Islamic Scholars on Hajj without Mahram: भारत से इस बार 5,446 औरतें बगैर महरम के हज के मुकद्दस सफर पर जा रही है. इसको लेकर उलेमा और लोगों की मिली जुली प्रतिक्रिया सामने आ रही है. बगैर महरम हज पर जाने को लेकर जमीयत दावतुल मुस्लिमीन के संरक्षक मौलाना कारी इसहाक गोरा का बड़ा बयान सामने आया है.
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Hajj without Mahram: इस्लाम में हज को सबसे बड़ी इबादतों में गिना जाता है, जो हर उस मुसलमान पर फर्ज है जो इसकी क्षमता रखता हो. यह सफर सिर्फ एक मजहबी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि इंसान को सब्र, अनुशासन और अल्लाह के करीब होने का मौका देता है. इस्लाम में औरतों को भी इबादत के मामले में मर्दों की तरह पूरी इज्जत के साथ बराबरी का अधिकार दिया गया है, लेकिन साथ ही कुछ खास हिदायतें भी दी गई हैं, जिनका पालन करना जरूरी माना जाता है.
इसी कड़ी में अब हज के सफर को लेकर एक अहम बहस सामने आई है. भारत से इस साल 5,446 औरतें बगैर महरम के हज के लिए सऊदी अरब जा रही हैं. इनमें से सबसे ज्यादा 4,477 औरतें केरल से बगैर महरम के हज के लिए जा रही हैं. बीते कुछ सालों पहले सऊदी सरकार ने औरतों को बगैर महरम हज पर जाने की इजाजत दी है. औरतों के बगैर महरम हज के सफर पर जाने को लेकर उलेमा की मिली जुली प्रतिक्रिया मिल रही है.
जमीयत दावतुल मुस्लिमीन के संरक्षक और देवबंद के मशहूर आलिमेदीन मौलाना कारी इसहाक गोरा ने बिना महरम के हज पर जाने वाली औरतों के सफर पर एतराज जताया है. उन्होंने शुक्रवार (24 अप्रैल) को जारी अपने वीडियो बयान में कहा कि हज 2026 का सफर शुरू हो चुका है और बड़ी संख्या में लोग पाक सरजमीं पर पहुंच भी चुके हैं. लेकिन इस बार भी, पिछले सालों की तरह, काफी औरतें बिना महरम के हज के लिए जा रही हैं, जो शरई लिहाज से एक संगीन सवाल खड़े करता है.
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मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा, "जब यह सफर शरीयत के अहकाम के खिलाफ हो, तो इस हज की कुबूलियत किस तरह मुमकिन होगी, जबकि शरीयत औरतों को बिना महरम के सफर से रोकता है." उन्होंने अपने बयान में आगे कहा कि "हज जैसी अजीम इबादत के लिए रवाना होने से पहले हर मुसलमान को, खासकर औरतों को, शरीयत की हिदायतों को समझना बेहद जरूरी है."
जमीयत दावतुल मुस्लिमीन के संरक्षक ने बगैर महरम हज पर जाने वाली औरतों पर सवाल खड़ा किया. उन्होंने कहा कि क्या हज पर जाने वाली औरतों ने इस अहम मसले में किसी मुफ्ती या आलिम-ए-दीन से रहनुमाई हासिल की है? क्या उन्होंने अपने सफर के शरई पहलू पर गौर किया है?
मौलाना कारी इसहाक गोरा ने इस बात पर जोर दिया कि इस्लाम में इबादत सिर्फ नीयत का नाम नहीं, बल्कि सही तरीके से अदा करना भी उतना ही अहम है. अगर कोई अमल शरीयत के दायरे से बाहर हो जाए, तो उसकी कुबूलियत पर सवाल खड़े हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि आज के दौर में सहूलतों और इंतजामात के बावजूद, शरीयत के उसूलों को नजरअंदाज करना किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता.
इसहाक गोरा ने मुसलमानों को नसीहत करते हुए कहा कि जज्बात में आकर या समाजी रुझान देखकर फैसले लेने के बजाय, इल्म और दीन की रौशनी में कदम उठाना चाहिए. हज जैसे फर्ज की अदायगी के लिए यह और भी जरूरी हो जाता है कि हर अमल शरई उसूलों के मुताबिक हो, ताकि इबादत न सिर्फ अदा हो, बल्कि अल्लाह की बारगाह में मकबूल और कबूल भी हो.
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