New Year Celebration in Islam: अंग्रेजी नए साल के जश्न के दौरान शराब पीना, अय्याशी जैसे कामों की वजह से इस्लाम में इसको सेलिब्रेट करने को लेकर हमेशा से दुविधा की स्थिति रही है. गैर-इस्लामी रस्मों के बढ़ते चलन के बीच इस्लाम की शिक्षाओं, हिजरी कैलेंडर के इतिहास और सुन्नत-ए-नबवी की रौशनी में 'New Year' के जश्न मनाने को दीनी लिहाज से समझते हैं कि आखिर क्या कहता है इस्लाम?
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Happy New Year in Islam: तेजी से बदलती दुनिया और इन्टरनेट की वजह से बढ़ते सांस्कृतिक आदान- प्रदान के बीच एक अहम सवाल बार-बार सामने आ रहा है कि क्या हम अपनी धार्मिक पहचान और मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं? 2025 ईस्वी खत्म होने को है, और नए साल की बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया. अंग्रेजी या ग्रेगोरियन कैलेंडर के पहले महीने के जश्न के लिए अभी से तैयारियां चल रही हैं. ऐसे में 31 दिसंबर की रात के जश्न और गैर-इस्लामी रस्मों के बढ़ते चलन ने मुस्लिम समाज के भीतर आत्मचिंतन की जरूरत को और गहरा कर दिया है.
इस्लाम, जो हर दौर और हर हालात के लिए मुकम्मल मार्गदर्शन देता है, उसमें गैर- इस्लामी नकल और रिवायतों को अपनाने को लेकर साफ़- साफ़ दिशा- निर्देश दिया गया है.
नए साल के जश्न को लेकर इस्लाम ने क्या कहा?
इस्लाम एक ऐसा मुकम्मल धर्म है, जो इंसानी जिंदगी के हर पहलू के लिए जीने का मार्गदर्शन देता है. अकीदत से लेकर समाज, संस्कृति से लेकर व्यवहार और इबादत से लेकर रोजमर्रा की जिंदती तक, हर क्षेत्र में इस्लाम ने स्पष्ट दिशा तय की है.इसके बावजूद आज मुस्लिम समाज का एक बड़ा हिस्सा ऐसी रिवायतों और रस्मों को अपनाता दिखाई दे रहा है, जिसका दीनी लिहाज से इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं है.
इस्लाम में इंसानी जिंदगी के लिए पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत को आदर्श बनाया गया है. कुरआन और सुन्नत को जिंदगी के लिए काफी और मुकम्मल बताया गया है. इसके बावजूद गैर-मुस्लिम सभ्यताओं, यहूदियों और ईसाइयों के तौर-तरीकों की नकल आज आम होती जा रही है. रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का साफ फरमान है,"जो किसी कौम की नकल करता है, वही उन्हीं में से गिना जाएगा." (सुनन अबू दाऊद 4033). इसी तरह एक दूसरी रिवायत में आता है, "जो दूसरों की नकल करे, वह हम में से नहीं है."
इन सख्त हिदायतों के बावजूद आज बड़ी संख्या में मुसलमान नए साल को त्योहार की तरह मनाते हैं. सवाल उठता है कि आखिर नए साल की बधाई किस बात की? हकीकत तो यह है कि नया साल जिंदगी का एक साल कम होने का ऐलान है. दुनिया की उम्र एक साल घट जाती है और कयामत एक कदम और करीब आ जाती है. इसलिए इस मौके पर नाच- गाना, जुआ- शराब या दीगर अनैतिक कामों से बचना चाहिए.
