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Birth Anniversary of Farooq Shekh: मुख्यधारा की सिनेमा बनाम समानांतर सिनेमा की बहस काफी पुरानी हैं. मगर जब भी भारतीय यथार्थवादी सिनेमा का जिक्र होगा, तो फारुख शेख का नाम जरूर लिया जाएगा. अपने फिल्मी कैरियर में महज 50 फिल्मों के माध्यम से जो अभिनय की छाप फारुख शेख ने छोड़ी, उसका असर आज भी दर्शकों के दिलों- दिमाग पर छाया हुआ है. उनके अभिनय की खासियत यह थी कि वह हर तरह की अदाकारी में खुद को बखूबी ढाल कर अपने किरदारों को यादगार बना देते थे. कॉमेडी, ट्रेजडी या रोमांटिक हर फिल्म में उन्होंने अपने अदाकारी की अमिट छाप छोड़ी है. वह हर चरित्र को बड़ी सहजता से निभा लेते थे, यही उनका अलहदा और खास अंदाज दर्शकों को लुभाता था. ’उमरावजान’ का नवाब या ’गमन’ का मजदूर या ’साथ-साथ’ का आम आदमी हो, हर भूमिका को उन्होंने बड़ी संजीदगी के साथ निभाया.
यथार्थवादी सिनेमा के मंझे नायक थे फारूख शेख
70-80 के दशक में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, शशि कपूर, विनोद मेहरा विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा और ऋषि कपूर जैसे दिग्गज कलाकारों के बीच में एक नाम फारुख शेख का भी था. उनके पास न राजेश खन्ना जैसा रोमांटिक, न अमिताभ बच्चन जैसा एंग्रीयंग मैन और न ही ऋषि कपूर जैसा लवरबॉय का तमगा था.
फारुख शेख ’आनंद’, ’शोले’, ’दीवार’, ’जंजीर’, ’काला पत्थर’ और बॉबी जैसी लोकप्रिय फिल्मों के बीच ’चश्मेबद्दूर, ’नूरी’ ,’साथ-साथ’, ’उमराव जान’ और बाजार जैसी फिल्मों में काम कर रहे थे. रमेश सिप्पी, प्रकाश मेहरा और यश चोपड़ा जैसे मशहूर फिल्मकार लोकप्रिय कलाकारों को लेकर एक से बढ़कर एक सफल फिल्में बना रहे थे, वही साईं परांजपे, ऋषिकेश मुखर्जी, केतन मेहता और मुजफ्फर अली जैसे गंभीर फिल्मकार फारुख शेख को ध्यान में रखकर यथार्थवादी सिनेमा रच रहे थे.
फिल्मी कैरियर
मशहूर उपन्यासकार इस्मत चुगताई की कहानी पर आधारित, एम.एस सथ्थू की फिल्म ’गर्म हवा’ से अपना करियर शुरू करने वाले फारुख शेख को अपनी पहली फिल्म में ही बलराज साहनी जैसे मंझे कलाकार के साथ अभिनय करने का मौका मिला. जब सत्यजीत रे जैसे दिग्गज निर्देशक ने हिंदी में प्रेमचंद के उपन्यास पर आधारित ’शतरंज के खिलाड़ी’ फिल्म बनाने का निश्चय तो उनके जेहन में सबसे पहला नाम फारुख शेख का ही आया.
मुजफ्फर अली जैसे संजीदा फिल्मकार ने मिर्जा हादी रुसवा के उपन्यास ’उमराव जान’ पर फिल्म बनाने का निर्णय किया तो फारुख शेख को ही चुना. पलायन पर बनी अपनी दूसरी फिल्म ’गमन’ ने भी मौका दिया. इस फिल्म ’गमन’ में उनके द्वारा निभाया गया किरदार आज भी काबिले-ए-तारीफ हैं. उस फिल्म का गाना ’सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों हैं, इस शहर का हर शख्स परेशान सा क्यों हैं’, बहुत ही लोकप्रिय हुआ था. अपने किसी भी किरदार में जान डाल देने वाले फारुख शेख बड़े या छोटे पर्दे पर हर भूमिका बड़ी शिद्दत से निभाते थे.
टीवी कैरियर
फारुख शेख के अभिनय का जादू बड़े पर्दे तक ही नहीं छोटे पर्दे पर भी खूब चला, ’श्रीकांत’, ’चमत्कार’, ’जी मंत्री जी’ जैसे टीवी सीरियल को इन्होंने खूब लोकप्रिय बनाया. सेलिब्रिटयों से अलहदा अंदाज में गुफ्तगू कर टॉक शो ’जीना इसी का नाम है’ को इन्होंने शीर्ष पर पहुंचा दिया. इसके बाद इसी तर्ज पर सैकड़ों कार्यक्रम बनने लगे, मगर वह लोकप्रियता के उस पायदान पर कभी नहीं पहुंच पाए जहां फारुख शेख ने अपने शो को पहुंचा दिया था.
ऑनस्क्रीन जोड़ी
’चश्मेबद्दूर’, ’किसी से ना’, ’कहना’, ’रंग-बिरंगी’, ’कथा’, ’साथ-साथ’, ’एक बार चले आओ’, ’लिसेन अमाया’ में दीप्ति नवल के साथ इनकी जोड़ी को दर्शकों द्वारा खूब पसंद की गई. फिल्म ’साथ-साथ’ दोनों पर फिल्माया गया. जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की आवाज में गाना- ’यह तेरा घर यह मेरा घर, यह घर बहुत हसीन हैं’- आज भी सुनने वालों के दिलों को सुकून देता हैं. शबाना आजमी के साथ ’लोरी’, ’अंजुमन’, ’एक पल’ और पूनम ढिल्लों के साथ ’नूरी’ में भी दर्शकों को पसंद आई थी. ’उमराव जान’ और ’बीवी हो तो ऐसी’ में रेखा के साथ भी दर्शकों ने इनको पसंद किया था. कला फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री स्मिता पाटिल के साथ इन्होंने ’गमन’ और ’बाजार’ में काम किया.
पुरस्कार
वर्ष 2010 में उन्हें फिल्म ’लाहौर’ के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल अवार्ड मिला था. क्रिकेट के दीवाने फारुख शेख, रंगमंच के भी चर्चित नामों में से एक थे. ए.आर.गर्नी की ’लव स्टोरी’ से प्रेरित, निर्देशक फिरोज अब्बास खान के निर्देशन में नाटक ’तुम्हारी अमृता’ शबाना आजमी के साथ इनके द्वारा निभाया गया जुल्फी का मार्मिक किरदार आज भी दर्शकों के जेहन में ताजा है.
जीवन परिचय
25 मार्च 1948 को गुजरात के अमरोली में जन्में फारुख शेख एक संपन्न परिवार से ताल्लुक रखते थे. अपने पांचों भाइयों में बड़े फारुख शेख को, उनके पिता अपनी तरह वकील बनाना चाहते थे, मगर इनका रुझान अदाकारी की जानिब था. अपनी क्लासमेट रूपा जैन से शादी करने वाली फारुख शेख की दो बेटियां हैं. 28 दिसंबर 2013 को महज 65 साल की उम्र में उनका निधन दुबई में हो गया.
ए. निशांत
लेखक, स्वतंत्र पत्रकार हैं.
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