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Vande Mataram Controversy: मुत्ताहिदा मजलिस-ए-उलेमा (MMU), जो जम्मू-कश्मीर के अहम मुस्लिम तंजीमों का एक ग्रुप है और जिसकी अगुवाई मीरवाइज उमर फारूक कर रहे हैं, उसने बुधवार को कहा कि वंदे मातरम गाना या उसका पाठ करना इस्लाम के मुताबिक गैर-इस्लामी है, क्योंकि इसमें ऐसे भाव हैं जो इस्लाम के मूल सिद्धांत, अल्लाह एक है के खिलाफ एकदम उलट है.
MMU का यह बयान जम्मू-कश्मीर प्रशासन के उस निर्देश के बाद आया है, जिसमें सभी स्कूलों को 7 नवंबर को 'वंदे मातरम' के 150 वर्ष पूरे होने के मौके पर संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने को कहा गया है.
MMU ने अपने बयान में कहा कि इस्लाम किसी ऐसे काम की इजाजत नहीं देता जिसमें खुदा के अलावा किसी और की पूजा की जाए. MMU ने उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और पूर्व मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला से अपील की कि इस जबरदस्ती वाले आदेश को वापस लिया जाए.
राष्ट्रगीत का दर्जा
बयान में कहा गया,"मुस्लिम छात्रों या संस्थानों को ऐसे आयोजनों में शामिल करने के लिए मजबूर करना, जो उनके धार्मिक विश्वास के खिलाफ हों, नाइंसाफी और अस्वीकार्य है." 1 अक्टूबर को केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल ने पूरे भारत में 'वंदे मातरम' के 150 साल पूरे होने का जश्न मनाने का फैसला लिया था. संविधान सभा ने बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के जरिए बनाए गए रचित वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया था.
बता दें, वंदेमातरम का विरोध आज से नहीं सालों से होता आया है. इसके पीछे वजह तौहीद है. मुसलमान एक ईश्वर में यकीन रखते हैं, वहीं इस गीत में देश को एक गॉडेस या मां के तौर पर पेश किया जाता है. मुसलमानों का मानना है कि यह उनका वतन है.