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Anti Conversion Law in Bihar: बिहार में अल्पसंख्यकों को टाइट न करने पर मायूस हैं सरकार के विधायक!

Bihar Government Deny Making Anti Conversion Law: बिहार में सत्तारूढ़ दल के विधायक चाहते हैं कि भाजपा शासित अन्य राज्यों की तरह बिहार में भी कठोर धर्मांतरण रोधी कानून बने जिससे कथित धर्मांतरण को रोका जा सके और आरोपी को 10- 20 साल के लिए जेल भेजा जा सके. लेकिन सरकार ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है कि अभी ऐसा कोई कानून बनाने का प्रस्ताव नहीं है, जिससे विधायकों में मायूसी छा गई है.

कृत्रिम मेधा से निर्मित प्रतीकात्मक तस्वीर
कृत्रिम मेधा से निर्मित प्रतीकात्मक तस्वीर

नई दिल्ली: बिहार के अल्पसंख्यकों को दूसरे भाजपा शासित राज्यों की तरह प्रताड़ित न किए जाने पर सत्तारूढ़ दल के कुछ विधायक नाराज़ हैं! उन्हें लगता है कि बिहार में अल्पसंख्यकों की आबादी तेज़ी से बढ़ रही है, और अगर ऐसा ही रहा है तो राज्य का बहुसंख्यक हिन्दू एक दिन खतरे में पड़ जाएगा. इसलिए विधायक बिहार में भी कठोर धर्मांतरण रोधी कानून चाहते हैं, जिसके तहत धर्मांतरण कराने वाले मुसलमानों या ईसाई मिशिनरी के लोगों को 10- 20 साल क लिए जेल भेजा जा सके. हालांकि, सरकार ने उन्हें ये कहकर निराश कर दिया है कि फिलहाल बिहार में ऐसा कोई भी कानून बनाने की सरकार की कोई योजना या प्रस्ताव नहीं है. 

दरअसल, शुक्रवार को बिहार विधानसभा में धर्म परिवर्तन को लेकर एक सख्त कानून बनाने का मुद्दा उठाया गया था. ध्यानाकर्षण के माध्यम से सत्ता पक्ष के कई सदस्यों ने इस सवाल को सदन में उठाया था , जिसमें दरभंगा के अलीनगर की विधायक और लोक गायिका मैथिली ठाकुर, मिथिलेश तिवारी, वीरेंद्र कुमार, जनक सिंह,संजय कुमार सिंह, जीवेश कुमार, तारकेश्वर प्रसाद, बैद्यनाथ प्रसाद सहित कुल 18 विधायक शामिल थे. अपने प्रस्ताव के समर्थन में इन विधायकों ने कहा कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात सहित अन्य प्रदेशों में जैसा धर्म परिवर्तन को लेकर कानून लागू है, क्या बिहार में भी सरकार को वैसा ही कोई कानून नहीं बनाना चाहिए? यहाँ भी एक कठोर कानून की ज़रूरत है.  

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बीजेपी विधायक मिथलेश तिवारी ने दलील दी कि बिहार में ईसाइयों और मुसलमानों की आबादी में असामान्य रूप से वृद्धि दर्ज की गई है. बिहार में 5000 से ज्यादा चर्च की स्थापना हो चुकी है, लिहाजा एक सख्त कानून बनाना बेहद जरूरी हो गया है. सदन में बताया गया कि ईसाइयों का राष्ट्रीय स्तर पर ग्रोथ रेट है 15.5% है, जबकि बिहार में ये आंकड़ा 143.23 फ़ीसदी तक पहुँच गया है. इसके अलावा सीमावर्ती इलाके में मुस्लिम आबादी में भी इजाफा हो रहा है. ईसाई मिशनरी और इस्लामी धर्म गुरुओं द्वारा धड़ल्ले से हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है. हर वर्ग की लड़कियां इसकी शिकार हो रही हैं.

