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Why Muslims refuse to chant Vande Mataram: राष्ट्रगीत 'वन्दे मातरम्' की तखलीक के 150 साल मुकम्मल होने पर सरकार इसका जश्न मना रही है. तमाम सरकारी दफ्तरों और स्कूल कालेजों में इसे गाये जाने को अनिवार्य बना रही है. सरकार के इन फरमान के साथ ही एक बाद फिर मुल्क का मुसलमान निशाने पर आ गया है. सवाल उठाये जा रहे हैं कि आखिर मुल्क का मुसलमान वन्दे मातरम् गाने से क्यों परहेज कर रहा है ? इसे गाने से क्यों इनकार कर रहा है ? इसे गाने में आखिर इस्लाम में टकराव का बिंदु कहाँ है और क्या है ? इसकी संवैधानिक स्थिति क्या है? क्या इसे गाया जाना कानूनन या संवैधानिक तौर पर बाध्यकारी है?
वन्दे मातरम क्या है ?
वन्दे मातरम् (Vande Mataram) भारत का एक राष्ट्रीय गीत है. इसे बंगाली लेखक बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास 'आनंदमठ' (1882) से लिया गया है. पहली बार ये 7 नवंबर, 1875 को बंगाल से छपने वाली एक साहित्यिक पत्रिका 'बंगदर्शन' में छपा था. बाद में इसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के मशहूर उपन्यास आनंदमठ (1882) में इसे शामिल किया गया. बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय एक राष्ट्रवादी लेखक थे और उन्होंने वन्दे मातरम् राष्ट्रवाद की प्रेरणा से लिखा, था जिसका इस्तेमाल स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान क्रांतिकारियों के जरिये लोगों को एकजुट करने और उनमे देशप्रेम की भावना भरने के लिए किया जाता था.
कब मिला राष्ट्रीय गीत का दर्जा?
वंदे मातरम् के पहले दो छंद को पहली बार आज़ादी के पहले ही साल 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया. जब देश आज़ाद हुआ तो 24 जनवरी, 1950 को आज़ाद भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 'जन गण मन' को राष्ट्रीय गान के तौर पर मान्यता देने की घोषणा की थी.
साथ ही ये भी कहा था कि 'वंदे मातरम्' को देश के राष्ट्रीय गीत के तौर पर मान्यता दी जायेगी. हालांकि, देश के मूल संविधान में राष्ट्रीय गीत के तौर पर वन्दे मातरम का कोई जिक्र नहीं किया गया है. लेकिन संविधान के अनुच्छेद 51A(a) के मौलिक कर्त्तव्य में कहा गया है कि देश के नागरिकों से देश के संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गान का सम्मान करने की उम्मीद की जाती है. हालांकि, यहाँ भी राष्ट्रीय गीत के तौर पर वन्दे मातरम को कोई जिक्र नहीं किया गया है.
क्या है ताज़ा विवाद ?
वन्दे मातरम और मुसलमान की आस्था को लेकर विवाद काफी पुराना है. हिन्दू संगठनों के लोग समय- समय पर इसे मुद्दे को उठाते और इसे हवा देते रहे हैं. वो ये प्रचारित करते रहे हैं कि मुसलमान भारत से प्रेम नहीं करते हैं, इसलिए वो वन्दे मातरम का उच्चारण करने से परहेज करते हैं. वहीँ मुसलमानों का कहना है कि वन्दे मातरम से उनके धार्मिक आस्था का टकराव होता है. इसलिए वो इसे गाना नहीं चाहते हैं. ताज़ा विवाद इसलिए हैं कि इस गीत के रचना के 150 साल पूरे हो गए हैं. सरकार ने कहा है कि 7 नवम्बर से 15 नवम्बर तक पूरे एक हफ्ता राष्ट्रीय गीत सप्ताह मनाया जाएगा. इस दौरान देश के तमाम सरकारी स्कूल कालेजों में इसे गाया जाएगा. इसको लेकर तरह-तरह के आयोजन किये जायेंगे. इसके बाद इसे जबरन थोपे जाने पर विवाद शुरू हो गया है.
