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बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे अबतक साफ़ हो चुके हैं. बिहार की सियासत में ऐसा पहली बार हुआ है, जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने 243 सदस्यीय विधानसभा में 202 सीटों का आंकड़ा पार कर लिया है. इसमें अकेले भाजपा के खाते में 90 और JDU के खाते में 85 सीटें आई हैं. NDA के अन्य सहयोगी दलों में LJP (RV) 19, HAM 5 और RLP 4 सीटें जीती हैं. वहीँ दूसरी जानिब महागठबंधन 34+ सीटों पर सिमट कर रह गया. इस खेमे में राजद के खाते में सिर्फ 24, कांग्रेस 6 और वाम दलों ने 3 सीटों पर दम तोड़ दिया..
ऐसा माना गया था कि भाजपा शासित राज्यों में सरकार के बुलडोज़र एक्शन और कथित रूप से अवैध मदरसों, मजारों पर मस्जिदों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई के डर से बिहार का मुस्लिम वोटर्स एकजुट होकर महागठबंधन को वोट करेगा. ये भी आकलन था कि केंद्र में तीन तलाक और वक्फ जैसे कानून से मुसलमान एक तरफ जहाँ भाजपा से नाराज़ हैं, वहीँ वो केंद्र में उसके सहयोगी JDU के नितीश कुमार और चन्द्र बाबू नायडू से भी नाराज़ हैं. विपक्ष ये मानकर चल रहा रहा कि भाजपा और JDU की इस नाराजगी का सीधा फायदा बिहार में RJD+ कांग्रेस गठबंधन को मिलेगा.
इसी खुशफहमी में महागठबंधन ने सांसद और AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के बार- बार आग्रह के बाद भी सीमांचल की 6 सीटें देकर ओवैसी को इंडिया गठबंधन में शामिल नहीं किया. लेकिन ओवैसी इस चुनौती की स्वीकार करते हुए अकेले दम पर चुनाव लड़कर AIMIM को सीमांचल में 5 सीटें जीताने में कामयाब रहे.
वहीँ, दूसरी तरफ सीमांचल के लगभग 20 मुस्लिम आबादी वाली सीटों पर महागठबंधन के उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा. एनडीए ने मुस्लिम बहुल सीमांचल में पैठ बना ली. NDA गठबंधन को यहाँ 14 सीटों पर जीत हासिल हुई. यहाँ से भाजपा, JDU और लोजपा के उमीदवारों की जीत हुई है. इस तरह इन सीटों पर विपक्ष के एकाधिकार का दावा चकनाचूर हो गया. मुसलमानों के वोट NDA गठबंधन के भाजपा सहित अन्य घटक दलों के खाते में भी गए. वहीँ, कुछ सीटों पर एआईएमआईएम ने अल्पसंख्यक वोटों को बिखेर कर भी NDA उमीदवारों को जीतने में मदद की.
सीमांचल के मुसलमानों ने नितीश कुमार के 20 सालों के कामों और बेहतर प्रशासन के आगे राजद के वादों और आश्वासनों को ख़ारिज कर दिया. ये सिर्फ सीम्नाचल में ही नहीं हुआ बल्कि बिहार के दूसरे इलाके की सीटों पर भी मुस्लिम मतदाताओं ने नितीश कुमार और जहाँ उनकी पार्टी के उमीदवार नहीं थे, वहां भाजपा या अन्य घटक दलों को वोट दिया.
खासकर पसमांदा मुसलमनों की पसंद पिछले 20 सालों से बदल चुकी है. वो राजद के साथ जाने के बजाये नितीश कुमार की पार्टी को समर्थन देते हैं. ऐसा इसलिए है कि राजद ने अपने शासनकाल से लेकर अभी तक मुस्लिम प्रतिनिधि के नाम पर सिर्फ अशराफ यानी उच्च जाति के मुसलामानों को टिकट दिया है या देता रहा है. लेकिन JDU ने पसमांदा समाज के मुसलमानों को पहले टिकट देना शुरू किया था. बिहार सरकार की नीतियों का सर्वाधिक लाभ भी इसी समाज के लोगों को मिला है.. नितीश के OBC में EBC कोटा, पंचायत चुनावों में 50 फीसदी महिला आरक्षण और नौकरी में 33 फीसदी महिला आरक्षण का लाभ न सिर्फ सामान्य या आरक्षित वर्ग की महिलाओं को मिला है, बल्कि मुस्लिम समाज की महिलाओं को भी इसका लाभ मिल रहा है.
बिहार में शराबबंदी, जीविका, ब्याज रहित ऋण, साइकिल योजना, पोषक योजना, शिक्षा प्रोत्साहन योजना, नलजल योजना, जैसी महिला-केंद्रित योजनाओं का लाभ मुस्लिम समाज की महिलाओं को भी मिल रहा है, जिससे उनके बीच भी नितीश कुमार की छवि एक लोककल्याणकारी नेता की रही है. चुनाव के पहले जो 10 हज़ार रुपये महिलाओं के खाते में भेजे गए, उनके लाभार्थियों में अभी एक बड़ी आबादी मुस्लिम महिलाओं की है.
मुस्लिम महिलाओं का वोटिंग व्यवहार भी अब पुरुषों पर निर्भर नहीं है. वो स्वतंत्र रूप से वोट करती हैं. तीन तलाक पर भी मुस्लिम महिलाओं ने NDA के पक्ष में वोट किया है. पिछले 2020 के चुनाव के मुकाबले इस बार महिला वोटिंग प्रतिशत में जो 20 फीसदी का इजाफा हुआ है, वो वोट सीधे तौर पर नितीश कुमार के JDU के खाते में ट्रांसफर हुए हैं, जिसमें एक बड़ा हिस्सा मुस्लिम महिलाओं का है. नितीश अपने चुनावी सभाओं में भी इस बात का जिक्र करते रहे हैं कि नितीश के शासन में मुसलामानों का जितना विकास हुआ, पहले कभी नहीं हुआ था. नितीश कुमार जब ऐसा कहते हैं, तो ये कोई हवा हवाई दावे या फिर कोई चुनावी जुमला भी नहीं होता हैम बल्कि उन दावों में सच्चाई भी है..
यही वजह है कि जबतक नितीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री के पद पर हैं, बिहार का मुसलमान इस बात से मुत्मईन रहता है कि बिहार में उनके हित सुरक्षित हाथों में है. उनके साथ कोई नाइंसाफी नहीं होगी. नितीश कुमार के इस भरोसे ने उनके दिल से भाजपा का डर बहुत हद तक निकाल दिया है. ऐसे में ये कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि नितीश कुमार का भरोसा पाकर बिहार का मुसलमान भाजपा से नहीं बल्कि सिर्फ अल्लाह से डरता है.
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