इन कामों से बुराई पैदा होती है और ऐसे कामों को करने से इस्लाम में सख्ती से मना किया गया है. हजरत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रजि.) फरमाते हैं कि उन्हें किसी बात पर उतना अफसोस नहीं होता, जितना उस दिन के गुजर जाने पर जिसमें उनके अच्छे कामों में कोई बढ़ोतरी न हो सकी. हजरत अली (रजि.) फरमाते हैं, "ये दिन तुम्हारी उम्र के पन्ने हैं, इन्हें अच्छे कर्मों से भर दो." नबी (स.अ.) ने फरमाया, "आदमी के इस्लाम की खूबी यह है कि वह फिजूल की बातों से बचे."(तिर्मिजी)
नये साल से परे हटकर अगर देखा जाए तो जिंदगी का हर पल नया है. फिर साल के बदलने पर जश्न का क्या मतलब? इसके बावजूद 31 दिसंबर की रात बारह बजे नाच-गाना, शराब, आतिशबाजी और पार्टियों का दौर शुरू हो जाता है. इस्लाम ने ऐसे तौर-तरीकों से सख्ती से मना किया है. कुरआन में अल्लाह तआला फरमाता है, "ऐ ईमान वालों! इस्लाम में पूरे के पूरे दाख़िल हो जाओ और शैतान के नक़्शे क़दम पर मत चलो, वह तुम्हारा खुला दुश्मन है." (सूरह अल-बकरा : 208)
आज ज़रूरत इस बात की है कि मुसलमान हिजरी सन की धार्मिक, राष्ट्रीय और ऐतिहासिक अहमियत को समझें.नई पीढ़ी की मुस्लिम नौजवान इस्लाम के इतिहास और कुरान सुन्नत को समझना ही नहीं चाहते हैं. मुसलमान इस्लामी तालीम, इतिहास और निशानियों से अनजान हैं.
हिजरी कैलेंडर का इतिहास
इस्लामी कैलेंडर और इस्लामी इतिहास की शुरुआत उस दिन से मानी जाती है, जब अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कुबा पहुंचे. इसकी ऐतिहासिक वजह यह भी है कि दूसरे खलीफा हजरत उमर फारूक (रजि.) के खिलाफत के दौर में कई नए देश इस्लामी सल्तनत में शामिल हुए. उन इलाकों में गवर्नरों की नियुक्ति की गई और खिलाफत के दरबार से उन्हें लिखित आदेश भेजे जाने लगे. इस तरह सरकारी पत्राचार बढ़ गया.
इसी दौरान रोम से हजरत उमर (रजि.) के पास एक खत आया, जिस पर ईस्वी तारीख और साल लिखा हुआ था. उस खत का जवाब देते समय पहली बार उन्हें तारीख और साल की जरूरत महसूस हुई. एक बार हजरत मूसा अशअरी (रजि.) ने अमीरुल मोमिनीन हजरत उमर (रजि.) को पत्र लिखकर शिकायत की कि खिलाफत की ओर से जो आदेश आते हैं, उनमें तारीख और साल न होने की वजह से यह समझना मुश्किल हो जाता है कि वह किस समय लिखे गए थे, इसलिए कई बार उन पर अमल करने में परेशानी होती है.
उसी वक्त हजरत उमर (रजि.) के पास एक मुकदमे से जुड़ा खत आया, जिसमें सिर्फ 'शाबान' लिखा था, लेकिन साल नहीं लिखा था. इससे उन्हें यह तय करने में कठिनाई हुई कि यह किस साल के शाबान का मामला है. तब यह महसूस किया गया कि किसी एक ऐतिहासिक घटना को आधार बनाकर सरकारी तौर पर साल की शुरुआत तय की जाए, ताकि वहीं से नियमित इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत हो सके.
हजरत उमर (रजि.) ने इस विषय पर मशविरे के लिए सहाबा-ए-कराम (रजि.) को इकट्ठा किया. इस बातचीत के दौरान लोगों की अलग-अलग राय सामने आई. कुछ सहाबा ने सुझाव दिया कि रसूलुल्लाह (स.अ.) की पैदाइश को इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत का आधार बनाया जाए. कुछ ने नबी (स.अ.) की नबूवत के दिन से और कुछ ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात से कैलेंडर शुरू करने के का मशविरा दिया. कुछ लोगों ने फारसी कैलेंडर और कुछ ने रोमी कैलेंडर अपनाने का सुझाव भी दिया, लेकिन हजरत उमर (रजि.) ने इन सभी प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया.
