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Israel News Today: फिलिस्तीनियों का नरसंहार और अवैध कब्जे को छिपाने के लिए इजरायल अपने नापाक मंसूबों से बाज नहीं आ रहा है. वह लगातार बड़ी-कंपनियों का लालच देकर नरसंहार की तस्वीरें छिपाता रहा है. ब्रिटिश अखबार द गार्जियन, इजरायली मैगजीन, 972 प्लस मैगजीन और लोकल कॉल की एक जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है.
इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जब साल 2021 में Google और Amazon ने इजरायली सरकार के साथ 1.2 अरब डॉलर (करीब 10 हजार करोड़ रुपये) का बड़ा क्लाउड कंप्यूटिंग डील साइन की थी. बताया जा रहा है कि उस समय उसमें एक सीक्रेट डील भी शामिल थी, जिसे 'वॉर्निंग मैकेनिज्म' कहा जाता है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह 'वॉर्निंग मैकेनिज्म' एक खुफिया अलर्ट सिस्टम था, जो इन कंपनियों को इस बात के लिए बाध्य करता था कि जब भी वे इजरायल का डेटा किसी विदेशी अदालत या जांच एजेंसी के साथ शेयर करें, तो वे भुगतान के रूप में छिपे हुए संकेत भेजें. इन संकेतों से इज़रायली सरकार को तुरंत जानकारी मिल जाती थी कि उनका डेटा कहां और किसके साथ शेयर किया गया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, इस समझौते को 'प्रोजेक्ट निंबर' नाम दिया गया था. इस प्रोजेक्ट के तहत की जाने वाली सीक्रेट पेमेंट 1,000 से 9,999 शेकेल (लगभग 307 से 3,026 अमेरिकी डॉलर) के बीच रखी जाती थी. पेमेंट की यह राशि विदेशी टेलीफोन डायलिंग कोड्स के मुताबिक तय की जाती थी ताकि यह रकम खुद में एक छिपे संदेश का काम करे.
इजरायली अधिकारियों ने इस विशेष प्रणाली को सुरक्षा का हवाला देते हुए जोड़ा था. उनका मानना था कि Google या Amazon आने वाले दिनों में अपने कर्मचारियों या शेयरधारकों के दबाव में आकर उन उत्पादों या सेवाओं की सप्लाई रोक सकते हैं जो फिलिस्तीनी कब्जे वाले इलाकों में मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ी परियोजनाओं से संबंधित हैं.
रिपोर्ट में बताया गया है कि इस निगरानी प्रणाली को लागू करने के पीछे इजरायली सरकार की एक खास मंशा थी. उन्हें इस बात का भी डर था कि अगर इन कंपनियों ने अपनी सेवाओं की पहुंच सीमित की, तो इससे इजरायल की सुरक्षा और डेटा नियंत्रण प्रणाली प्रभावित हो सकती है. हालांकि, Google और Amazon की क्लाउड ब्रांच ने रिपोर्ट में किए गए सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया. दोनों कंपनियों ने कहा है कि उन्होंने किसी भी तरह की कानूनी जिम्मेदारी से बचने या गुप्त भुगतान जैसी किसी प्रणाली का इस्तेमाल नहीं किया है.
रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि कई कानूनी विशेषज्ञों, जिनमें कुछ पूर्व अमेरिकी अभियोजक भी शामिल हैं, ने इस व्यवस्था को बेहद असामान्य बताया है. उनका कहना था कि इस तरह का सिस्टम न सिर्फ कंपनियों के लिए कानूनी खतरा बन सकता है बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक समझौतों की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़ा करता है.