Afghanistan Pakistan Tension: पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव जारी है. इस बीच सवाल उठ रहे हैं कि तालिबान का खुलकर समर्थन करने वाले देश पाकिस्तान और अफगानिस्तान एक-दूसरे पर हमले क्यों कर रहे हैं. इस बीच एक बड़ा खुलासा हुआ है.
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Afghanistan Pakistan Tension: पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच लगातार तनाव बना हुआ है. इस पूरे विवाद की जड़ 2021 में शुरू हुई बताई जाती है, जब पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के तत्कालीन प्रमुख फैज हमीद को काबुल में तालिबान नेताओं के साथ चाय पीते देखा गया था. उस समय इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे. यह तस्वीर उस दौर में पाकिस्तान की तालिबान से करीबी का प्रतीक मानी गई. कई लोगों ने इसे पाकिस्तान की कूटनीतिक सफलता बताया, लेकिन अब वही तस्वीर इस्लामाबाद के लिए परेशानी का कारण बन गई है.
हाल में ही पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा, "काबुल में चाय का प्याला इस्लामाबाद के लिए महंगा साबित हुआ." उनका इशारा इसी 2021 की मुलाकात की तरफ था. डार के मुताबिक, उस वक्त की इमरान खान सरकार ने तालिबान से बहुत जल्दी और बिना सोच-समझ के रिश्ता मजबूत करने की कोशिश की, जिसका नतीजा आज दोनों देशों के तनाव के रूप में दिख रहा है. अब पाकिस्तान की सत्ताधारी पार्टी के प्रवक्ता और रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ भी मानते हैं कि फैज हमीद की काबुल यात्रा एक रणनीतिक भूल थी.
दरअसल, अफगानिस्तान में तालिबान के आने के बाद पाकिस्तान को उम्मीद थी कि वहां से आतंकवाद पर नियंत्रण मिलेगा, लेकिन उलटा हुआ. रिपोर्टों के मुताबिक, साल 2021 के बाद पाकिस्तान में अफगान सीमा से आने वाले आतंकियों की संख्या बढ़ी है और हमलों में भी इजाफा हुआ है. अब मामला सिर्फ सुरक्षा का नहीं, बल्कि जातीय राजनीति का भी बन गया है. पाकिस्तान की राजनीति में पंजाबी बनाम पश्तून का मुद्दा दोबारा उभर आया है. इमरान खान की पश्तून पहचान को कुछ लोग तालिबान के प्रति सहानुभूति से जोड़कर देखते हैं.
असल में पाकिस्तान का अफगानिस्तान के साथ रिश्ता हमेशा से लेन-देन और रणनीतिक हितों पर आधारित रहा है. पहले रूस के खिलाफ, फिर अमेरिका के साथ, पाकिस्तान ने अफगान ताकतों से नजदीकियां बनाई, लेकिन जब तालिबान सत्ता में लौटा, तो वही रिश्ते उसके लिए बोझ बन गए. अब इस्लामाबाद के सामने मुश्किल यह है कि वह तालिबान पर दबाव भी डालना चाहता है और उनसे रिश्ते भी नहीं तोड़ सकता. नतीजा यह है कि दोनों देशों के बीच भरोसे की दीवार कमजोर पड़ गई है और काबुल की वह "एक कप चाय" अब पाकिस्तान की कूटनीतिक भूल का प्रतीक बन चुकी है.