क्या है वन्दे मातरम का मतलब ?
वन्दे मातरम्। सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्, शस्यश्यामलाम् मातरम्। वन्दे मातरम्।।
शुभ्रज्योत्स्ना पुलकितयामिनीम्, फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीम् सुमधुरभाषिणीम्, सुखदाम् वरदाम् मातरम्। वन्दे मातरम्।।
अर्थ:
माँ, मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ!
तुम जल से परिपूर्ण, फलों से समृद्ध,
मलय पवन से शीतल,
और हरी-भरी फसलों से ढकी हुई हो।
माँ, मैं तुम्हें वंदन करता हूँ!
तुम्हारी रातें चाँदनी से उज्ज्वल और आनंद से भरी हैं,
वृक्षों के पत्ते फूलों से सजे और सुंदर हैं,
तुम हँसती-मुस्कुराती, मधुर वाणी बोलने वाली,
सुख देने वाली, वरदान देने वाली माँ हो।
माँ, मैं तुम्हें वंदन करता हूँ!
'वन्दे मातरम' और इस्लाम के साथ टकराव के बिंदु
मुसलमान मानते हैं कि राष्ट्र गीत में भारत को मां का दर्ज़ा दिया गया है. और इसमें भारत माँ की आड़ में एक तरह से दुर्गा माता का स्तुति गान किया गया है. हिंदूवादी संगठन शुरू से ही भारत के नक़्शे में एक देवी की तस्वीर लगाकर इसे भारत माँ कहते रहे हैं, जिससे मुसलमान आशंका से भर जाते हैं कि वो भारत माता के नाम पर किसी देवी की उपासना या स्तुति गान करते हैं. इसलिए मुसलमान इसे गाने से परहेज करते हैं. क्यों इस्लाम एकेश्वरवाद पर टिका एक मजहब है, जो एक अदृश्य ईश्वर की कल्पना कर उसकी उपासना करता है. उसके अलावा वो किसी भी सत्ता से इनकार करता है. एक देश या फिर माँ की भी पूजा करना इस एकेश्वरवाद के सिद्धांत से टकराव पैदा कर देता है. यहाँ इसमें मां के आगे सर झुकाने और उसकी पूजा करने की बात की जा रही है, जबकि इस्लाम एक अदृश्य ईश्वर/ अल्लाह के सिवा किसी के सामने अपना सर झुकाने/ सजदा करने या पूजा करने से रोकता है.
सुप्रीम कोर्ट का क्या है आदेश ?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक पुराने फैसले में कहा था कि किसी भी व्यक्ति को 'वंदे मातरम' या 'जन गण मन' गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह व्यक्तिगत आस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला है. सर्वोच्च न्यायालय ने ( बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य, 1986) के फैसले में कहा था कि राष्ट्रगान/गीत का अनिवार्य गायन धार्मिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकता है. देश का सबसे बड़ा मुस्लिम इदारा दारुल उलूम देवन्द भी इस मुद्दे पर फतवा जारी कर चुका है कि वन्दे मातरम का उच्चारण करना एक मुसलमान के लिए ठीक नहीं है. ये उसके एक अल्लाह और उसके इबादत के सिद्धांत से टकराव पैदा करता है.
क्या कहते है उलेमा ?
इस मुद्दे पर मुफ़्ती शमशुद्दीन नदवी कहते हैं, "अपने मुल्क से प्यार करना, किसी भी मुसलमान के लिए ईमान का हिस्सा है. हर मुसलमान अपने वतन से प्यार करता है. इसमें उसे किसी तरह के दिखावा करने की ज़रूरत नहीं है. एक मुसलमान 24 घंटे में 5 बार नमाज़ के दौरान 48 बार अपनी मातृभूमि पर अपना सर झुकाता है. ज़मीन का बोसा लेता है, उसे चूमता है, उसपर अपनी नाक रगड़ता है. मरने के बाद इसी मिटटी में दफ्न होकर मिटटी में मिला जाता है. इसके बाद भी क्या उसे वन्दे मातरम बोलकर देशभक्ति साबित करने की कोई ज़रूरत बच जाती है?
