Nitish Kumar Iftar Party: हर साल रमज़ान के दौरान बिहार में मुख्यमंत्री आवास पर भव्य इफ्तार पार्टी का आयोजन किया जाता है, जिसमें मुस्लिम समाज के बड़े-बड़े रहनुमा, उलेमा, बुद्धिजीवी और राजनीतिक चेहरे शामिल होते हैं, लेकिन इस इस साल कई संगठनों ने बहिष्कार का ऐलान किया है.
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Nitish Kumar Iftar Party: बिहार की राजनीति में एक बार फिर भूचाल आ गया है. राज्य के सात प्रमुख मुस्लिम संगठनों - इमारत-ए-शरिया, जमात-ए-इस्लामी, जमात अहले हदीस, खानकाह मोजिबिया, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीयत उलेमा-ए-हिंद और खानकाह रहमानी द्वारा राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की इफ्तार पार्टी का बहिष्कार करने की घोषणा ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है. इन संगठनों का कहना है कि यह फैसला पूरी सूझबूझ और रणनीति के साथ लिया गया है.
इन मुस्लिम संगठनों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर आरोप लगाया है कि वे "मुंह में राम और बगल में छुरी" वाली राजनीति कर रहे हैं. इल्जाम है कि नीतीश कुमार ने हाल ही में वक्फ संशोधन विधेयक (Waqf Amendment Bill) का समर्थन किया, जिससे मुस्लिम समाज के धार्मिक और संपत्ति अधिकारों पर खतरा मंडरा रहा है.
सिर्फ वक्फ संशोधन विधेयक ही नहीं, बल्कि इससे पहले भी नीतीश कुमार कई मौकों पर बीजेपी के साथ खड़े नजर आए हैं. इनमें नागरिकता संशोधन कानून (CAA), तीन तलाक कानून और अन्य विवादास्पद फैसले शामिल हैं. इन कानूनों को मुस्लिम समाज के खिलाफ बताया जाता रहा है, और नीतीश कुमार के समर्थन को लेकर मुसलमानों में लंबे समय से नाराजगी थी.
हर साल रमज़ान के दौरान मुख्यमंत्री आवास पर भव्य इफ्तार पार्टी का आयोजन किया जाता है, जिसमें मुस्लिम समाज के बड़े-बड़े रहनुमा, उलेमा, बुद्धिजीवी और राजनीतिक चेहरे शामिल होते हैं. यह एक तरह से सरकार और मुस्लिम समाज के बीच संवाद का मंच बनता था लेकिन इस बार सात बड़े संगठनों ने बहिष्कार का फैसला लेकर साफ संदेश दिया है कि अब मुसलमान सिर्फ दिखावे की राजनीति नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत बदलाव चाहते हैं.
मुस्लिम संगठनों का कहना है कि जब नीतीश कुमार वक्फ विधेयक की मुखालफत तक नहीं कर सकते, जब वे CAA जैसे मुस्लिम विरोधी कानून पर भाजपा के साथ खड़े रहते हैं, तो फिर उनके साथ बैठकर इफ्तार करने का कोई मतलब नहीं है.
नीतीश कुमार पर सियासी भरोसेमंदी का संकट
नीतीश कुमार की राजनीति पर हमेशा से 'बदलाव की राजनीति' यानी पलटी मारने की आदत के आरोप लगते रहे हैं. वे कभी बीजेपी के साथ रहते हैं, तो कभी महागठबंधन में चले जाते हैं. इस वजह से उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे हैं.
मुस्लिम संगठनों के मुताबिक, वक्फ संशोधन बिल के मामले में जब तीन अलग-अलग मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल उनसे मिले, तो उन्होंने किसी को भी आश्वासन नहीं दिया कि वे इस विधेयक की मुखालफत करेंगे. इससे यह साबित होता है कि नीतीश कुमार की प्राथमिकता सिर्फ सत्ता बचाए रखना है, न कि मुस्लिम समाज के हकों की रक्षा करना.
मुस्लिम नेताओं का भी बहिष्कार हो
इन 7 संगठनों ने न सिर्फ नीतीश कुमार की इफ्तार पार्टी का बहिष्कार किया, बल्कि उन मुस्लिम नेताओं के खिलाफ भी नाराजगी जाहिर की जो सरकार में रहते हुए नीतीश कुमार की 'वफादारी' कर रहे हैं और मुस्लिम समाज के हितों की अनदेखी कर रहे हैं. मुस्लिम समाज के नेताओं का कहना है कि ऐसे चेयरमैन और पदाधिकारी जो नीतीश सरकार में बने रहकर उनके फैसलों का समर्थन कर रहे हैं, उनका भी सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए.
बिहार की सियासत पर असर
इस बहिष्कार का बिहार की राजनीति पर दूरगामी असर पड़ सकता है. बिहार में मुस्लिम मतदाता एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, और 17 फीसद से ज्यादा आबादी होने के कारण यह किसी भी दल के लिए अनदेखा करने योग्य नहीं है. राज्य में मुस्लिम वोट परंपरागत रूप से राजद, कांग्रेस और वाम दलों की तरफ झुका रहा है, लेकिन जदयू ने भी सालों से एक खास वर्ग का समर्थन हासिल किया हुआ था.
विशेष रूप से, बिहार में 10 से 15 फीसद मुस्लिम मतदाता ऐसे रहे हैं जो नीतीश कुमार की "सेक्युलर छवि" और उनके विकास के दावों के कारण जदयू को वोट देते आए हैं. 2010 के विधानसभा चुनाव में जब जदयू-बीजेपी गठबंधन अपने चरम पर था, तब भी नीतीश कुमार को मुस्लिम समुदाय से अच्छा समर्थन मिला था लेकिन बीते कुछ सालों में जदयू की भाजपा के साथ बढ़ती नजदीकियों, CAA और तीन तलाक कानून जैसे मुद्दों पर उनके स्टैंड और अब वक्फ संशोधन विधेयक के समर्थन ने मुस्लिम मतदाताओं को पूरी तरह असमंजस में डाल दिया है.
अब सात बड़े मुस्लिम संगठनों द्वारा नीतीश कुमार की इफ्तार पार्टी के बहिष्कार करने का ऐलान किया है कि मुस्लिम समुदाय में उनके प्रति भारी असंतोष पनप रहा है. इस बात की प्रबल संभावना है कि जो 10 से 15 फीसद मुस्लिम मतदाता अब तक जदयू को समर्थन देते थे, वे पूरी तरह से राजद के पक्ष में शिफ्ट हो जाएंगे.
अगर यह बदलाव होता है, तो इसका असर आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में साफ दिख सकता है. मुस्लिम और यादव (MY) समीकरण पहले से ही राजद की राजनीति की रीढ़ रहा है. अगर मुस्लिम वोट बैंक पूरी तरह से जदयू से कटकर राजद के पक्ष में चला जाता है, तो यह जदयू के लिए एक बड़े सियासी झटके से कम नहीं होगा.
अब तक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार या उनकी पार्टी जदयू की ओर से इस बहिष्कार पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जदयू के मुस्लिम नेता जल्द ही इस मुद्दे पर सफाई दे सकते हैं और नुकसान को नियंत्रित करने की कोशिश कर सकते हैं. हालांकि, सवाल यह है कि क्या महज सफाई देने से मुस्लिम समाज का भरोसा वापस आ जाएगा?