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Delhi News Today: दिल्ली के सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में लगातार उर्दू को भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है. उर्दू जुबान की तरक्की के लिए कई तंजीमें लगातार काम कर रही हैं. कड़ी में उर्दू डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (UDO) दिल्ली स्टेट की बैठक सुईवालान स्थित अल्लामा रफीक ट्रस्ट के कार्यालय में आयोजित की गई है. यह बैठक की UDO चीफ डॉ सैयद अहमद खान की अध्यक्षता में हुई, जिसमें उर्दू को लेकर अहम चर्चा हुई है.
बैठक में मास्टर मकसूद अहमद ने कहा कि दिल्ली के उर्दू मीडियम स्कूलों में उर्दू जुबान के हालात ठीक नहीं हैं. उन्होंने बताया कि स्कूलों के सिलेबस उर्दू में मौजूद हैं. इसके बावजूद साइंस, सोशल स्टडी जैसे सब्जेक्ट की पढ़ाई अंग्रेजी में कराई जा रही है. उन्होंने आगे कहा कि नई शिक्षा नीति 2020 के तहत 14 साल तक के बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा देना अनिवार्य है, लेकिन आम तौर पर बच्चों के माता-पिता दाखिले के समय लापरवाही बरतते हैं. शासन प्रशासन पर उर्दू के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाते हुए मकसूद अहमद ने कहा कि बच्चों के एडमिशन के वक्त स्कूल के अधिकारी उन्हें किसी दूसरी भाषा में पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं और उनके फॉर्म में चिन्हित कर देते हैं.
दिल्ली स्टेट उर्दू डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन के सेक्रेट्री डॉक्टर नज्मुस सहर नज्मी ने कहा कि वाल सिटी में उर्दू जुबान का गायब होना हैरान करने वाला है. हैरान करने वाली वजह यह है कि हर बच्चे के दिलो दिमाग पर उर्दू का प्रभाव है, लेकिन फिर भी स्कूलों में उन्हें उर्दू से दूर किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि वाल सिटी के नेता इस मुद्दे पर बेपरवाह और असंवेदनशील हैं क्योंकि उनके जरिये सभी बैनर और पोस्टर सिर्फ हिंदी में पब्लिश कराए जा रहे हैं, जबकि यह उर्दू और हिंदी दोनों में होने चाहिए.
बैठक में डॉ मुफ्ती जावेद अनवर देहलवी ने कहा कि आज की बैठक में हम उर्दू के प्रचार-प्रसार और तरक्की के लिए जमीनी स्तर पर अभियान चलाने का संकल्प लेते हैं. खास तौर से स्थानीय नेताओं और जिम्मेदार हस्तियों से मिलकर उन्हें उर्दू के प्रति बेरुखी छोड़ने के लिए मनाया जाएगा. उन्होंने कहा कि उर्दू ने क़िला मौली से निकलकर न सिर्फ भारत में बल्कि विदेशों में भी अपनी पहचान बनाई और एक दूसरे राब्ता करने वाली जुबान बनी. इसलिए उर्दू के बचाव और तरक्की के लिए हरमुमकिन कोशिस करना हमारी जिम्मेदारी है.
सहारा छपी रिपोर्ट के मुताबिक, डॉक्टर मुफ्ती जावेद अनवर देहलवी ने यह भी कहा कि उर्दू अब दिल्ली की दूसरी सरकारी भाषा का दर्जा प्राप्त कर चुकी है. इसलिए संविधान के मुताबिक हम सरकार से गुजारिश करते हैं कि उर्दू के प्रचार-प्रसार के लिए स्थापित संस्थाओं, खासतौर पर उर्दू अकादमी, को एक्टिव बनाया जाए और खाली पदों को जल्द से जल्द भरा जाए.
एक्सपर्ट की यह राय आकंड़ो की कसौटी पर सही भी हैं. भारत में उर्दू पढ़ने वालों की संख्या लगातार घट रही है. जनगणना और अन्य रिपोर्टों के मुताबिक, 1991 में 5 फीसदी से ज्यादा लोगों की मातृभाषा उर्दू थी, जो 2011 तक घटकर 4.19 फीसदी रह गई. जुबानों के एक्सपर्ट की मानें तो 2021 में यह आंकड़ा और गिरकर 4 फीसदी से नीचे पहुंच चुकी है.
सबसे अहम बात यह है कि उर्दू बोलने वालों में भी उर्दू स्क्रिप्ट पढ़ने वालों की संख्या कम है. उत्तर भारत के राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार में यह गिरावट जाहिर है. साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, सिर्फ 28 फीसदी मुस्लिम समुदाय ने उर्दू को मातृभाषा बताया, जबकि बाकी हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की ओर झुक गए. शिक्षा के स्तर पर भी उर्दू की स्थिति कमजोर हुई है. उत्तर प्रदेश में 1990 के दशक में जहां 2,000 से ज्यादा उर्दू मीडियम स्कूल थे, वहीं 2011 में यह संख्या घटकर करीब 1,296 रह गई.
नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज (NCPUL) के मुताबिक 2020 में 60 फीसदी उर्दू शिक्षक पद खाली थे. मीडिया और पब्लिशिंग के सेक्टर में भी उर्दू पिछड़ रही है. उर्दू अखबारों और साहित्यिक प्रकाशनों की संख्या लगातार घट रही है. रिपोर्ट्स की मानें तो साल 2000 की तुलना में 2025 तक उर्दू साहित्यिक प्रकाशन 50 फीसदी तक कम हो गए. डिजिटल स्पेस में भी उर्दू की मौजूदगी बहुत कमजोर है.