)
देश के प्रमुख शिक्षण केंद्रों में से एक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के लिए 24 मई के दिन का खास महत्व है. दरअसल 1920 में इसी दिन इस शिक्षण संस्थान की स्थापना की गई थी. अपने समय के महान समाज सुधारक सर सैयद अहमद खान ने मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा प्रदान करने की जरूरत को महसूस करते हुए 1877 में एक स्कूल की स्थापना की थी जो बाद में मुस्लिम एंग्लो ओरिएंटल कालेज बना. यही कॉलेज आगे जाकर 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना. यह आजादी के बाद देश के चार केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में से एक था. विश्वविद्यालय के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि 1857 की क्रांति ने सर सैयद अहमद खान पर गहरा असर डाला था और उनके परिवार के लोग भी अंग्रेजों की गोलियों का शिकार हुए थे.
सर सैयद अहमद खान एक पढ़े लिखे और ज़हीन इनसान थे लिहाजा उन्होंने आधुनिक शिक्षा को हथियार बनाकर अंग्रेजों को सबक सिखाने का निश्चय किया था. वह ईस्ट इंडिया कंपनी में शामिल हुए और आधुनिक शिक्षा के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी हासिल करने के इरादे से 1870 में इंग्लैंड गए. वहां उन्होंने ऑक्सफर्ड और कैंब्रिज जैसे विश्वप्रसिद्ध संस्थानों का दौरा किया और भारत में भी आधुनिक शिक्षा का उजाला फैलाने का सपना देखा. उन्होंने वापस आकर अलीगढ़ में मात्र सात छात्रों के साथ एक मदरसे की स्थापना की. धीरे-धीरे छात्रों की संख्या बढ़ने लगी और 1877 में इसका विस्तार करते हुए ऐंग्लो ओरिएंटल कॉलेज की शुरुआत की गई. यही कॉलेज 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना जो दुनियाभर में एक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान के तौर पर प्रसिद्ध है.
एएमयू यानी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना ऐसे वक्त में हुई थी जब देश में अस्थिरता, अशिक्षा और देशवासियों में निराशा का मोहौल व्याप्त था. सन 1857 की क्रांति के बाद देश में अस्थिरता और अराजकता तेज़ी से पनप रही थी. इसके साथ ही देश में सांप्रदायिकता को सत्ता पक्ष द्वारा जानबूझ कर बढ़ावा दिया जा रहा था ताकि जनता का ध्यान इस क्रांति से हट जाए और ब्रिटिश सत्ता बनी रहे. यह बात देश के जागरूक नागरिक भलीभाती समझ गए थे और उन्होंने एकता का परिचय देते हुए एकजुट हो कर इस लड़ाई को जारी रखा.
सर सैयद अहमद ने सरकारी नौकरी के दौरान यह महसूस किया कि यदि देश को विकास के पथ पर ले जाना है और देशवासियों में एकता अखंडता और विश्वास बनाना है तो शिक्षा को एक हथियार के रूप में लेना होगा. मुस्लिम समाज की स्थिति तब भी बहुत अच्छी नही थी. उसके लिए भी अशिक्षा और रूढ़िवादिता उनके विकास में एक बड़ी रुकावट बनी हुई थी. उन्होंने ब्रिटेन का दौरा करके यह निष्कर्ष निकाला कि जो देश भारत सहित कई देशों पर राज कर रहा है उस देश में शिक्षा का स्तर बहुत ऊंचा और व्यापक है. इसी मंत्र को लेकर सर सैयद अहमद खान भारत लोटे और यहां एक ऐसा ही शिक्षा केंद्र खोलने के प्रयास शुरू कर दिए.
पहले उन्होंने बिजनौर और गाजीपुर में संस्था खोलने का मन बनाया लेकिन उनको अलीगढ़ आने पर यहां की जलवायु और भौगोलिक स्थिति के अनुसार एक छोटी सी संस्था मोमडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की जो आगे चल कर अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल हुआ और 24मई, 1920 एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित हुआ.
इस विश्वविद्यालय की स्थापना का मकसद देश के अल्पसंख्यक मुस्लिम समाज को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ कर एक सुंदर राष्ट्र बनाने में योगदान करना था जो आज भी अपनी इसी मूलभावना को साकार कर रही है. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय देश में ही नहीं विदेशों में भी एक अलग पहचान बनाए हुए है.
यह विश्वविद्यालय अपने नाम के विपरीत हिंदू, ईसाई और अन्य मतावलंबियों को भी अपनी आगोश में लिए हुए है, यहां सभी धर्मों के लोग बिना किसी भेदभाव के शिक्षा प्राप्त करते हैं. इसके साथ ही एएमयू की होस्टल लाईफ एक अलग ही पहचान रखती है. यहां छात्र अपने सीनियर साथियों का बहुत आदर करते हैं, और सीनियर अपने जूनियर साथियों की कदम कदम पर रहनुमाई करते हैं. उनके दुख दर्द में साथ रहते हैं. यहां के चाय के होटल और पार्कों की रौनक अलग ही पहचान रखते हैं. पुस्तकालय के अध्ययन कक्ष में घंटो बैठना हो या संगोष्ठी कक्ष में चर्चाएं हो, सभी जगह यहां के विद्यार्थियों की तहजीब और अंदाज एक अनोखी पहचान रखते हैं. इसी अनोखेपन के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को मिनी इंडिया की संज्ञा दी थी और यहां के छात्रों की मस्ती और गंभीरता की प्रशंसा की थी.
एएमयू परिसर में दाखिल होते ही एक अलग शांति और अपनत्व का अनुभव यहां के हर विद्यार्थी को होता है. यहां के पूर्व छात्र देश विदेश में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. उनके काम करने का अंदाज जीवंत और व्यवहार में कुशलता होती है जिसके कारण वो अपने इर्दगिर्द अच्छी पहचान बनाने में सफल रहते हैं. उर्दू के विद्वान रशीद अहमद सिद्दीकी ने यहां के छात्रों के बारे में लिखा है कि जब भी मैं किसी व्यवहारकुशल और आकर्षक छवि का छात्र देखता हूं तो सब से पहले मेरे मन में यही आता है कि काश यह अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का छात्र होता! इन सभी बातों से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि एएमयू एक शिक्षण संस्था ही नही है बल्कि एक तहजीब है, जिसे हमें बरकरार रखना होगा.
लेखक:
डॉ.जुल्फिकार गुन्नौरी
लेखक स्तंभकार हैं और एएमयू में पढ़ाते हैं.
Zee Salaam