इस्लाम में एक ईश्वर पर यकीन (ईमान ) के बाद फ़र्ज़, वाजिब, सुन्नत, नफिल, मुस्तहब, हक़ूक़-उल-इबाद (जैसे कर्ज़ और अमानत) और फिर फ़र्ज़-ए-किफाया जैसे दिशा- निर्देश हैं, जिसका पालन इंसानों कर करना होता है, लेकिन ये बड़ा सवाल है कि किसी कितनी अहमियत दी जाए और इन्हें पूरा करने का क्रम या तरतीब क्या हो? ये बता रहे हैं, मुहम्मद उस्मान एडवोकेट अज़हरी.
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दीन-ए-इस्लाम की सही समझ सिर्फ़ इबादात की तादाद बढ़ाने से नहीं, बल्कि तरजीह (Prioritization) की सही तरतीब से पैदा होती है. तरजीह का मतलब है-हर अमल को उसके दर्जे के मुताबिक जगह देना. यानी जहाँ फ़र्ज़ है, वहाँ फ़र्ज़ को पहले अदा किया जाए, जहाँ हक़ूक़-उल-इबाद हैं, वहाँ उन्हें प्राथमिकता दी जाए, और जहाँ नफ़्ल हैं, वहाँ उन्हें बाद में रखा जाए. यही उसूल इंसान को गुमराही, अतिशयोक्ति और बेतरतीबी से बचाता है.
कुरआन-ए-पाक ने तरजीह के इस उसूल को बहुत साफ़ तरीके से बयान किया है. सूरह आला में इरशाद होता है: “बल्कि तुम दुनिया को तरजीह देते हो, जबकि आख़िरत बेहतर और बाकी रहने वाली है.” यह आयत इंसान की सबसे बड़ी गलती की तरफ इशारा करती है-दुनिया को आख़िरत पर तरजीह देना. इस्लाम की बुनियाद यही है कि हर फैसला आख़िरत (अलौकिक दुनिया) को सामने रखकर किया जाए. अगर तरजीह उलट जाए, तो अमल चाहे कितना भी ज्यादा क्यों न हो, उसका मकसद बिगड़ जाता है.
इसी तरह सूरह नाज़िआत में अल्लाह तआला फरमाता है: “जिसने दुनिया की ज़िंदगी को तरजीह दी, उसका ठिकाना जहन्नम है.” इससे यह उसूल निकलता है कि गुमराही सिर्फ़ गुनाह से नहीं, बल्कि गलत प्राथमिकताओं से भी होती है. जब इंसान दीन के मुकाबले दुनिया को अहमियत देता है, तो धीरे-धीरे उसका रास्ता बदल जाता है.
इसके बरअक्स, कुरआन ने सही तरजीह की एक बुलंद मिसाल भी पेश की है. सूरह हश्र में सहाबा की तारीफ करते हुए फरमाया गया: “वे अपनी जानों पर दूसरों को तरजीह देते हैं, अगरचे उन्हें खुद सख़्त हाजत हो.” यह 'इसार' की वह सूरत है जिसमें इंसान अपने फायदे पर दूसरों के हक़ को तरजीह देता है. यही हक़ूक़-उल-इबाद की असल रूह है और यही असली कामयाबी का रास्ता है.
एक और अहम उसूल सूरह ताहा में मिलता है, जहाँ ईमान वालों ने कहा: “हम तुझे हरगिज़ तरजीह न देंगे उन रोशन दलीलों पर जो हमारे पास आई हैं.” यह आयत बताती है कि हक़ को हर चीज़ पर तरजीह देना जरूरी है-चाहे सामने सत्ता हो, दबाव हो या नुकसान का खतरा.
हदीस शरीफ में भी तरजीह का यही उसूल मिलता है. एक हदीस-ए-कुदसी में आता है कि बंदा अल्लाह का सबसे ज्यादा क़ुर्ब फ़र्ज़ अमल से हासिल करता है. इसका सीधा मतलब है कि नफ़्ल इबादतें, फ़र्ज़ की कमी को पूरा नहीं कर सकतीं. इसी तरह नबी करीम ﷺ ने फरमाया कि सच्चा मुसलमान वह है जिससे दूसरे लोग सुरक्षित रहें. इससे यह समझ आता है कि हक़ूक़-उल-इबाद की अदायगी, सिर्फ़ इबादत से कम अहम नहीं, बल्कि कई मामलों में उससे पहले है.
अइम्मा-ए-दीन ने भी इसी तरतीब को स्पष्ट किया है. इमाम अबू हनीफ़ा ने फ़र्ज़ की पाबंदी को बुनियाद बताया, इमाम ग़ज़ाली ने कहा कि फ़र्ज़ अधूरा हो तो नफ़्ल बेअसर हो जाते हैं, और इमाम अहमद रज़ा ख़ाँ ने साफ़ तौर पर सिखाया कि “शरीअत पहले, फिर रूहानियत।” यह दरअसल तरजीह का ही उसूल है.
तरजीह को समझने के लिए सहाबा के वाक़ियात भी बहुत रोशनी देते हैं. अबू बकर सिद्दीक़ का वाक़िया मशहूर है कि उन्होंने अपना पूरा माल दीन के रास्ते में दे दिया. जब उनसे पूछा गया कि घर वालों के लिए क्या छोड़ा, तो उन्होंने जवाब दिया: “अल्लाह और उसके रसूल.” यह दीन को दुनिया पर तरजीह देने की सबसे ऊँची मिसाल है.
इसी तरह एक सहाबी का वाक़िया है, जिन्होंने मेहमान को खिलाने के लिए खुद भूखा रहना पसंद किया. यह इसार की वह मिसाल है जिसे कुरआन ने सराहा. इससे यह सबक मिलता है कि हक़ूक़-उल-इबाद में दूसरों को अपने ऊपर तरजीह देना, दीन की ऊँची सिफ़त है.
अमली ज़िंदगी में तरजीह की सही तरतीब यह है: सबसे पहले ईमान और आख़िरत को सामने रखा जाए, फिर फ़र्ज़-ए-ऐन (जैसे नमाज़), उसके बाद वाजिब, फिर हक़ूक़-उल-इबाद (जैसे कर्ज़ और अमानत), फिर फ़र्ज़-ए-किफाया, उसके बाद सुन्नत और आखिर में मुस्तहब व नफ़्ल. अगर यह क्रम बिगड़ जाए, तो इंसान नफ़्ल में मशगूल होकर फ़र्ज़ में कोताही करने लगता है, जो कि दीन की समझ के खिलाफ़ है.
सारांश:- तरजीह (क्रम) ही दीन की रूह है, जिसने तरजीह को सही कर लिया, उसने दीन को सही समझ लिया. कुरआन का पैग़ाम साफ़ है "आख़िरत को दुनिया पर, हक़ को हर चीज़ पर, और फ़र्ज़ को हर अमल पर तरजीह दी जाए. यही वह रास्ता है जो इंसान को कामयाबी की तरफ़ ले जाता है".
अल्लाह तआला हमें सही तरजीह समझने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए. आमीन.
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