All Eyes on Iran: वक़्त तेज़ी से गुज़र रहा है और दुनिया की नज़रें ईरान पर हैं. क्या आज की रात तारीख़ की सबसे भयानक रात होने वाली है? अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप का अल्टीमेटम! वाशिंगटन में रात के 8 और हिंदुस्तान में कल सुबह के 5:30 बजे. ट्रंप ने कहा है, या तो डील करो या बड़े हमलों के लिए तैयार रहो. अब से थोड़ी देर पहले अमेरिका और Israel ने ईरान पर हमले शुरू कर दिए हैं. क्या खार्ग से उठते हुए धुंए वर्ल्ड वार के रास्ते पर निकल चुके हैं? क्या ट्रंप का ब्रिज डे और पावर प्लांट डे ईरान को स्टोन एज में धकेल देगा? क्या ईरान पर जारेहाना हमलों को दुनिया देखती रहेगी या फिर कई और मुल्क इस जंग में कूदेंगे?
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अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर धमकी दी है कि आज रात एक सभ्यता (civilisation) दुनिया से हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगी और फिर कभी वापस नहीं आएगी. मैं ऐसा नहीं चाहता, लेकिन शायद ऐसा हो सकता है. ट्रम्प ने कहा है के ईरान को एक ही रात में ख़त्म किया जा सकता है.
इसी दौरान अमेरिका और इज़रायल ने डेडलाइन से पहले ही ईरान पर ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए हैं. खार्ग आईलैंड के 50 ठिकानों पर अमेरिका ने हमले किए. क़ुम जैसे मुक़द्दस शहर के साथ-साथ कशान के रेलवे ब्रिज पर हमले किए हैं. इसके अलावा नॉर्थ वेसिट ईरान में तबरेज़ और जंज़ान हाईवे ब्रिज पर अमेरिका ने हमले करके अपनी 8 बजे के बाद के हमलों के इरादे ज़ाहिर कर दिए हैं.
हालांकि अमेरिका के वाइस प्रेसिडेंट जे डी वेंस ने कहा है कि ईरान से साथ जारी जंग में अमेरिका ने अपने ज़्यादातर मिलिट्री टारगेट हासिल कर लिए हैं. उन्होंने कहा कि हमें उम्मीद है कि डोनल्ड ट्रंप की तय डेडलाइन तक ईरान की तरफ़ से सीज़फ़ायर को लेकर जवाब आ सकता है.
कल ट्रंप ने भी ये कहा था कि अगर ईरान उनकी दी गई डेडलाइन से पहले अमेरिका से डील करने में नाकाम रहता है, तो वो मंगल की रात भी हो सकती है. ट्रंप की डील के मुताबिक़ ईरान को होर्मुज़ स्ट्रेट खोलना होगा, जहां से दुनिया भर की तेल सप्लाई का 20 फ़ीसदी हिस्सा ट्रांसपोर्ट होता है. ट्रंप की दी गई ये डेडलाइन आज वॉशिंगटन डीसी के वक़्त के मुताबिक़ रात 8 बजे हिंदुस्तानी वक़्त के मुताबिक़ बुध की सुब्ह 5.30 बजे ख़त्म हो रही है.
यानी ट्रंप के दावे के मुताबिक, ईरान में मंगलवार की रात के बाद कुछ भी नहीं बचेगा. ट्रंप ने एक बार फिर अपनी वॉर्निंग दोहराई कि अगर मंगल की तय डेडलाइन तक होर्मुज़ स्ट्रेट नहीं खोला गया, तो अमेरिका ईरान को ख़त्म कर देगा. और आज अमेरिका और Israel ने हमले कर दिए जिस में Kharg island, रेल infrastructure और पुल शामिल हैं.
व्हाइट हाउस में बोलते हुए ट्रंप ने कहा कि उनका मानना है कि ईरान के लीडर अच्छी नीयत से बातचीत कर रहे हैं, लेकिन अब तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं.
