Bihar Vidhansabha Election: बिहार विधानसभा चुनाव खत्म हो चुका है. दो चरणों में हुई वोटिंग में बिहार में रिकॉर्ड तोड़ मतदान दर्ज किये गए हैं. अब 14 नवम्बर को वोटो की गिनती होगी. दोनों गठबन्धनों ने जीत के दावे किये हैं. सरकार जिसकी भी बने लेकिन बिहार के वोटर्स ने झोला भर- भरकर वोट देकर ये साबित कर दिया है कि वो लोकतंत्र के उस प्राचीन धरती के निवासी है, जिसने पूरी दुनिया को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाया और सिखाया है.
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11 नवम्बर को बिहार विधानसभा के दूसरे चरण की 122 सीटों पर होने वाली वोटिंग खत्म हो चुकी है. शाम 7 बजे तक इसमें 67.14 फीसदी के आसपास वोटिंग हुई है. इससे पहले 6 नवम्बर को हुई वोटिंग में 64.66% मतदान हुआ था. दो चरणों में होने वाली इस वोटिंग में पड़े मत को ऐतिहासिक वोटिंग माना जा रहा है. ऐसा इसलिए माना जा रहा है, क्योंकि बिहार में जब से विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं, इतनी वोटिंग पहले कभी नहीं हुई है.
1951 में होने वाली पहली लोकसभा चुनाव में सिर्फ 40 फीसदी वोटिंग हुई थी. बिहार में लोकसभा की वोटिंग के इतिहास में दर्ज ये सबसे कम वोटिंग थी. अबतक देश में 18 बार हो चुके लोकसभा चुनाव में बिहार में सबसे ज्यादा वोटिंग 1998 के चुनाव में हुई थी. उस वक़्त 64.6 फीसदी वोटिंग दर्ज की गई थी.
वहीँ, अगर विधानसभा चुनावों की बात करें तो पहली बार1951 में हुई वोटिंग में अबतक का सबसे कम सिर्फ 42.6 फीसदी मतदान दर्ज किया गया था. बिहार में अबतक 17 बार विधान सभा के चुनाव हो चुके हैं. इसमें सबसे ज्यादा वोटिंग साल 2000 के विधानसभा चुनाव में 62.57 फीसदी मतदान दर्ज किया गया था. इस लिहाज से 18 वीं विधानसभा चुनाव में दर्ज वोटिंग फीसदी सही मायनों में ऐतिहासिक है. ये ऐतिहासिक वोटिंग तब हुई है जब SIR में लगभग 65 लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से चुनाव आयोग ने हटा दिए हैं.
चुनाव आयोग ने कहा है कि बिहार में इस बार हुई जबरदस्त वोटिंग पूरे देश के लिए नजीर बन सकती है. पूरे देशवासियों को बिहार के लोगों से सीखने की ज़रूरत है. इस मामले में बिहार के लोगों ने सच में साबित कर दिया है कि बिहार लोकतंत्र की जननी है, और सबसे ज्यादा अगर किसी प्रदेश की जनता लोकतंत्र की इज्ज़त और एहतराम करती है, तो वो बिहार की जनता है.
दुनिया आज भी मानती है कि ग्रीस के 100 साल पहले बिहार के वैशाली जिले में लोकतंत्र पैदा हो चुका था. प्राचीन ग्रीस में लगभग 508 ईसा पूर्व लोकतंत्र होने के प्रमाण मिले थे, लेकिन भारत के बिहार के वैशाली जनपद में 6ठी शताब्दी ईसा पूर्व लोकतंत्र अस्तित्व में आ चुका था. लिच्छवी गणराज्य में विकसित हुई लोकतंत्र की परम्परा ने गैर-राजशाही प्रणाली को जन्म दिया था, जिसमें खानदानी राजाओं के बजाय चुने हुए एक कुलीनतंत्र द्वारा शासन किया जाता था.
बिहार में जिस तरह इस बार वहां की अवाम ने लोकतंत्र के इस महापर्व में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया और वोटिंग की है. इससे साफ़ है कि लोकतंत्र की इस प्राचीन धरती पर लोग अपने वोटिंग अधिकार और लोकतंत्र के प्रति कितने समर्पित और जागरूक हैं.
दूसरे चरण के मतदान में बिहार से वोटिंग की ऐसी- ऐसी तस्वीरें सामने आयी है, जिसमें मतदाताओं का उत्साह देखा जा सकता है. जिस उम्र में लोग ज़िन्दगी से संन्यास ले लेते हैं, वहीँ बिहार के मतदाता अपना मत डालने के लिए संघर्ष करते देखे गए.
बेटों के कंधे पर कालिया
कैमूर जिले के मोहनिया विधानसभा क्षेत्र में 110 वर्षीय बुजुर्ग महिला कालिया देवी अपने बेटों के साथ मतदान केंद्र पहुंचीं थी. चलने में असमर्थ कालिया देवी को उनके बेटों ने खटिया पर उठाकर मतदान केंद्र तक लाया था, और गोद में उठाकर मतदान कराया. कालिया देवी ने बताया कि अब उनके पैरों में ताकत नहीं रही, लेकिन लोकतंत्र के इस महापर्व में शामिल होना उनका कर्तव्य है, इसे कैसे छोड़ सकती थी ?
