जम्मू कश्मीर में भांड पाथेर की कदीम रिवायत है. राजा महाराजाओं के ज़माने में दूसरे फनून की तरह इसकी भी पुश्तपनाही की जाती थी.
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श्रीनगर: किसी ज़माने में जम्मू कश्मीर में अवाम की तर्जुमानी के लिए भांड पाथेर को काफी सराहा जाता था. इसे देखने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता था. नाटक, ड्रामे और स्टेज शो से मिलते-जुलते इस फन को जम्मू कश्मीर में भांड पाथेर कहते हैं. जिसमें रिवायती मौसीकी और रक्स का उन्सर भी शामिल रहता है. जम्मू कश्मीर में भांड पाथेर की कदीम रिवायत है. राजा महाराजाओं के ज़माने में दूसरे फनून की तरह इसकी भी पुश्तपनाही की जाती थी. अवाम के लिए ये सिर्फ तफरीह का ही ज़रिया नहीं था. बेल्कि इसके ज़रिये अवामी मसायल से शाही दरबार को आगाह किया जाता था.
मुरव्वजा फन में भांड पाथेर को तंज़ व मजाह और हकीकत पसन्दी का सबसे मुअस्सर ज़रिया समझा जाता था. आजादी के बाद भी लोगों की इस फन के तईं दिलचस्पी कायम रही लेकिन टेक्नॉलिजी के दौर में ये फन तदरीजन पिछड़ता चला गया. ज़राय अब्लाग के मुख्तसिफ ज़रिये वजूद में आने के बाद फनकारों के लिए इसको बचाए रखना खासा मुश्किल हो गया. नई नस्ल की दिलचस्पियों का मरकज़ भी बदल गया. बदलते माहौल में बांड पाथेर के फनकार इस तब्दीली से मुवाफकत नहीं पैदा कर पाए.
हुकूमत की सतह पर इस फन को जिन्दा रखने की कोशिश की जाती है. आर्ट कल्चर अकादमी की जानिब से इसमें बराबर तआवुन किया जाता है लेकिन वो भी तस्लीम करता है कि टेलिविजन और सोशल मीडिया से मुसाबकत करना खासा मुश्किल है. कोरोना बोहरान के सबब कोशिशों के बावजूद वो भांड पाथेर को फरोग देने से कासिर है.
शायकीन की अद्म दिलचस्पी और दूसरी वजूहात के सबब फनकारों की हालत भी खराब है. पुराने फनकार नहीं चाहते हैं उनकी आइंदा नस्लें इस फन को इख्तियार करें. उनका कहना है कि हुकूमत अगर मदद करे तो भांड पाथेर की पुरानी हैसियत वापस लौट सकती है. श्रीनगर से तीस किलोमीटर की दूरी पर वाके ब्लपोपुरा नामी ये गांव भांड पाथेर फनकारों के आस-पास के इलाकों में खासी शोहरत रखता है. इस गांव की हालत भी भांड पाथेर जैसी ही है. फन और इसके फनकारों की तरह लगता है कि इस गांव का भी कोई पुरसांहाल नहीं है.
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