Bazm e mushaira in Delhi: शंकर लाल मुरली धर मेमोरियल सोसाइटी इस साल 5 अप्रैल से नई दिल्ली में 56 वें बज़्म ए- मुशायरा का आयोजन कर रहा है. पूरी जानकारी के लिए नीचे स्क्रॉल करें.
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Delhi News: शंकर लाल मुरली धर मेमोरियल सोसाइटी ने 56वें बज़्म-ए-मुशायरा का आयोजन करने जा रहा है. इस प्रोग्राम को हर साल ऑर्गेनाइज्ड किया जाता है. इसमें उर्दू शायरी की दुनिया के मशहूर शायर शामिल होते हैं. इस प्रोग्राम का इनअकाद उर्दू शायरी और विरासत को मजबूत करने के लिए किया जाता है. मुरली धर मेरोरियल सोसाइटी के मुताबिक इस प्रोग्राम की शुरुआत शनिवार, 5 अप्रैल से नई दिल्ली में की जाएगी.
बता दें कि यह प्रोग्राम साल 1954 से होता आ रहा है. इसी परंपरा के मुताबिक इस साल भी इस प्रोग्राम का आयोजन किया जा रहा है. इस साल इस मुशायरा की मेज़बानी इकबाल अशहर साहब करेंगे. साथ ही इस प्रोग्राम में जावेद अख्तर, प्रो. वसीम बरेलवी, अजहर इकबाल, नोमान शौक, डॉ. गौहर रजा, डॉ. पॉपुलर मेरठी, शबीना अदीब, खुशबीर सिंह शाद जैसे बड़े शायर शिरकत करेंगे.
इस प्रोग्राम का मकसद उर्दू शायरी को बढ़ावा देना है. इसी प्रयास में सोसाइटी ने युवा उर्दू कवियों के लिए एक खास अवसर पेश किया है. इस मंच पर इच्छुक शायर अपनी मौलिक उर्दू रचना पेश करके शंकर शाद शायरी कंपटीशन में हिस्सा ले सकते हैं, जिसके बाद जजों की एक बेंच विजेताओं को चुनेगी, और उसे इनाम दिया जाएगा.
इस प्रोग्राम के बारे में श्री. शंकर लाल मुरली धर सोसाइटी के सद्र और डीसीएम श्रीराम इंडस्ट्रीज लिमिटेड के प्रबंध डाइरेक्टर माधव बंसीधर श्रीराम ने कहा कि शंकर-शाद मुशायरा सिर्फ एक सभा नहीं है, बल्कि अलग-अलग संस्कृति से जुड़े लोगों को एकजुट करने की कोशिश है. उन्होंने कहा कि इतने लोगों को एकजुट करना उर्दू शायरी की बढ़ती ताकत का सबूत है. उन्होंने कहा कि इस प्रोग्राम का मकसद उर्दू कविता साहित्य को बचाने और संरक्षित करने की एक कामयाब कोशिश है. 1954 में पहली बार आयोजित, यह सालाना मुशायरा मशहूर शायरों के लिए एक प्रमुख मंच बन गया है.
पिछले कई सालों से यह प्रोग्राम को जोश मलीहाबादी, कैफ़ी आज़मी, अली सरदार जाफ़री, अहमद फ़राज़, मजरूह सुल्तानपुरी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और जिगर मुरादाबादी जैसे दिग्गजों के साथ-साथ जावेद अख़्तर, प्रो. वसीम बरेलवी, डॉ. गौहर रज़ा, शीन काफ़ निज़ाम, नोमान शौक़, शबीना अदीब और कई दूरे लोगों की मेज़बानी की है. यह प्रोग्राम गंगा-जमुनी तहजीब का मिसाल बन गया है.