इस बीच ईरान ने टेम्परेरी सीज़फ़ायर को ईरान ने ख़ारिज करते हुए मांग की है कि टेम्परेरी सीज़फ़ायर के बजाए जंग को हमेशा के लिए ख़त्म किया जाए. ईरान पर लगे सैंक्शन्स को हटाया जाए. जंग में हुए नुक़ासानात की भरपाई में उसकी मदद की जाए.
ईरान ने सिर्फ़ सीज़फ़ायर की अमेरिकी शर्तों को ख़ारिज ही नहीं किया है, बल्कि ट्रंप की धमकी को भी संजीदगी से लिया है. ईरान अपने सभी न्यूक्लियर साइट्स के लिए हम्यून चेन तैयार कर चुका है. इस हम्यूमन चेन में सभी नौजवान होंगे, जो जमीनी या हवाई हमले की सूरत में ट्रंप की फ़ौज का सामना करेंगे.
अब सवाल है, कि क्या ईरान में अपने टारगेट पूरा करने के लिए ट्रंप क्या कर सकते हैं. हमलों के लिए कौन कौन रास्ते चुन सकते हैं? क्या क्या हो सकता है, अगर हम ट्रंप की जंग के बाद की धमकियों को देखें तो.
हो सकता है कि अमेरिका ईरान के हर बड़े पावर प्लांट को निशाना बनाए. इसका मक़सद होगा पूरे देश की बिजली सप्लाई ठप कर उसे अंधेरे में धकेलना , जिससे न सिर्फ़ मिलिट्री ऑपरेशन बल्कि आम लोगों की ज़िदंगी और कम्युनिकेशन सिस्टम भी पूरी तरह चरमरा जाएगा.
ईरान के वो बड़े-बड़े ब्रिज, जिन पर फ़ौज की गाड़ियाँ दौड़ती हैं, उन्हें गिराने की तैयारी हो. प्लानिंग ये हो कि रास्ते काट दो, ताकि ईरानी फौज एक शहर से दूसरे शहर तक पहुँच ही न पाए. यानी राह में रोड़ा अटका कर जंग लड़ने पर मजबूर करना.
इस वक़्त दुनिया का सबसे बड़ा मसला है स्ट्रेट ऑफ होरमुज़. ईरान ने इसे ब्लॉक कर रखा है. इसके बंद होने से दुनिया पर डिप्लोमैटिक प्रेशर भी बना रहा है ईरान ऐसे में हो सकता है कि अमेरिका इसे अनब्लॉक करने के लिए अपनी पूरी ताक़त झोंक दे. होर्मुज़ पर क़ब्ज़ा करके ईरान के हाथों से एक बड़ा मुद्दा छीन ले.
अमेरिका का हमला ईरान के उन खुफिया अड्डों पर भी हो सकता है. जहाँ ईरान ने अपनी मिसाइलें और ड्रोन छिपा रखता हैं. यहां अमेरिका बड़ा हमला कर सकता है जिससे ईरान के जवाबी हमले की ताक़त ख़त्म हो सकती है.
क्या अमेरिका ईरान पर करेगा न्यूक्लियर अटैक ?
ये भी हो सकता है कि अमेरिका ईरान पर न्यूक्लियर अटैक कर दे, क्योंकि पांच ऐसे सिग्नल मिल रहे हैं जिसे देख कर लगता है कि अमेरिका न्यूक्लियर हमले से भी पीछे नहीं हटेगा.
पहला-
ट्रंप ने कहा- पूरे मुल्क को एक रात में खाक कर सकते हैं.
दूसरा-
ईरान ट्रंप की कोई शर्त मानने को तैयार नहीं है.
तीसरा-
हर दिन की जंग में अमेरिका को 100 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है
चौथा-
ईरान में जमीनी हमला शुरू करने में अमेरिकी फ़ौज हिचकिचा रही है
पांचवां-
होर्मुज का रूट बंद होने से अरब देशों का तेल कारोबार चौपट हो रहा है.
