अपराध कथा: यूपी के शहरी इलाकों का पहला डॉन जिसने अपहरण को उद्योग बना दिया

बुजुर्ग से आंखे मिलते ही राजू चौंक पड़ा. वो बुजुर्ग उसके स्कूल के टीचर थे जिनकी वो बहुत इज्जत करता था. राजू ने फौरन उनके पैर छुए. बुजुर्ग टीचर का गुस्सा कम नहीं हुआ.

अपराध कथा: यूपी के शहरी इलाकों का पहला डॉन जिसने अपहरण को उद्योग बना दिया

हाल ही में अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में बागपत के लोहा व्यापारी आदिश कुमार जैन के सनसनीखेज अपहरण ने सूबे को हिला दिया. उन्हें छोड़ने के लिए एक करोड़ की फिरौती मांगी गई थी. मामला इतना संगीन था कि मेरठ जोन के IG प्रवीण कुमार और ADG जोन राजीव सभरवाल ने भी जिले में डेरा डाल दिया था. आखिरकार पुलिस की सख्ती से किडनैपर्स के हौसले पस्त हो गए. वो व्यापारी को गाजियाबाद के पास जंगल में छोड़ कर फरार हो गए. अपहरण करने वाले नौसिखिए थे. उन्हें लोहा व्यापारी को जानने वाले दो दूसरे व्यापारियों ने 25 लाख में किडनैपिंग की सुपारी दी थी. अंत में पुलिस ने सुपारी देने वाले दोनों व्यापारियों और पांच अपहरणकर्ताओं को भी गिरफ्तार कर लिया. मामले को बिना किसी खून खराबे के निपट जाने से पुलिस ने भी चैन की सांस ली.    

जानकारों की मुखबिरी पर व्यापारी के अपहरण की ये वारदात ताजा है लेकिन इस धंधे का ये अन्दाज पुराना है. उत्तर प्रदेश में अपराध के दलदल की गहराई को छाना जाए तो कई ऐसी सनसनीखेज अपराध कथाएं सामने आ जाएंगी. ऐसा ही एक दिलचस्प किस्सा राजू भटनागर से जुड़ा है. उत्तर प्रदेश में पहली बार अपहरण को उद्योग में बदलने वाला डॉन, उसी को कहा जाता है. उससे पहले सूबे में 'किडनैपिंग' की बजाए, चंबल और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में 'पकड़' होती थी. डाकुओं का आतंक ग्रामीण इलाकों तक ही था. मुस्तकीम, फूलन देवी, मोहर सिंह और लालाराम जैसों का आतंक खत्म होने के बाद, डाकुओं पर अखबारों और सियासत में खास चर्चा होनी बंद हो गई थी. शहरों में भी लोगबाग उनपर  ज्यादा वक्त नहीं खर्च करते थे.      

इसी वक्त के आसपास, लखनऊ यूनिवर्सिटी से बीएससी करने वाले एक पढ़े लिखे, खूबसूरत और जहीन नौजवान ने अपराध की दुनिया में कदम रखा. उसका नाम राजू भटनागर था. तेज दिमाग और बेरहम अन्दाज की बदौलत वो देखते ही देखते बड़ा सरगना बन गया. राजू भटनागर बहुत चालाकी से अपना शिकार चुनता था, अक्सर बड़े व्यापारी, उद्योगपति और डॉक्टर उसका निशाना होते थे. राजू की जुर्म की फिलोसॉफी बहुत साफ थी. बड़ी मछली का शिकार करो. फिरौती में इतना पैसा वसूलो कि इंकमटैक्स विभाग के डर से पैसा देने के बाद भी शिकार, न मुंह खोले न पुलिस तक न जाए.