बीजेपी के विधायक संजय सिंह इसे धर्मांतरण नहीं बल्कि राष्ट्रांतरण का नाम दे रहे हैं. यानी बिहार में अगर इस कथित धर्म परिवर्तन को नहीं रोका गया तो पूरे राष्ट्र का परिवर्तन हो जाएगा. वहीँ विधायक जिवेश कुमार ने कहा कि बाबा साहब के संविधान के तहत जब किसी को अपनी जाति बदलने की इज़ाज़त नहीं है, तो धर्म बदलने की इजाजत कैसे होगी? सदन में यह भी कहा गया कि धर्म बदलने के बाद आरक्षण का लाभ लोग कैसे ले रहे हैं, ये भी चिंता की बात है?  इस पर कड़ा कानून नहीं आएगा तो इसका परिणाम ठीक नहीं होगा. हालांकि, इन दावों के समर्थन में सत्तारूढ़ दल के विधायकों ने कोई प्रमाणिक दस्तावेज़ पेश नहीं किए.  

सदन में जब ये मुद्दा उठाया जा रहा था, उस वक़्त विपक्ष ने इसका जमकर विरोध किया. विपक्ष का मानना है कि ये दावे आकलन, पूर्वाग्रह या फिर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ज्ञान पर आधारित और प्रेरित है. इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है. आरजेडी विधायक आलोक मेहता ने कहा कि सत्ता पक्ष के विधायक द्वारा संविधान में धर्म न बदलने की बात कहना उनके अज्ञानता को दर्शाता है. संविधान सभी को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक धर्म और आस्था का चयन करने और परिवर्तन करने की भी आज़ादी देता है. अलोक मेहता ने कहा कि सत्ता पक्ष के विधायक गलत तथ्य रखकर सदन को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं. 

वहीँ, कांग्रेस विधायक मनोज विश्वास का मत है कि अगर धर्म परिवर्तन हो भी रहा है, तो उसके पीछे के कारणों की पड़ताल करनी होगी. गरीब और पिछड़े लोगों को सरकार की योजना का लाभ नहीं मिलने और उन्हें इज्जत न मिलने की स्थिति में यह सब हो रहा है. इस परिस्थिति को दूर करने की जरूरत है, न कि धर्म परिवर्तन विरोधी कानून लाने की? 

हालांकि, सरकार ने अपने ही विधायकों की मांग और उनकी उम्मीदों पर ये कहते हुए पानी फेर दिया है कि अभी इससे संबंधित कोई कानून बनाने का सरकार का प्रस्ताव नहीं है. मंत्री अरुण शंकर ने सरकार की तरफ से विधायकों के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि अभी सरकार का इसपर कानून बनाने का कोई प्रस्ताव नहीं है. वहीं, सदन के अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने दिलासा देते हुए कहा है कि इस पूरे मामले की समीक्षा की जाएगी. इसके बाद अगर जरूरत पड़ी तो कानून भी बनाया जाएगा, लेकिन सदन में दुबारा इस विषय पर चर्चा नहीं होगी. 

भारत में किसी को भी कानूनी प्रक्रियाओं के तहत अपना धर्म बदलने की आजादी है. इसके बावजूद देश में कम से कम 19 राज्यों में लोभ-लालच में फंसाकर या जबरन धर्मांतरण के विरुद्ध कानून बने हैं. भाजपा के सत्ता में आने के बाद उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में धर्म परिवर्तन विरोधी कानून को संशोधन कर इसे और सख्त बना दिया गया है. 

इन कानूनों के तहत हजारों निर्दोष मुसलमान इस वक़्त जेल में बंद हैं. लव जिहाद जैसे कथित अपराधों में उन पर धर्म परिवर्तन का भी आरोप लगा दिया जाता है. ऐसे आरोप अदालत में ट्रायल के दौरान कहीं नहीं टिकते हैं, आरोपी रिहा हो जाता है. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में ऐसे सैकड़ों केस हैं, जिसमें आरोपी बेगुनाह साबित हुए हैं, लेकिन इन कानून में फंसकर उनका पैसा, वक़्त और घर- परिवार सब कुछ बर्बाद हो जाता है.   

अब बिहार में सत्तारूढ़ दल के विधायक चाहते हैं कि वैसा ही कानून बिहार में भी लागू किया जाए, ताकि आरोपी को 10-20 सालों के लिए जेल भेजा जा सके. ये किसी से छिपा नहीं है कि भाजपा को बिहार में मैंडेट ही इस बात के लिए मिला है कि बिहार में योगी मॉडल को लागू किया जाए, और मुसलमानों को टारगेट कर उन्हें परेशान करना या टाइट करना इस मॉडल का घोषित और ज़रूरी हिस्सा है.

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