अली (रजि.) के सुझाव पर शुरू बना हिजरी कैलेंडर
काफी सलाह-मशविरा और चर्चा के बाद हजरत अली (रजि.) की राय पर सबकी सहमति बनी और सर्वसम्मति से रसूलुल्लाह (स.अ.) की हिजरत के साल को इस्लामी इतिहास की शुरुआत घोषित किया गया. इस फैसले की पुष्टि सहीह बुखारी की उस रिवायत से भी होती है, जो सहल बिन सअद (रजि.) से वर्णित है, जिसमें कहा गया है, "न तो नबी (स.अ.) की नबूवत से तारीख शुरू करो और न ही उनकी वफात से, बल्कि मदीना की ओर उनके प्रस्थान (हिजरत) से तारीख की शुरुआत करो."
हिजरत वह ऐतिहासिक घटना थी, जिसमें इंसानित ने ईमान, अकीदा, सब्र, स्थिरता, हौसला और हिम्मत का अनमोल खजाना है. इसी बैठक में यह भी तय किया गया कि अरब में प्रचलित महीनों के नाम जैसे के तैसे रखे जाएं. हजरत उस्मान (रजि.) की राय पर सहमति बनाते हुए इस्लामी साल का पहला महीना मुहर्रमुल हराम तय किया गया.
मुहर्रम को हिजरी साल का पहला महीना चुनने की वजह?
हालांकि, तर्क के आधार इस्लामी साल की शुरुआत रबीउल अव्वल से होनी चाहिए थी, क्योंकि इसी महीने रसूलुल्लाह (स.अ.) मदीना मुनव्वरा पहुंचे थे. चारों इमामों में से इमाम मालिक (रह.) का सबसे मजबूत मत भी यही है. लेकिन इसके बावजूद मुहर्रम को इसलिए चुना गया क्योंकि रसूलुल्लाह (स.अ.) ने हिजरत का इरादा मुहर्रम में ही कर लिया था.
इसके अलावा मुहर्रम का महीना अरबों और मुसलमानों के यहां हमेशा से सम्मानित और पाक माना जाता रहा है. बड़े और महत्वपूर्ण कामों की शुरुआत इसी महीने से की जाती थी. यहां तक कि अरब लोग भी महीनों की गिनती मुहर्रम से ही करते थे.
चंद्र और सौर कैलेंडर में क्या है फर्क
तारीख, महीना और साल की गणना सूरज और चांद, दोनों के आधार पर की जा सकती है. लेकिन चंद्र कैलेंडर में महीनों और तारीख का निर्धारण देखने और अनुभव से किया जा सकता है, जबकि सौर कैलेंडर की गणना आम लोग नहीं समझ सकते, सिवाय गणितज्ञों के. चंद्र महीनों का हिसाब हर इंसान के लिए आसान है. चाहे वह पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, शहर में रहता हो या गांव में. इसी वजह से इस्लाम के ज्यादातर नियमों में चंद्र साल, चंद्र महीनों और चंद्र तारीखों को आधार बनाया गया है.
नमाज, रोजा, हज, जकात, इद्दत जैसे सभी इस्लामी फर्ज और अहकाम चांद के हिसाब से ही तय किए गए हैं. जब 20 जमादिल सानी 13 हिजरी (9 जुलाई 638 ई.) को हिजरी कैलेंडर की शुरुआत का औपचारिक फैसला हुआ, तब से सहाबा-ए-कराम (रजि.), ताबेईन, तबे-ताबेईन, बुज़ुर्गाने दीन और उलेमा हिजरी सन का पालन करते आए हैं और मुसलमानों को भी इसका एहतेमाम सिखाते रहे हैं.
