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एक ही सफ में खड़े हो गए महमूद व अयाज,
न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा नवाज!
शायर अल्लामा इकबाल का ये शेर, इस बात की तस्दीक और तारीफ करता है कि इस्लाम में समानता है. यहाँ इंसान-इंसान के बीच कोई भेदभाव नहीं है. कोई VIP नहीं है. नमाज़ में एक ही साफ में मालिक और नौकर सब साथ खड़े हो जाते हैं. इस्लाम में धार्मिक आधार पर जात-पात, निम्न और श्रेष्ट का कोई विभाजन नहीं है. दुनिया का हर इंसान एक है, भले ही उसका रंग, रूप, और हैसियत जो भी हो. कल कयामत के दिन अल्लाह अपने बन्दों का आमाल (कर्म) देखेगा, और फिर उसके ठिकाने का फैसला करेगा. लेकिन ये समानता सिर्फ कुरान, हदीस और उलेमा की तकरीरों तक महदूद है. मस्जिद से बाहर निकलते ही लोग 72 फिरकों, जात- बिरादरी, अमीर-गरीब और यहाँ तक कि पुरवारी और पछियारी मोहल्ले तक में बंट जाते हैं. मस्जिदों से बाहर निकलते ही इस्लाम की बराबरी को भुला दिया जाता है.
यहाँ तक कि कई गांवों में अलग- अलग मोहल्ले, जात- बिरादरियों और मस्लकों की अलहिदा मस्जिदें बना ली गई है. अलग- अलग कब्रिस्तान बना लिए गए हैं. अगर आपको हमारी बातों पर यकीन न हो तो देश की राजधानी दिल्ली से 150 किमी दूर शामली जिले के कांधला थाना क्षेत्र के कांधला कस्बा आ जाइए. यहाँ की आबादी में वैसे तो 36 बिरादरियों के लोग रहते हैं. लेकिन अगर मुसलमानों की बात करें तो शेख, सैयद, पठान, त्यागी, राजपूत समेत इलाके में पसमांदा समझे जाने वाले और सरकारी दस्तावजों के मुताबिक ओबीसी माने जाने वाली अंसारी और कुछ अन्य मुस्लिम बिरादरी के लोग भी रहते हैं.
इलाके के अंसारी बिरादरी के लोगों का इलज़ाम है कि कस्बे के कुछ दबंग किस्म के पठान जीते जी तो उन्हें इज्ज़त नहीं देते हैं, मरने के बाद भी उनकी लाशों के साथ भेदभाव करते हैं. अपने कब्रिस्तान में उन्हें दफनाने तक नहीं देते हैं. कब्रिस्तान में ताला लगाकर रखते हैं, और अशराफ मुसलमानों के अलावा किसी दूसरी बिरादरी के मुर्दों को वहां दफनाने नहीं देते हैं.
मंगलवार को कसबे के अंसारी और शाह बिरादरी के लोगों ने पठानों के खिलाफ कब्रिस्तान पर ही धरना- प्रदर्शन कर दिया. उनकी मांग है कि इस कब्रिस्तान को सभी के लिए खोल दिया जाए. कसबे के रकीब अंसारी कहते हैं, " 15 सालों से पठानों ने कब्रिस्तान पर ताला लगा रखा है. हम गरीब लोगों के मुर्दे यहाँ दफ्न नहीं होते हैं, जबकि ये कब्रिस्तान सरकारी ज़मीन पर है, और सरकार ने गरीब- गुरबों के लिए कब्रिस्तान के नाम पर ये ज़मीन दी हुई है. अगर हम किसी दूसरे कब्रिस्तान में जाते हैं तो वहां हमें लाश दफनाने के लिए पैसे देने होते हैं."
धरना देने पहुंचे हाशिम अंसारी कहते हैं, " हम लोग स्थानीय थाना पुलिस, एसडीएम कैराना और जिला अधिकारी से लेकर मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ और डीजीपी तक से शिकायत कर चुके हैं, लेकिन पठान जाति के लोगो पर कोई कार्रवाई नहीं होती है. हमें मरने के बाद भी इन्साफ नहीं मिलता है."
इलाके के मुस्लिम राजपूत जाकिर राणा कहते हैं, " यहाँ शेख, सैयद, पठान के अलग कब्रिस्तान हैं, जबकि मुस्लिम राजपूतों का अपना अलग कब्रिस्तान है. जिस कब्रिस्तान को लकर विवाद है, उसका एक हिस्सा खाली है, जो अंसारी और दीगर पसमांदा तबकों के लिए है. लेकिन कब्रिस्तान के बाकी हिस्से की घेराबंदी कर उसमें ताला लगा है, जो सिर्फ ऊंची बिरादरियों के लिए सुरक्षित है."
मंगलवार को कसबे में आपसी टकराव की संभावना को देखते हुए जिलाधिकारी अरविन्द कुमार चौहान के निर्देश पर तहसीलदार और इलाके के थाना प्रभारी ने मौके पर पहुंचकर लोगों को समझा- बुझाकर मामले को शांत करा दिया है. अफसरों ने आश्वासन दिया है कि शनिवार को लगने वाले जनता दरबार में दोनों पक्षों को एक साथ बैठाकर इस मामले का हल कर दिया जाएगा. पुलिस और प्रशासन के दखल से अगर इस मामले का हल हो भी जाता है, तो एक सवाल तो रह ही जाएगा कि क्या इस्लाम और पैगम्बर मुहम्मद का खुद को आशिक बताने वाले मुसलमानों का यही असली चरित्र है कि एक मुसलमान को इस लिए अपने कब्रिस्तानों से खदेड़ दे कि वो उसकी जात- बिरादरी और बराबरी का नहीं है?
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