कारण उन्हें अपने पांच साल के बच्चे के स्कूल एडमिशन, पासपोर्ट और सरकारी योजनाओं में दिक्कतें हो रही हैं. कोर्ट ने उन्हें विस्तृत आवेदन दायर करने को कहा है ताकि बच्चे की शिक्षा और उनकी सुरक्षा के लिए आवश्यक निर्देश जारी किए जा सकें.
सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादी पति को अगली तारीख पर उपस्थित रहने और मान्य व वैध तरीके से तलाक प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है. मामले की अगली सुनवाई 26 नवंबर को होगी, जहां अदालत विभिन्न तलाक प्रथाओं की वैधता की गहन समीक्षा करेगी.