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अब्बास मेहदी रिजवी: इस्लाम में औरतों को बहुत से हुक़ूक़ दिए हैं. जिनमे से एक हक़ ये है कि वो अपने मर्द के साथ आर्थिक तौर पर बोझ उठा सकती है लेकिन हमारे समाज के मौलवियों ने और मर्दों ने अपनी अना को ऊंचा रखने के लिए इस्लाम को ढाल बना कर उन्हें रिवायतों और दक़ियानूसी की ज़ंजीरों में जकड़ दिया, लेकिन हां हक़ीक़त ये भी है कि औरत को इस्लाम ने चिराग़े ख़ाना बनाया है, शम्मे महफ़िल नहीं. लेकिन चराग़े ख़ाना का मतलब ये नहीं कि उसे एक अलग तरह की मख़लूक़ समझा जाए. वो बस बच्चे पाले, खेतों में काम करे और घरों की अंदरुनी ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाए.
हमारी क़ौम की रोल मॉडल तो बीबी हाजरा हैं जो अपने बेटे हज़रत इस्माइल के लिए पानी की तलाश में सफ़ा और मरवा (पहाड़ का नाम) के बीच दौड़ी और इस अमल को रहती दुनिया तक के लिए इबादत क़रार दे दिया गया. हमारी रोल मॉडल तो उम्मुल मोमोनीन हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा हैं जो अपने वक़्त की सबसे बड़ी बिज़नेस वुमन थी. जिन्हें मलिकतुल अरब कहा गया. हमारी रोल मॉडल तो हज़रत ज़ैनब बिन्ते अली हैं जो मंज़िले कर्बला में अपने भाई हज़रत हुसैन के साथ साथ थीं. तारीख़ गवाह है कि इस्लाम से पहले दुनिया ने जितनी भी तरक़्क़ी की थी उसमें सिर्फ़ मर्द का हिस्सा है, औरत का कहीं भी कोई किरदार नहीं.
जिस दौर में इस्लाम आया उस दौर में बेटियों को ज़िंदा दफ़्न कर दिया जाता था लेकिन इस्लाम ने औरत के मक़ाम को बुलंद किया. औरत को इज़्ज़तो वक़ार बख़्शा, दीने इस्लाम ने औरत को मर्दों के बराबर तो हुक़ूक़ दिए लेकिन फ़र्ज़ और ज़िम्मेदारी मर्दों की ज़्यादा तय की. लेकिन दुनिया आज फिर पुराने दौर में लौट रही है. कल औरतों के बाज़ार सजाए जाते थे, एहसासे कमतरी का शिकार बना कर (कम समझना) और आज औरत की नुमाईश की जाती है आज़ादी का नारा लगाकर. हम ये बात आज इसलिए कर रहे हैं कि हिजाब पर बहस छिड़ी हुई है. सवाल ये है कि हिजाब पर बहस होनी चाहिए या किताब पर.
कल तक हमारे मुआशरे में औरतों का घर से निकलना बुरा समझा जाता था. लेकिन आज मुस्लिम लड़कियां आला तालीम के लिए घरों से बाहर निकल रही हैं तो इस पर किसको और क्यों एतराज़ होना चाहिए. कम से कम मुस्लिम मुआशरे में इतनी बेदारी आ ही गई कि बेटों के साथ साथ मां बाप बेटियों की तालीम के लिए भी फ़िक्रमंद हैं और उन्हें घर से बाहर निकलने की इज़ाज़त तो दे रहे हैं. लेकिन तसव्वुर कीजिए हम जिस सोसाईटी से आते हैं उस सोसाईटी में आज से 30 साल पहले किसी मुस्लिम बेटी का घर से बाहर अकेले निकलना मुम्किन था? इसका जवाब शायद 'नहीं' होगा. तो ज़रा सोचिए और ये बहुत फिक्र करने वाला मौजू है.
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