आर्टिकल 25 के खिलाफ है ये जबरदस्ती
स्कूलों में 'वंदे मातरम' गाना अनिवार्य करने जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने भी इस मामले पर नाराजगी जाहिर की है. मदनी ने कहा कि वंदे मातरम के कुछ हिस्सों में मातृभूमि को देवी दुर्गा के रूप में पूजा गया है, जो इस्लामी आस्था से मेल नहीं खाता है. मुसलमान सिर्फ एक खुदा की इबादत करते हैं. किसी दूसरे रूप में पूजा करना या देवी-देवता के रूप में वंदना करना हमारे धर्म के खिलाफ है. इसलिए ‘वंदे मातरम’ को अनिवार्य बनाना मुसलमानों की धार्मिक आजादी का हनन है. संविधान का आर्टिकल 25 हर नागरिक को अपने धर्म को मानने और पालन करने की स्वतंत्रता देता है, जबकि आर्टिकल 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है. इस लिहाज से किसी स्टूडेंट्स या नागरिक को किसी गीत या नारे के लिए मजबूर करना संवैधानिक रूप से गलत है.
संविधान सम्मत नहीं है वन्दे मातरम
शिया मुसलमानों के उलेमा मौलाना सैफ अब्बास कहते हैं, " संविधान ने उनका हक दिया है कि वह वंदे मातरम गाए या न गाएं. हम 'जन गण मन' गाते हैं, लेकिन हमारे ऊपर वन्दे मातरम् क्यों थोपा जा रहा है? ये इस्लाम के नियमों के खिलाफ है. इसका देशभक्ति से कोई लेना देना नहीं है. माहौल खराब करने के लिए इस तरह की कंट्रोवर्सी पैदा की जाती है.
वंदे मातरम कोई तराजू नहीं है, जिससे किसी की देशभक्ति को तौला जाए
मदरसों में 'वंदे मातरम' लागू करने और इस बहाने मुसलमानों को टारगेट करने पर, मौलाना शहाबुद्दीन रिज़वी कहा है कि यह जरूरी नहीं है कि जो वंदे मातरम गाए वह देशभक्त है, और जो न गाए वह देशभक्त नहीं है. वंदे मातरम कोई तराजू नहीं है, जिससे किसी की देशभक्ति को तौला जाए. उन्होंने कहा कि हमारे दिल में देशभक्ति कूट-कूट कर भरी है. जब जंगे आजादी में मौका आया था तो हमारे पुरखों ने अपनी जान की कुर्बानी देकर मुल्क को आजाद कराया, लेकिन अब वंदे मातरम गाने को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है. मौलाना ने कहा कि केरल कोर्ट ने एक फैसले में अपना फैसला दिया था कि कोई भी शख्स को किसी भी गाने के लिए गीत के लिए जबरदस्ती नहीं की जा सकती.
क्या सभी मुसलमान करते हैं इसका विरोध ?
वन्दे मातरम गाने का विरोध देश के सभी मुसलमान नहीं करते हैं. अधिकतर लिबरल मुसलमान या राजनीति से जुड़े हुए लोग इसे देशभक्ति प्रदर्शन करने का एक तरीका मानते हैं. उनकी दलील है कि जब इसे कोई राष्ट्रगीत के तौर पर गायेगा तो इससे उसके इस्लामिक मान्यताओं पर कोई विपरीत असर नहीं डालेगा, क्यूंकि इस्लाम में सब कुछ नियत पर निर्भर करता है. अगर किसी मुसलमान का मकसद देश, भारत माता या किसी प्रतीकात्मक दुर्गा माता की स्तुति करना नहीं है, तो फिर उसके इस्लामी अकीदे पर इसका असर कैसे होगा? लेकिन इसके समर्थक भी ये मानते हैं कि किसी भी नागरिक से जबरन वन्दे मातरम् गवाया जाना या उसपर थोपना जायज़ नहीं है. ये कानून सम्मत नहीं है. जिसकी मर्ज़ी है वो गाये जिसकी मर्ज़ी नहीं है, उसे जबरन ऐसा करने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए.
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