अमेरिका आज की रात ईरान पर हमले के लिए हर ऑप्शन पर सोच सकता है, क्योंकि ईरान अमेरिका की बेजा शर्तों को मानने से इंकार कर रहा है, और अमेरिका को इस जंग में इज़्ज़त के साथ बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिल रहा है. इस 39 दिन की जंग से अमेरिका के सुपरपावर का ताज में कई छेद हो चुके हैं. ऐसे में आज की रात बड़ा हमला करके. अमेरिका अपनी जीत का एलान करे और दुनिया को ये बताने की कोशिश करे की आज भी वहीं सुपरपावर है.आज भी दुनिया में उसकी की चलेगी.
सवाल ये है कि ईरान में अब बचा क्या है, जहां अमेरिका और इज़रायल ने हमला न किया हो? सुप्रीम लीडर के घर से शुरू हुआ ये हमला आम ईरानियों की दहलीज़ तक पहुंच गया है. हालांकि, 28 फ़रवरी को अमेरिका ने हमला करके दुनिया को बताया था कि ये हमले आम ईरानियों की आज़ादी के लिए हैं.ऑपरेशन एपिक फ्यूरी ईरानियों के लिए जम्हूरियत और सुकून का नया सूरज और नई सुब्ह लेकर आया है, लेकिन क्या आज़ादी का रास्ता लाशों के ढेर से होकर गुज़रता है, क्या किसी मुल्क के बच्चों,बुज़ुर्गों, औरतों और बेक़सूर लोगों को मारना आज़ादी. सिविल स्ट्रक्चर को तबाह करना आज़ादी है.अस्पतालों,स्कूलों,यूनिवर्सिटियों और ब्रिज पर हमला करना आज़ादी है.डिसिलेशन प्लांट्स , ऑयल रिफ़ाईनरीज़ और गैस फ़ील्ड पर हमला करना आज़ादी है.
सच तो ये है कि ये हमले ईरान की तरक़्क़ी,तामीर,तालीम और तहज़ीब पर हुए हैं. 28 फरवरी से 6 अप्रैल के बीच की गई बमबारी में 763 स्कूल और 32 यूनिवर्सिटीज़ मलबे के ढेर में तब्दील हो चुकी हैं. सवाल ये उठता है कि क्या इन क्लासरूम्स में मिसाइलें बन रही थीं.क्या इन यूनिवर्सिटीज़ की लाइब्रेरीज़ में फौज की स्ट्रैटजी तैयार होती थीं. जब कलम और किताब पर बम बरसते हैं, तो साफ ज़ाहिर है कि निशाना सिर्फ रिजीम नहीं, बल्कि उस मुल्क की सोच और बुनियाद को खत्म करना है.
जंग का सबसे बेरहम चेहरा तब दिखता है जब बीमारों और लाचारों के ठिकानों को निशाना बनाया जाता है. डेटा के मुताबिक इन 39 दिनों में 9 बड़े अस्पताल और 322 मेडिकल सेंटर्स जिनमें लाइफ़ सेविंग दवाओं की फैक्ट्रियां भी शामिल हैं. ज़मींदोज़ कर दिए गए. जब दवा बनाने वाली फैक्ट्रियां राख हो जाती हैं और अस्पतालों की छतें गिर जाती हैं. तो ये हमला किसी फौज पर नहीं, बल्कि उस ज़िंदगी पर होता है जो जीने की चाह में बीमारियों को मात देने के लिए अस्पतलों के बेड़ जद्दोजेहद कर रहे होते हैं. अब ख़ुद सोचिए कि क्या ये अस्पतला ये मेडिकल सेंटर मिलिट्री बेस थे.
