Iran Supreme Leader Election Process: आयत उल्लाह अली खामनेई की मौत के बाद ईरान में सियासी अस्थिरता पैदा हो गई है. अब दुनिया भर की निगाहें ईरान के नए सुप्रीम लीडर के चुनाव पर टिकी हैं. आइये जानते हैं कैसे होता है सुप्रीम लीडर का चुनाव और ईरान की सियासत में यह पद कितना शक्तिशाली है?
Trending Photos
)
Iran Supreme Leader Election 2026: परमाणु हथियारों की आड़ में अमेरिका और इजरायल के हमले में सुप्रीम लीडर आयत उल्लाह अली खामेनेई (Ayatollah Ali Khamenei) की मौत के बाद ईरान की सत्ता के शिखर पर अचानक सन्नाटा पसर गया है. तीन दशक से ज्यादा समय तक देश की सियासत, सेना और न्याय व्यवस्था पर निर्णायक पकड़ रखने वाले शख्स के जाने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है, ईरान का अगला सुप्रीम लीडर कौन होगा और तब तक सत्ता की बागडोर किसके हाथ में है?
साल 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान के संविधान में 'सुप्रीम लीडर' का पद बनाया गया था. पहले सुप्रीम लीडर आयत उल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी बने. 4 जून 1989 को उनकी मौत के बाद कुछ ही घंटों में आयत उल्लाह अली खामेनेई को दूसरा सुप्रीम लीडर चुन लिया गया. 28 फरवरी 2026 को अपनी मौत तक उन्होंने करीब साढ़े 36 साल इस पद पर रहते हुए ईरान की नीतियों, सेना और न्याय व्यवस्था पर अंतिम अधिकार बनाए रखा.
ईरान में नए सुप्रीम लीडर के चुनाव तक अंतरिम परिषद संभालेगी कामकाज
अब सवाल है, जब तक नया सुप्रीम लीडर नहीं चुना जाता, तब तक क्या होगा? ईरान के संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत एक तीन सदस्यीय अंतरिम परिषद कामकाज संभालती है. इसमें राष्ट्रपति, न्यायपालिका के प्रमुख और संरक्षक परिषद का एक न्यायविद शामिल होता है. इस बार अली रजा अराफी को न्यायविद के रूप में शामिल किया गया है. वह अंतरिम सुप्रीम लीडर होंगे यानी अगले नेता के चयन तक. हालांकि यह परिषद पूरी तरह आजाद नहीं है. इस परिषद को पांच अहम फैसलों के लिए, जैसे सामान्य नीतियां तय करना, जनमत संग्रह कराना, जंग या शांति की घोषणा, राष्ट्रपति पर महाभियोग और शीर्ष सैन्य अधिकारियों की नियुक्ति या बर्खास्तगी, के लिए तीन-चौथाई मंजूरी जरूरी है.
यह भी पढ़ें: कौन बनता है "आयत उल्लाह" और क्यों है इतनी ताकत? जानिए शिया इस्लाम की सबसे बड़ी धार्मिक उपाधि
कैसे होता है ईरान के सुप्रीम लीडर चुनाव?
ईरान में सुप्रीम लीडर का चुनाव सीधे जनता नहीं करती. इसके लिए 88 धर्मगुरुओं की एक संस्था है, जिसे सुप्रीम लीडर परिषद कहा जाता है. इसके सदस्य हर आठ साल में जनता के जरिये चुने जाते हैं. लेकिन यहां एक अहम स्टेज और है, इन 88 सदस्यों के चुनाव में उतरने से पहले हर उम्मीदवार को संरक्षक परिषद की मंजूरी लेनी होती है. संरक्षक परिषद के सदस्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मौजूदा सुप्रीम लीडर के प्रभाव में होते हैं, यानी प्रक्रिया चुनावी भेल ही है, लेकिन ढांचा पूरी तरह संस्थागत नियंत्रण में है. इस पर सुप्रीम लीडर के प्रभाव के आरोप भी लगते रहे हैं.