बबलू श्रीवास्तव उसी का शागिर्द था, जिसने इसी सिद्धांत पर उसके बाद धंधे को आगे बढ़ाया.वो यूपी से निकल कर मुंबई, सिंगापुर, दुबई और दाऊद तक जा पहुंचा. 1986 में दिल्ली की तिहाड़ जेल से अंतर्राष्ट्रीय अपराधी चार्ल्स शोभराज को भी फरार होने की जरूरत महसूस हुई तो इंतजाम के लिए उसने राजू भटनागर के चरण पकड़े. राजू भटनागर तब अपने साथियों, बृज मोहन और लक्ष्मी नारायण के साथ तिहाड़ जेल में बंद था. उसने अपने नेटवर्क की मदद से चार्ल्स शोभराज को गाड़ियां, ट्रेन टिकट, हथियार और कॉन्टैक्ट मुहैया कराया था.    

उस वक्त की कई बड़ी और कामयाब किडनैपिंग को अंजाम देकर राजू भटनागर बड़ा अपराधी बन गया था. वो यूपी का पहला डॉन था. हालांकि उसका एक किस्सा बहुत मशहूर है जब उसने अपहरण की सुपारी देने वाले व्यापारी के ही बेटे को उठा लिया था. ये कहानी यूपी के एक शहर की है जहां अगल-बगल के बंगले में रहने वाले दो व्यापारियों में, बीच की जमीन को लेकर ठनी थी. सबक सिखाने के लिए एक व्यापारी ने दूसरे के बच्चे के अपहरण का ठेका राजू को दे दिया. एक दिन राजू भटनागर ने अपने साथियों के साथ उसके पड़ोसी के घर धावा बोल दिया. वो उस व्यापारी के बच्चे को छीन कर जा ही रहा था कि चीख पुकार सुन कर बंगले के अंदर से एक बुजुर्ग बाहर आ गए.  

बुजुर्ग से आंखे मिलते ही राजू चौंक पड़ा. वो बुजुर्ग उसके स्कूल के टीचर थे जिनकी वो बहुत इज्जत करता था. राजू ने फौरन उनके पैर छुए. बुजुर्ग टीचर का गुस्सा कम नहीं हुआ. उन्होंने राजू को झिड़कते हुए कहा कि उसने स्कूल, गांव सबकी इज्जत मिट्टी मिला दी और अब वो उनके ही पोते का अपहरण करना चाहता है. शर्मिंदा राजू ने अपने टीचर को बताया कि उसे उनके पड़ोसी ने ही अपहरण की सुपारी दी थी. राजू ने माफी मांगी और अपने साथियों के साथ वहां से निकल गया.

बाहर आ कर सभी ने तय किया कि इस अपहरण के लिए इतना जोखिम लेने के बाद वो खाली हाथ नहीं जाएंगे. लिहाजा राजू भटनागर और उसके साथियों ने अपहरण का ठेका देने वाले व्यापारी के घर ही धावा बोल दिया. उसके लड़के को लेकर राजू का गैंग वहां से निकल गया. बाद में व्यापारी को अपने बेटे को वापस पाने के लिए फिरौती में बड़ी रकम देनी पड़ी. कहते हैं इस वाकए से उस व्यापारी को बहुत गहरा झटका लगा. बेटे के वापस आने के कुछ महीने बाद ही सदमे से उसकी मौत हो गई.

इस अपहरण के कुछ ही महीने बाद राजू की भी मौत उसके पास आ पहुंची. 10 जनवरी 1988 को लखनऊ पुलिस ने राजू भटनागर को इलाहाबाद के जार्जटाउन इलाके में एक गैराज के पास हुए एनकाउंटर में मार गिराया. इस एनकाउंटर में बबलू श्रीवास्तव भी घायल हो गया था. उसे और गैंग के दूसरे सदस्य बृज मोहन को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. अपनी मौत के बाद राजू भटनागर बहुत दिनों तक किवदंती बना रहा. इसमें कई बड़े अपहरणों की बड़ी भूमिका थी. ऐसी ही एक कहानी, मध्यप्रदेश के सागर जिले में एक बीड़ी व्यापारी के सनसनीखेज अपहरण की है. इस मामले में हाईकोर्ट ने ये बड़ा फैसला दिया था कि फिरौती में दी जाने वाली रकम के आधार पर इंकमटैक्स में राहत हासिल की जा सकती है.