Ayatollah Ali Khamenei Death: ईरान के सुप्रीम लीडर आयत उल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में जश्न मनाने वालों की बाढ़ आ गई. ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि खामेनेई की भारत से क्या दुश्मनी थी, जो उनकी मौत पर खुलेआम जश्न मनाया जा रहा है और सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली जा रही है. क्या सिर्फ मुस्लिम होने की वजह से किसी की मौत पर खुशी मनाना जायज है और भारत ईरान संबंधों को नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है?
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बीते 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता आयत उल्लाह अली खामेनेई की मौत की खबर सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोगों की प्रतिक्रियाएं देखकर हैरानी हुई. कॉमेंट्स में खुशी वाले इमोजी दिखाई दे रहे हैं, जश्न जैसे भाव दिख रहे हैं. समझ नहीं आता कि आखिर यह खुशी किस बात की है.
हैरानी की बात यह है कि जब वजह पूछी जाती है तो कोई ठोस वजह भी सामने नहीं आता. सिर्फ इतना कि वह मुस्लिम थे. सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ किसी का मुस्लिम होना ही किसी के खिलाफ नफरत या जश्न मनाने का आधार हो सकता है. मैं उन लोगों से सीधा सवाल पूछना चाहती हूं, क्या आयत उल्लाह अली खामेनेई ने कभी भारत के खिलाफ कोई कार्रवाई की? क्या ईरान ने कभी भारत के हितों को नुकसान पहुंचाया? भारत और ईरान के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से कैसे रहे हैं, क्या इसे समझने की कोशिश की गई?
अगर आप खामेनेई की मौत पर जश्न मना रहे हैं, तो क्या आप उन्हीं ताकतों के साथ खड़े हैं जिनके नाम एपस्टीन जैसी घिनौनी फाइलों में दर्ज बताए जाते हैं, जहां मासूम बच्चियों के शोषण और हत्या तक के आरोप लगे हैं? इसकी घिनौनी तस्वीरें भी सामने आई हैं. क्या आप उस डोनाल्ड ट्रंप के साथ खड़े हैं जिसने बार-बार यह दावा किया कि उसने "ऑपरेशन सिंदूर" के दौरान भारत पर दबाव डालकर जंग रुकवाया? जिसने भारत को टैरिफ की धमकियां दीं और यह तक कहा कि भारत के राफेल विमान गिराए गए?
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क्या आप उसी ट्रंप के साथ हैं जिसने भारत को चाबहार पोर्ट से पीछे हटने पर मजबूर किया, जिसने हमें वेनेजुएला से तेल खरीदने से रोका और रूस जैसे हमारे पुराने दोस्त से भी तेल न लेने का दबाव बनाया? क्या आप उस ट्रंप के साथ खड़े हैं जो पूरी दुनिया में अपनी दादागिरी दिखाता है, जो बिना किसी शर्त भारत से अरबों डॉलर की डील कर लेता है, कभी 100 फीसदी, कभी 150 फीसदी, कभी 200 फीसदी टैरिफ की धमकी देता है और खुलेआम कहता है, "टैरिफ हम लेंगे, भारत नहीं?"
वही ट्रंप जो पाकिस्तान के सेना प्रमुख मुनीर को व्हाइट हाउस बुलाकर मेहमाननवाजी करता है. यह भी एक सच्चाई है कि ऐसे जश्न मनाने वालों में से कई लोग खुद को एक खास खास सियासी दल का समर्थक बताते हैं. ऐसे में एक सवाल और उठता है, क्या अटल बिहारी वाजपेयी के समय ईरान के साथ बने रिश्ते गलत थे? क्या 1950 की संधि और 2001 से 2003 के बीच बने रणनीतिक संबंध भी गलत थे?
वह भी ऐसे शख्स की मौत पर जिससे पूछा गया कि वह दुनिया में किस देश की यात्रा करना पसंद करेंगे, तो उन्होंने बड़े फख्र से भारत का नाम लिया, और भारत के लोगों से अजीम मोहब्बत दर्शाते रहे. जिन्होंने अमेरिकी धमकियों और कथित इस्लामी देश पाकिस्तान की मांगों को दरकिनार कर चाबहार पोर्ट भारत को सौंप दिया. मैं सिर्फ इतना जानना चाहती हूं, इस जश्न की असली वजह क्या है? क्या यह सचमुच किसी नीति या राष्ट्रहित पर आधारित है, या फिर सिर्फ अंधी वफादारी दिखाने की कोशिश है?
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