अमेरिका और इज़रायल के हमलों ने 90 हज़ार से ज़्यादा आम ईरानियों के घर उजाड़ दिए हैं. वो छतें,जो नस्लों की यादों और सुकून का ठिकाना थीं. आज सिर्फ मलबे का ढेर हैं. सड़कों पर भटकती हुई औरतें और सहमे हुए बुजुर्ग पूछ रहे हैं कि उनका गुनाह क्या था. जब बेगुनाह शहरियों की रिहाइश को निशाना बनाया जाता है, तो उसे कोलेटरल डैमेज कहकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता. ये सीधा हमला उस अवाम पर है जिसकी आज़ादी का दावा किया जा रहा है.
अमेरिकी हमलों में सिर्फ़ इमारतें, अस्पतला और घर ही बर्बाद नहीं हुए हैं. ईरानी मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक़ 20 हज़ार से ज़्यादा आम लोग अपनी जान गँवा चुके हैं. इनमें हज़ारों बच्चे और बेगुनाह शहरी शामिल हैं. क्या ये 20 हज़ार लोग फौज का हिस्सा थे ? क्या ये मासूम बच्चे सरहद पर बंदूक लेकर खड़े थे? हकीकत ये है कि ये लोग किसी आर्मी बेस में नहीं, बल्कि अपने घरों, बाज़ारों और स्कूलों में मारे गए हैं?
अब सवाल है अमेरिका से, सवाल है ट्रंप से, सवाल है उन लोगों से जिसे ईरान में तानाशाही और ख़ामेनेई में तानाशाह दिखता था. क्या इस तरह के मंज़र इस तरह की बर्बादी ईरान ने 47 सालों में देखी थी? क्या ईरानी अवाम इतने ग़ैर महफ़ूज़ थे ? क्या किसी के घर पर कारोबार पर अस्पताल पर, स्कूल पर अचानक से बम या मिसाइल आ कर गिर जाते थे. शायद ऐसा नहीं था, अमेरिका की ईरानियों के लिए नाम निहाद आज़ादी का नारा ईरानी अवाम के साथ बहुत बड़ा धोखा है. ये ईरान की अज़ादी नहीं, तबाही है, बर्बादी है, ज़ुल्म है, जब्र है. सितम है, जो अमेरिका हर 2 चार सालों में किसी न किसी मुल्क में करता आया है.
तो अब असली सवाल ये उठता है कि जब आयतुल्लाह ख़ामेनेई को मार दिया गया.जब नतांज, इस्फ़हान, फ़ोर्दो, बुशहर और अराक जैसे न्यूक्लियर साइट्सपर बम बरसाकर उनकी कमर तोड़ दी गई, तो फिर ये ज़िद और ये एक रात की आख़िरी तबाही वाली धमकी आख़िर किसलिए? क्या मक़सद वाकई सिर्फ रिजीम चेंज या न्यूक्लियर प्रोग्राम को ख़त्म करना था? सच तो ये है कि ये दावे तो महज़ एक पर्दा हैं, जिसके पीछे असली खेल कुछ और ही चल रहा है. इस पूरी जंग के पीछे जो मास्टरप्लान छिपा है, वो किसी को आज़ादी दिलाने के लिए नहीं, बल्कि दुनिया की रगों में दौड़ने वाला काला सोना यानी तेल और उसके रास्तों पर मुकम्मल कब्ज़े के लिए है.
दरअसल, नेतन्याहू का एक बरसों पुराना ख़्वाब है जिसे न्यू मिडिल ईस्ट का नाम दिया गया था. इस ख़्वाब का सबसे बड़ा हिस्सा है एक ऐसी इपलाइन, जो खाड़ी के मुल्कों के तेल और गैस को सीधे इज़राइल के बंदरगाहों तक लाएगी और वहाँ से मेडिटेरियन सी के रास्ते यूरोप को जाएगी. ट्रंप और नेतन्याहू की ये जोड़ी अच्छी तरह जानती थी कि अगर ईरान से सीधी जंग छिड़ी तो होरमुज़ और बाब-अल-मंदब जैसे समंदरी रास्ते सबसे पहले चोक पॉइंट बनेंगे और बंद हो जाएंगे. यानी दुनिया को एक ऐसे जाल में फँसाया गया जहाँ, समंदर के रास्ते बंद हों और नेतन्याहू की पाइपलाइन ही पूरी दुनिया की ज़रूरत बन जाए.