नए नेता के चुनाव के लिए परिषद की बैठक तभी वैध मानी जाती है जब कम से कम 59 सदस्य मौजूद हों. अगर इतने सदस्य मौजूद हों, तो दो-तिहाई बहुमत यानी 40 वोट नए सुप्रीम लीडर के लिए काफी हैं. संभावित नामों की जांच के लिए एक विशेष आयोग काम करता है, जिसमें संरक्षक परिषद और सुप्रीम लीडर परिषद के सीनियर सदस्य शामिल होते हैं. यही आयोग तय करता है कि कौन शख्स धार्मिक और संवैधानिक रूप से इस पद के योग्य है.
संविधान के मुताबिक सिर्फ "आयत उल्लाह" ही सुप्रीम लीडर बन सकते है, हालांकि अली खामेनेई के समय कानून में बदलाव कर उन्हें यह पद दिया गया था. दरअसल, "आयत उल्लाह" शिया इस्लाम में उच्च धार्मिक पद है, जो इस्लामी कानून और धर्मशास्त्र के विशेषज्ञों को दिया जाता है और कई शिया देशों में इसका प्रभाव महज मजहबी ही नहीं बल्कि सियासी लिहाज से भी देखा जाता है.
यह भी पढ़ें: 'ईरान के सुप्रीम लीडर की शहादत पर चुप्पी...', सोनिया गांधी ने पीएम मोदी पर कसा तंज
सुप्रीम लीडर के पास कितनी होती है शक्ति और विशेषाधिकार?
सवाल यह भी है कि यह पद इतना ताकतवर क्यों है? ईरानी संविधान के अनुच्छेद 57 के तहत सरकार के तीनों अंग, विधायिका, न्यायपालिका और प्रशासन, उम्माह के नेतृत्व और राज्य के संरक्षण में काम करते हैं. वैसे व्यवहार में यह नेतृत्व सुप्रीम लीडर के पास होता है.
इसी तरह सुप्रीम लीडर, संरक्षक परिषद के 12 में से छह सदस्यों की नियुक्ति करता है, चीफ जस्टिस नियुक्त करता है, राष्ट्रीय रणनीति तय करता है, जनमत संग्रह करा सकता है, सभी सशस्त्र बलों के प्रमुख नियुक्त करता है और जंग की घोषणा का अधिकार भी उसी के पास है. राष्ट्रपति चुनाव के बाद विजेता को नियुक्ति पत्र भी उसी के हस्ताक्षर से जारी होता है. जबकि खास परिस्थितियों में वह राष्ट्रपति को पद से हटा भी सकता है.
हालांकि, संविधान में निगरानी और असहमति की गुंजाइश का जिक्र है, लेकिन व्यवहार में सुप्रीम लीडर को इस्लामी क्रांति का प्रतीक माना जाता है. उनके विरोध को अक्सर व्यवस्था के खिलाफ चुनौती के रूप में देखा जाता है. यही वजह है कि इस पद का चुनाव सिर्फ सियासी नहीं, बल्कि धार्मिक और वैचारिक दिशा तय करने वाला फैसला भी होता है.
ईरान पर टिकी हैं भारत समेत दुनिया भर की निगाहें
फिलहाल, ईरान कई मोर्चों पर घिरा नजर आ रहा है. अमेरिकी और इजरायली फौज लगातार ईरान के कई शहरों पर हमले कर रही है. साल 1989 आयत उल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी की मौत के बाद जिस तरह से आनन फानन में अली खामेनेई को सुप्रीम लीडर बनाया गया था. उसी पुराने अनुभव और हालिया परिस्थितियों को मद्देनजर जल्द ही ईरान में नया सुप्रीम लीडर नियुक्त किया जा सकता है.
फिलहाल कागजों पर सत्ता खाली नहीं है. तीन सदस्यीय अंतरिम परिषद जिम्मेदारी संभाले हुए है. लेकिन असली निगाहें ईरान की 88 सदस्यीय परिषद पर टिकी हैं, क्योंकि वही तय करेगी कि ईरान की अगली दिशा क्या होगी, और किसके हाथों में जाएगी देश की सबसे ताकतवर कुर्सी. ईरान के नए सुप्रीम लीडर की नीतियों का भारत पर बड़ असर पड़ेगा. यही वजह है कि सिर्फ ईरान ही नहीं, बल्कि भारत में नए नेता के चुनाव पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं.
यह भी पढ़ें: Iran News: स्कूल हमले के बाद गम में डूबा ईरान, लाखों लोगों ने पढ़ी नमाज़-ए-जनाज़ा