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देवबंद/सैयद उवैस अली: दारुल उलूम देवबंद ने ईद-उल-अज़हा पर की जाने वाली कुरबानी से मुतअल्लिक हिदायात जारी की हैं. उलेमाओं का एक बेंच ने दो टूक कहा है की क़ुरबानी की इबादत सिर्फ जानवर ज़िबह करना नहीं बल्कि शियार ए इस्लाम (इस्लाम की निशानी) में से है इसलिए हर साल की तरह इस साल भी क़ुरबानी का एहतेमाम करना लाज़िम है. इसमें गफ़लत बरतना इस्लाम और एहले इस्लाम के लिए नुकसानदेह है.
दारुल उलूम देवबन्द के मोहतमिम मौलाना अब्दुल खालिक मद्रासी के ज़रिए पूछे गए तहरीरी सवाल के जवाब में दारुल उलूम के मुफ़्तियों की बेंच ने कहा की जैसे नमाज़ पढ़ने से रोज़ा और रोज़ा रखने से नमाज़ का फ़र्ज़ अदा नहीं होता उसी तरह अगर कोई शख्स क़ुरबानी करने के बजाए यह चाहे की वह जानवर या उसकी कीमत सदक़ा कर दे तो उसकी क़ुरबानी अदा नहीं होगी और इबादत छोड़ने का गुनहगार होगा, लिहाज़ा जिन मुसलमानों पर क़ुरबानी वाजिब है उनके लिए हर साल की तरह इस साल भी क़ुरबानी का एहतेमाम करना लाज़िम है.
दारुल-उलूम-देवबंद ने कहा की वुसअत (मालदार) होने के बावजूद भी क़ुरबानी न करने वालों से रसूल-ए-पाक मोहम्मद ने सख्त नाराज़गी का इज़हार किया है. हदीस में है की जो शख्स क़ुरबानी की हैसियत रखे और क़ुरबानी न करे वह हमारी ईदगाह में न आए. इसलिए मुसलमानों को क़ुरबानी के दिनों में क़ुरबानी पूरे एहतेमाम और खुशदिली के साथ करनी चाहिए.
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