US Israel Iran War Impact on Indian Economy: अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर भारत पर पड़ सकता है. खाड़ी देशों में रह रहे 90 लाख भारतीय, वहां से आने वाली भारी भरकम विदेशी मुद्रा और कच्चे तेल की सप्लाई खतरे में है. आने वाले दिनों में भारत पर ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.
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Middle East Conflict Impact on Indian: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पूरी दुनिया को जंग में ढकेल दिया है. ट्रंप-नेतन्याहू की नीतियों की वजह से मिडिल ईस्ट जल उठा है. अमेरिका और इजरायल की सख्त रणनीति और ईरान के साथ बढ़ते टकराव ने न सिर्फ पूरे खाड़ी क्षेत्र में, बल्कि पूरी दुनिया में बेचैनी बढ़ा दी है.
डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू की आक्रामक नीतियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ी हुई है, और इस खींचतान का असर अब भारत जैसे देशों पर भी पड़ सकता है, जिनके आर्थिक और मानवीय हित सीधे तौर पर इस इलाके से जुड़े हैं. आलम यह है कि ट्रंप और नेत्याहू के करीबी ही उनकी आलोचना कर रहे हैं. आइये समझते हैं कि कैसे भारत के हितों सीधे टकराव हो रहा है और ऊर्जा जरुरतों पर खतरा मंडरा रहा है.
मिडिल ईस्ट में 90 लाख भारतीय पर मंडराया संकट
दरअसल, भारतीय विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, खाड़ी देशों में करीब 90 लाख भारतीय रहते हैं. इनमें सबसे बड़ी संख्या यूएई में है, जहां 35.7 लाख भारतीय बसे हैं. सऊदी अरब में 24.6 लाख, कुवैत में 10.0 लाख, कतर में 8.4 लाख, ओमान में 6.9 लाख और बहरीन में 3.3 लाख भारतीय रह रहे हैं. इसके अलावा इजराइल में 1.1 लाख और ईरान में दस हजार से ज्यादा भारतीय मौजूद हैं. ऐसे में क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य तनाव या अस्थिरता इन लाखों भारतीय परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर सकती है.
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मिडिल ईस्ट से भारत को मिलती बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा
भारत उन देशों में शामिल है, जहां विदेशों से सबसे ज्यादा रकम भेजी जाती है. वित्त वर्ष 2023-24 में विदेश में बसे भारतीयों से कुल 118.7 बिलियन डॉलर भारत आए. इनमें से करीब 38 फीसदी यानी 44.98 बिलियन डॉलर खाड़ी देशों से भेजे गए. भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, यूएई से 19.2 फीसदी, सऊदी अरब से 6.7 फीसदी, कुवैत से 3.9 फीसदी, कतर से 4.1 फीसदी, ओमान से 2.5 फीसदी और बहरीन से 1.5 फीसदी हिस्सा आता है. यह रकम लाखों परिवारों की इनकम का अहम जरिया है और इसी से उनके घर की रोजी रोटी चलती है.
पेट्रोल डीजल की हो सकती है किल्लत!
ऊर्जा के मोर्चे पर भी भारत की निर्भरता मिडिल ईस्ट साफ दिखाई देती है. भारत अपनी जरूरत का करीब 50 फीसदी कच्चा तेल खाड़ी देशों और इराक से आयात करता है. अप्रैल से दिसंबर 2025 के वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, रूस से 31.5 फीसदी, इराक से 17.9 फीसदी और खाड़ी देशों से 30.3 फीसदी तेल आयात होता है.
इसी तरह दुनिया को जंग के मुंह में धकेलने वाले अमेरिका से 7.8 फीसदी, नाइजीरिया से 3.2 फीसदी और अन्य देशों से 9.2 फीसदी हिस्सा आता है. अगर सिर्फ खाड़ी देशों की हिस्सेदारी देखें तो सऊदी अरब से 13.8 फीसदी, यूएई से 11.5 फीसदी, कुवैत से 3.1 फीसदी, कतर से 1.1 फीसदी और ओमान से 0.9 फीसदी कच्चा तेल भारत आयात करता है.
ऐसे में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी तनातनी सिर्फ क्षेत्रीय सियासत तक सीमित नहीं है. इसका सीधा संबंध भारत के प्रवासी नागरिकों, विदेशी मुद्रा भंडार और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा हुआ है. मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव भारत की अर्थव्यवस्था और रणनीतिक हितों के लिए एक महत्वपूर्ण कारक बना हुआ है. इसके उलट भारत के कई दक्षिणपंथी संगठन मिडिल ईस्ट की जंग पर जश्न मना रहे हैं.
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