नवादा से भी कुछ ऐसी ही तस्वीर सामने आई है. यहाँ के एक संत जोसेफ स्कूल पर स्थित मतदान केंद्र पर 105 साल की एक बुजुर्ग महिला वोटर अपने परिजन के साथ वोट करने के लिए पहुंची थी. शहर के इस्लाम नगर निवासी अलीम अंसारी उन्हें वोट दिलाने के लिए पहुँचे थे. आमना खातून नाम की इस महिल ने बताया कि वो चलने- फिरने में असर्मथ है, इसके बावजूद कभी भी वोट डालना नहीं भूलती हैं.
चुनावों के वक़्त देशभर से ऐसी बहुत सी तस्वीरें आती हैं, जिसमें शादी के तुरंत बाद या पहले दूल्हा या दुलहन मतदान केंद्र पर अपना वोट डालने पहुँच जाते हैं, लेकिन बिहार के गया जिले से पहली बार एक ऐसी तस्वीर सामने आयी है, जिसमें बेलागंज विधानसभा क्षेत्र के कुरी सराय गांव में बूथ पर एंबुलेंस में पहुंची एक महिला मतदाता ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया. गाँव के सुनील मांझी की 25 वर्षीय पत्नी सोनी कुमारी ने बीती रात ही बेलागंज के सरकारी अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया था, और सुबह- सुबह एंबुलेंस से अपने नवजात शिशु को लेकर मतदान केंद्र पर वोट करने पहुँच गयी थीं.
मतदानकर्मी और वहां मौजूद लोग इस महिला के साहस और जागरूकता को देखकर दंग रह गए. लोकतंत्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी की इससे अच्छी शायद ही कोई तस्वीर किसी ने पहले कभी देखी होगी?
वहीँ, सुपौल जिले के छातापुर विधानसभा क्षेत्र के एक मतदान केंद्र पर 111 वर्षीय नसीमा खातून भी मंगलवार को बिहार चुनाव के दूसरे चरण में वोट डालने पहुंची थी. व्हीलचेयर पर बैठी नसीमा खातून ने मतदान करने के बाद बताया कि मैंने अपना वोट डाला और अपना कर्तव्य निभाया है. वह सुपौल जिले की सबसे बुजुर्ग मतदाता हैं.
बिहार चुनाव की सबसे सुंदर तस्वीर बेतिया से सामने आयी है, जो लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की खूबसूरती का उदाहरण पेश करती है. बेतिया के नरकटियागंज के बूथ संख्या 135 पर लाठी के सहारे पहुंचे एक 75 वर्षीय दिव्यांग मोहम्मद कलाम ने कहा कि उन्हें सरकार बदलने के लिए वोट डालना है. कलाम ने कहा कि मेरा पेंशन बंद हो गया है. मुझे कोई सुविधा इस सरकार से नहीं मिल रही है. इसलिए मैं सरकार बदलना चाहता हूँ.
मैं घर से अकेला लाठी के सहारे बूथ पर आया हूँ. मेरा कोई मतदान करा दे. कलाम की ये बातें सुनकर बूथ पर तैनात पुलिसकर्मियों ने बुजुर्ग को इज्ज़त देते हुए व्हील चेयर लाया और उसपर बैठाकर खुद पुलिसकर्मियों ने उन्हे बूथ तक पहुंचाया और मतदान कराया. लोकतंत्र की यही ताक़त है, और सुन्दरता भी है कि देश का एक नागरिक खुलेआम सरकार बदलने की बात कर सकता है, और सरकार के लोग ही उसे सरकार बदलने के लिए वोट डालने में मदद करे.
मतदान केंद्र पर कलाम
कुछ लोगों का मानना है कि वोटिंग के प्रतिशत इसलिए बढ़ गए हैं, क्योंकि SIR के डर से दूसरे राज्यों में रहने वाली एक बड़ी आबादी वोट करने के लिए बिहार पहुंची है. उन्हें शायद इस बात का डर था कि वोट न करने से उनका नाम वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया जाएगा.
कुछ लोग ये भी दावा कर रहे हैं कि ठीक दीवाली और छठ के बाद मतदान होने से वोटिंग प्रतिशत बढ़ी है. वहीँ, ये भी दावा किया जा रहा है कि बिहार में सत्तारूढ़ दल और महागठबंधन दलों के नेताओं ने अपनी- अपनी जाति और समर्थकों को पैसे देकर बाहर के राज्यों से बुलाया है, ताकि वो उनके पक्ष में वोट कर सकें और उनकी जीत सुनिश्चित हो सके..
वोटिंग प्रतिशत बढ़ने के पीछे कारण जो भी हों, लेकिन बिहार के लोगों ने ये जाता दिया है कि अपने समर्थक और जात- बिरादरी के नेता ही सही लेकिन चुनाव और इसमें मतदान का क्या महत्व है?
दूसरे चरण का मतदान ख़त्म होते ही एग्जिट पोल में दावे किये जा रहे हैं कि बिहार में सत्तारूढ़ NDA की फिर से वापसी हो रही है, जबकि महागठबंधन का दावा है कि सरकार उनकी बनने जा रही है. आम तौर पर वोटिंग प्रतिशत में इजाफा इस बात का संकेत होता है कि सत्ता बदलने जा रही है, लेकिन पिछले बंगाल और महराष्ट्र विधानसभा चुनाव ने इस आकलन पर परिपाटी को ख़ारिज कर दिया था.
बिहार में 14 नवम्बर को वोटों की गिनती होनी है. इसके बाद साफ़ हो जाएगा कि किसके दावों में कितन दम है? अगर बिहार में सत्ता परिवर्तन होता है, तो बिहार साबित कर देगा कि देश में नेतृत्व परिवर्तन की शुरुआत बिहार की भूमि से ही तय होती है, जैसा 1976 के आम चुनाव में हुआ था.
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