चंद्र कैलेंडर को जिंदा रखना है 'फर्ज-ए-किफाया'
इसलिए मुसलमानों को अपनी जिंदगी के हर क्षेत्र में सुन्नत की पैरवी और इस्लामी संस्कृति को अपनाते हुए अपनी धार्मिक और राष्ट्रीय पहचान बनाए रखनी चाहिए. अपने हिसाब-किताब, पत्राचार और रोजमर्रा के जरूरी कामों में जहां तारीख और साल लिखना जरुरी हो, वहां चंद्र महीनों और हिजरी साल का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि यह इस्लाम की पहचान (शआइर-ए-इस्लाम) में से है. उलेमा ने चंद्र कैलेंडर को जिंदा रखना मुसलमानों पर 'फर्ज-ए-किफाया' करार दिया है.
हालांकि, अफसोस कि आज मुसलमान इस धार्मिक पहचान से पूरी तरह अनजान हैं. इस्लामी तारीख लिखना तो दूर, उन्हें इस्लामी महीनों के नाम तक याद नहीं हैं. यह नहीं कहा जा रहा कि सौर कैलेंडर का इस्तेमाल गलत या नाजायज है. व्यापार, दफ्तरों में काम और गैर-मुसलमानों से जुड़े लेन-देन में सौर कैलेंडर का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन निजी पत्राचार और रोजमर्रा की जिंदगी में इस्लामी और चंद्र तारीखों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. हकीकत यह है कि आज उम्मत का एक बड़ा हिस्सा फख्र के साथ गैरों के तौर-तरीकों को अपना रहा है. वह अपने धार्मिक पहचान की जरा भी परवाह नहीं कर रहा.
अल्लाह तआला ने मुसलमानों को एक मुकम्मल और संपूर्ण दीन अता किया है. रसूलुल्लाह (स.अ.) को पूरी इंसानियत के लिए आदर्श और मिसाल बनाया गया है और सुन्नतों का अनमोल खजाना दिया गया है, जिसमें जिंदगी के हर पहलू के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन मौजूद है. जब अल्लाह ने दीन को पूरा कर दिया और नबी (स.अ.) की सुन्नत को जिंदगी का पैमाना बना दिया, तो फिर किसी दूसरी व्यवस्था, संस्कृति या जीवन-शैली को अपनाने की कोई जरूरत ही नहीं रह जाती है.
नबी-ए-पाक (स.अ.) ने अपनी पूरी जिंदगी में यहूदियों और ईसाइयों की नकल से बचने और उनकी मुखालफत करने का साफ हुक्म दिया है. यह हिदायत सिर्फ इबादत तक सीमित नहीं थी, बल्कि जिंदगी के छोटे-छोटे व्यवहारिक पहलुओं तक फैली हुई थी.
नया साल और उसकी सच्चाई
अब बात करते हैं नए साल का जश्न मनाने की. नए साल का जश्न मनाने की कोई इस्लामी रिवायत नहीं, बल्कि ईसाइयों की बनाई हुई रस्म है. उनके अकीदे के मुताबिक, 25 दिसंबर को हजरत ईसा (अ.स.) का जन्म हुआ, जिसकी खुशी में क्रिसमस मनाया जाता है. यही उत्सव और जश्न की स्थिति नए साल की आमद तक बनी रहती है. 31 दिसंबर की रात बारह बजे का इंतजार, एक-दूसरे को बधाईयां देना, केक काटना, आतिशबाजी करना, शराब, डांस और नाइट क्लब, यह इस जश्न की पहचान बन चुकी है.
(लेखक: डॉक्टर मुफ़्ती मोहम्मद इरफ़ान आलम कासमी उर्दू वीकली ' आब-ए-हयात के संपादक हैं. यहां व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं.)
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