इस खेल की गहराई को समझिए
होरमुज़ के बंद होने का मतलब है कि दुनिया का 20 से 30 फ़ीसदी तेल सप्लाई रुक जाना. जब समंदर का रास्ता बंद होगा तो इज़राइल के पास वो चाबी होगी जिससे वो पूरे गल्फ़ के तेल और गैस का कंट्रोल टॉवर बन जाएगा. नेतन्याहू का ये इकोनॉमिक कॉरिडोर दरअसल, ईरान के असर को ख़त्म करके इज़राइल को मिडिल ईस्ट का सबसे बड़ा एनर्जी हब बनाना है. ये सिर्फ ज़मीन की जंग नहीं है, ये उस पाइपलाइन की जंग है जो अरब के रेगिस्तानों से निकलकर इज़राइल की सरहदों से होते हुए यूरोप के बाज़ारों तक पहुँचनी है.
जब तक होरमुज़ खुला था, ईरान के पास दुनिया की गर्दन दबाने की ताक़त थी. लेकिन अब उस गर्दन को इज़राइल के हाथ में सौंपने की तैयारी हो रही है. अमेरिका का दावा है कि वो ईरानियों को आज़ाद कर रहा है, लेकिन हकीकत में वो तेल के कुओं पर अपना पहरा बिठा रहा है. इस पूरी तबाही का सबसे बड़ा फायदा अवाम को नहीं, बल्कि उन बड़ी तेल कंपनियों और डिफेंस कॉन्ट्रैक्टर्स को होने वाला है जो इस नई पाइपलाइन और इज़राइल के नए दबदबे से अरबों डॉलर कमाने वाले हैं.
साफ नज़र आ रहा है कि इस जोड़ी ने शतरंज की बिसात बहुत पहले बिछा दी थी. ईरान को उकसाना, उसे जंग में खींचना और फिर आज़ादी के नाम पर उसके इन्फ्रास्ट्रक्चर को मलबे में तब्दील कर देना. ये सब एक बड़े नक्शे का हिस्सा है, जिसे हम न्यूज़ में जंग देख रहे हैं, वो असल में एक कमर्शियल डील है जिसे बारूद और ख़ून से लिखा जा रहा है. ट्रंप की एक रात वाली धमकी दरअसल उस आख़िरी कील की तरह है, जिसके बाद मिडिल ईस्ट के नक्शे पर ईरान का रसूख़ मिट जाएगा और नेतन्याहू का ग्रेटर इज़राइल तेल और गैस की पाइपलाइनों के ज़रिए पूरी दुनिया की तक़दीर और दाम तय करेगा.
एक तरफ जहन्नुम भेजने की धमकी, तो दूसरी तरफ खुदा के ईमान की गवाही. ट्रंप की ये कैसी डिप्लोमेसी है, लेकिन इस शोर के पीछे असली खेल तेल और पाइपलाइन का है, जहाँ लाशों के ढेर पर मुनाफे की इबारत लिखी जा रही है. 20 हज़ार बेगुनाहों की मौत और मलबे में तब्दील होते स्कूल-अस्पताल क्या वाकई आज़ादी का रास्ता हैं. ट्रंप की डेडलाइन खत्म होने में अब कुछ ही घंटे बाकी हैं, क्या कल की सुबह दुनिया एक नए नक्शे के साथ जागेगी या फिर ये जंग अभी पीछा नहीं छोड़ेगी?
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