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Israeli Illegal Occupation of Palestine: ग़ज़ा में इजराइली नरसंहार काफी हद तक थम चुकी है. बीते दो सालों में इजराइली हमलों में 68 हजार से ज्यादा फिलिस्तीन के बेगुनाह लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी, जिनमें ज्यादातर औरतें, बुजुर्ग और बच्चे शामिल थे. बाद में इजराइल ने पूरे ग़ज़ा की नाकाबंदी कर दी और यहूदी फौज ने हथियारों के बलबूते फिलिस्तीनियों को उनके घरों से निकाल दिया.
दुनियाभर में ज्यादातर लोग इजराइली के जरिये फिलिस्तीनियों के नरसंहार के लिए हमास को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, जब हमास ने इजराइल में घुसकर 250 से ज्यादा लोगों को बंधक बना लिया. हालांकि, हकीकत इससे कोसों दूर है. इजराइल के लोग यहूदी सरकार की निगरानी में लगातार फिलिस्तीन में अवैध तरीके से कब्जा कर रही हैं, इसके लिए वह उनके घरों में जबरन घुसकर लूटपाट करते हैं और मुसलमानों को उन्हीं के घरों से बेदखल कर देते हैं.
इजराइल ने फिलिस्तीन की लगभग 78 फीसदी जमीन पर 1948 के बाद से अब तक कब्जा कर लिया है. इजराइली अवैध कब्जा और फिलिस्तीनियों के नरसंहार को अमेरिका के साथ दूसरे यूरोपीय देश लगातार सपोर्ट करते रहे हैं. आर्काइव दस्तावेजों से इजराइल के पूर्व राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री शिमोन पेरेस नागरिकता के लिए किए गए आवेदन सामने आने के बाद दुनियाभर में वावेला मच गया.
शिमोन पेरेस को स्ज़िमेल पर्स्की (Szymel Perski) के नाम से भी जाना जाता था. वह इजराइल के पूर्व राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री रह चुके हैं. 1937 में शिनोम पेरेस ने ब्रिटिश मंडेट काल के दौरान फिलिस्तीनी नागरिकता के लिए आवेदन किया था. इन दस्तावेजों को अल जजीरा डॉक्यूमेंट्री ने अपने ऑफिशिलय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से शेयर किया है.
इस दस्तावेज में शिमोन पेरेस के हस्ताक्षर के साथ हाथ से लिखे गये बयान भी हैं. इसमें उन्होंने अपना पेशा कृषि मजदूर बताकर फिलिस्तीनी सरकार के प्रति वफादारी की कसम ली है. उनके हस्ताक्षर के नीचे एक खास तरह की कसम लिखी है, जिसमें कहा गया है, "मैं फिलिस्तीन सरकार के प्रति वफादार और ईमानदार रहूंगा."
अल जजीरा की रिपोर्ट मुताबिक, मूल दस्तावेज इजराइल स्टेट आर्काइव में सुरक्षित है, जो ब्रिटिश मंडेट काल के ऐतिहासिक रिकॉर्ड रखता है. इस फाइल में उनके पहले नाम को स्ज़िमेल से शिमोन में बदलने के अनुरोध का भी रिकॉर्ड है, जिसमें उन्होंने हाथ से लिखा है कि "स्ज़िमेल शिमोन नाम का भ्रष्ट पोलिश रूप है."
अल-जजीरा की यह पोस्ट वायरल होने के बाद दुनियाभर के लोगों की इस पर प्रतिक्रिया मिल रही है. यूजर्स फिलिस्तीनियों के साथ हो रही जुल्म पर सहानुभूति जताते हुए शिमोन पेरेस के बाद के लोगों की भूमिका की जमकर आलोचना कर रहे हैं. इजराइल को परमाणु हथियारों से लैस करने वाले पेरेस को शांति का दूत कहा जाता है, जिसको लेकर लोगों ने सवाल खड़े किए हैं.
मिली जानाकरी के मुताबिक, शिमोन पेरेस का जन्म 1923 में पोलैंड में हुआ था और वे 1930 के दशक में ब्रिटिश मंडेट फिलिस्तीन में आ कर बस गए. उन्होंने आधुनिक इजराइल के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वे दो बार प्रधानमंत्री और बाद में राष्ट्रपति बने और इजराइल के रक्षा और परमाणु कार्यक्रम के विकास में प्रमुख भूमिका निभाई.
साल 1994 में, शिमोन पेरेस ने ओस्लो पीस एग्रीमेंट में अपनी भागीदारी के लिए नोबेल शांति पुरस्कार हासिल किया था. यह पुरस्कार उन्होंने यित्जहाक राबिन और यासिर अराफात के साथ शेयर किया. ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि 1937–1947 के बीच लगभग 67,000 यहूदियों ने फिलिस्तीनी नागरिकता के लिए आवेदन किया.
यहूदियों के जरिये नागरिकता के लिए दिए गए आवेदन में व्यक्तिगत जानकारी, परिवार का विवरण, तस्वीरें और दो स्पांसर्स के नाम शामिल थे. सियासत में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ आवेदनों में स्पांसर्स में ऐसे शख्स भी थे जो बाद में इजराइल के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए, जिनमें भविष्य की प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर, कैबिनेट मंत्री श्लोमो हिलेल, अभिनेत्री हाना रुबिना और लेखक यहूदा बुरला शामिल है.