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नई दिल्ली: बिहार विधानसभा चुनाव-2025 के लिए महागठबंधन और NDA खेमे में भले ही सहयोगी दलों के बीच सीटों के बंटवारे का तालमेल अभी नहीं बैठ पाया है, और आपसी खींचतान जारी है, लेकिन इसके बावजूद सभी सहयोगी पार्टियाँ अपने-अपने प्रत्याशियों को टिकट देकर उनका सार्वजनिक ऐलान कर रही है. बुधवार को राजद और जदयू ने प्रत्याशियों की पहली लिस्ट की घोषणा कर दी है. राजद ने अपनी पहली लिस्ट में 31 उमीदवारों के नाम का ऐलान किया है, इसमें पार्टी ने पांच मुस्लिम उमीदवारों को टिकट दिया है, जबकि यादव समाज से 10 लोगों को टिकट दिया है. राजद की पहली लिस्ट में सीवान के कद्दावर राजद नेता और लालू प्रसाद यादव के करीबी रहे मरहूम मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब को रघुनाथपुर सीट से उम्मीदवार बनाया गया है. वहीं, समस्तीपुर से अख्तरुल शाहीन को तीसरी बार टिकट दिया गया है.
जनता दल यूनाइटेड की अगर बात करें तो जदयू ने अपनी पहली लिस्ट में 57 उमीदवारों में एक भी मुस्लिम उमीदवार को टिकट न देकर सभी को चौंका दिया है. हालांकि, जदयू के अभी और उमीदवारों की घोषणा की जानी है, लेकिन लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर पहली लिस्ट में एक भी मुस्लिम उमीदवार का नाम क्यों नहीं है? क्या जदयू अपने सहयोगी भाजपा की राह पर चलने लगी है, क्योंकि भाजपा घोषित तौर पर मुस्लिम उमीदवारों को टिकट न देने के लिए जानी जाती है. लेकिन जदयू की तरफ से मुस्लिम उमीदवारों से इस तरह की दूरी को लोग पचा नहीं पा रहे हैं.
इस तरह बिहार में एनडीए ने अभी तक 134 उम्मीदवारों की सूची जारी की है. इनमें भाजपा, जदयू और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के उम्मीदवार शामिल हैं. जदयू और भाजपा की तरह हम ने भी एक भी मुस्लिम उमीदवार को टिकट नहीं दिया है. इससे साफ़ है कि बिहार में भी एनडीए की रणनीति हिंदू बनाम मुस्लिम की होने वाली है.
अगर 2020 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो इस चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने कुल 243 सीटों पर चुनाव लड़ा है, जिसमें जदयू के खाते में 115 सीटें गयी थी. जदयू ने 115 उमीदवारों में कुल 11 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था. लेकिन उसमे से एक भी उमीदवार जीत नहीं पाया था. ज़्यादातर उमीदवारों को राजद के मुस्लिम उमीदवारों ने शिकश्त दी थी. वहीँ राजद ने कुल 15 मुस्लिम उमीदवारों को टिकट दिया था, जिसमें 8 उमीदवार विजय हुए थे.
बिहार में 2020 में कुल 19 मुस्लिम विधायक जीते थे, जिनमें राजद के 8, मजलिस के 5, कांग्रेस के 4, 1 कम्युनिस्ट का और 1 बसपा का विधायक था. हालांकि, बाद में मजलिस के सीमांचल से जीते हुए चार विधायक राजद में चले गए थे. पिछले चुनाव में भले ही JDU को कोई मुस्लिम उमीदवार न जीता हो लेकिन JDU पसमांदा मुसलमानों को टिकट दिया था, जबकि राजद पर हमेशा से ये इलज़ाम लगते रहे हैं कि वो सिर्फ अशराफ मुसलमानों को टिकट देती है. इन्हीं आरोपों के बीच पिछली विधानसभा चुनाव में राजद ने पहली बार कांटी विधानसभा सीट से इसराइल मंसूरी को टिकट दिया था और जीत के बाद मंसूरी को मंत्री भी बनाया था.
बिहार में हर चुनाव में 10 फीसदी मुस्लिम वोट नितीश कुमार की पार्टी JDU को जाता है, खासकर पसमांदा मुसलमान JDU के वोटर हैं, लेकिन हाल के सालों में केंद्र में तीन तलाक और वक्फ जैसे कानून पर जदयू के केंद्र सरकार को समर्थन देने से उसके मुस्लिम वोटर्स नाराज़ हैं. वरना, मुसलमान का एक वर्ग ये मानकर चलता है कि बिहार में राजद से अच्छा शासन भाजपा के साथ गठबंधन में रहकर भी नितीश कुमार कर रहे हैं, और मुसलमानों का हित भाजपा- जदयू गठबंधन में ज्यादा सुरक्षित है. ऐसा माना जा रहा है कि नितीश कुमार शायद ये समझ गए हो कि इस बार उनका मुस्लिम वोटर्स उनसे छिटक गया है, इसलिए वो खुले तौर पर मुस्लिम वोट और कैंडिडेट के नफा- नुक्सान का आकलन कर मुस्लिम उमीदवारों से भी दूरी बनाकर राजग के वोटर्स में अपनी पैठ मजबूत करना चाह रहे हों.. वहीँ भाजपा के लिए काम करने और उसकी बी टीम कही जाने वाली जन सुराज पार्टी ने अबतक 21 मुस्लिम उमीदवारों को टिकट दिया है, और कुल 40 मुस्लिम उमीदवार उतारने का वादा किया है..
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