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Isa Alaihissalam (Jesus) Story: धार्मिक इतिहास में यह सवाल अक्सर उठता है कि यहूदी परंपरा ने ईसा मसीह और हज़रत मुहम्मद, दोनों की नुबूवत (पैगंबरी) को क्यों स्वीकार नहीं किया. दिलचस्प बात यह है कि अलग-अलग दौर और हालात के बावजूद, दोनों के इनकार की वजहें काफी हद तक एक जैसी बताई जाती हैं. दोनों नबियों ने अपने-अपने समय में धार्मिक पाखंड, गलत अमल और ईश्वर की किताब से दूरी पर सवाल उठाए और लोगों को तौहीद यानी एक ईश्वर की इबादत की ओर बुलाया.
ईसा (अ.स.) को लेकर यहूदी नजरिया
यहूदी मान्यता में आने वाले 'मसीह' की एक अलग तस्वीर थी. उनका मानना था कि मसीह एक शक्तिशाली राजा होगा, जो उन्हें राजनीतिक अत्याचार और गुलामी से मुक्त कराएगा. लेकिन ईसा (अ.स.) एक सादे परिवार में पैदा हुए, उन्होंने साधारण जिंदगी जिया और अपनी रोजी-रोटी के लिए कड़ी मेहनत मशक्कत की. कई स्रोतों के मुताबिक, ईसा (अ.स.) ने अपने खर्चों को चलाने के लिए बढ़ई का काम करते थे.
सबसे अहम बात यह रही कि ईसा (अ.स.) ने उस दौर के धार्मिक नेताओं और आम लोगों को उनके कर्मों पर टोका. उन्होंने धार्मिक ग्रंथों पर सही अमल न करने और दिखावे की इबादत की आलोचना की. यही बात यहूदी धार्मिक नेतृत्व को नागवार गुजरी और उन्होंने ईसा (अ.स.) को स्वीकार करने से इनकार कर दिया.
बाइबल ने क्या कहा?
बाइबल में ऐसे कई बयान मिलते हैं, जिनमें ईसा (अ.स.) यरूशलम और वहां के धार्मिक नेतृत्व पर कड़ी टिप्पणी करते नजर आते हैं. लूका की किताब में ईसा (अ.स.) यरूशलम के विनाश की चेतावनी देते हैं, जबकि मत्ती की किताब में वे यरूशलम को 'नबियों का कातिल' कहते हैं. इन कथनों से यह संकेत मिलता है कि ईसा (अ.स.) और उस दौर के धार्मिक नेतृत्व के बीच गहरा टकराव था.
फरीसी यहूदी ने किया ईसा (अ.स.) का विरोध
यहूदी समुदाय का एक प्रभावशाली धार्मिक समूह फरीसी कहलाता था, जिसका उदय ईसा (अ.स.) से काफी पहले हुआ. धार्मिक इतिहास के मुताबिक, यही समूह ईसा (अ.स.) का कट्टर विरोधी था. मत्ती की किताब में ईसा (अ.स.) ने फरीसियों को 'पाखंडी, अंधे अगुए और चूना-पुती हुई कब्रों' जैसा कहकर संबोधित किया है. यह भाषा बताती है कि विवाद सिर्फ धार्मिक मतभेद का नहीं, बल्कि नैतिक और आचरण से जुड़ा था.
कुरआन में ईसा (अ.स.) का जिक्र
इस्लाम में ईसा (अ.स.) को काफी अहमियत दी गई है. उन्हें न सिर्फ एक पैगंबर, बल्कि अल्लाह का भेजा हुआ नबी कहा गया है. कुरआन में ईसा (अ.स.) को अल्लाह का नबी मानने की पुष्टि की है और उन्हें तौहीद का पैगंबर बताया है. कुरआन की सूरा अल-माइदा (आयत 72) में साफ कहा गया है कि ईसा (अ.स.) ने बनी इसराईल को एक ही ईश्वर की इबादत का आदेश दिया और शिर्क से बचने की चेतावनी दी. इस्लामी दृष्टि में ईसा (अ.स.) का संदेश वही था, जो सभी नबियों का रहा- एक ईश्वर की उपासना और नैतिक जीवन.
हजरत मुहम्मद (स.अ.) को लेकर यहूदी रुख
यहूदी रिवायत हजरत मुहम्मद (स.अ.) को भी नबी के रूप में स्वीकार नहीं करती. ऐतिहासिक और धार्मिक स्रोतों के मुताबिक, इसकी एक वजह यह मानी जाती है कि यहूदी नुबूवत को बनी इसराईल की नस्ल तक सीमित मानते हैं. वहीं, इस्लाम के अनुसार हजरत मुहम्मद (स.अ.) ने भी वही संदेश दिया जो पहले नबियों ने दिया था. तौहीद (ईश्वर की एकता), न्याय और नैतिकता. उन्होंने भी धार्मिक पाखंड और अन्याय पर सवाल उठाए, जिससे उस दौर के कई समुदायों में असहमति पैदा हुई.
इतिहासकारों और धर्मविदों के मुताबिक, ईसा (अ.स.) और हजरत मुहम्मद (स.अ.) दोनों का विरोध किसी एक शख्स के रूप में नहीं, बल्कि उनके संदेश की वजह से हुआ. यह संदेश सत्ता, दिखावे की धार्मिकता और गलत अमल को चुनौती देता था. इसी चुनौती ने उन्हें अपने-अपने समय में विरोध का सामना करने पर मजबूर किया और यहूदी रिवायत में दोनों को नबी के रूप में मानने से इंकार कर दिया.