)
नई दिल्ली: देश में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर एक बार फिर सियासत शुरू हो गई है. ख़ास बात ये है कि इस बार इसकी शुरुआत गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान से शुरू हुई है, जिसमें उन्होंने साफ़ और खुले तौर पर कहा है कि 2029 तक देश में भाजपा शासित सभी राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू कर दिया जाएगा. इसी साल देश में आम चुनाव भी होने हैं.
यहाँ ये उल्लेखनीय है कि भाजपा के एजेंडे में शामिल कश्मीर से धारा-370 की समाप्ति, राम मंदिर निर्माण और देश में CAA जैसे कानून को लागू करने के वादे पूरे हो चुके हैं. उसके बड़े एजेंडे में अब UCC अकेला ऐसा एजेंडा शेष रह गया है, जिसे लागू कर वो हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण कर चौथी बार सत्ता तक पहुँच सकती हैं. हालांकि, ये काम वो 2029 में लागू करने के बजाय काफी पहले से शुरू कर चुकी है. उत्तराखंड देश का पहला राज्य है, जहाँ 2025 में UCC लागू किया गया था. इसके बाद मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, असम और पश्चिम बंगाल जैसे भाजपा शासित राज्यों में UCC को लागू करने की कवायद चल रही है. कई राज्यों में इसके लिए ड्राफ्ट कमेटी का गठन किया जा चुका है, और इसका काम अपने अंतिम चरण में पहुँच चुका है. अमित शाह ने साफ़ तौर पर कहा है कि 2029 के पहले भाजपा शासित 21 राज्यों में UCC लागू कर दिया जाएगा. इसके बाद से ही मुस्लिम समाज में एक तरह का डर का माहौल पैदा हो गया है.
देश का मुस्लिम समाज उत्तराखंड में पिछले एक साल से बदले हुए हालात को बारीकी से देख रहा है. शादी-ब्याह और तलाक से लेकर, जायदाद के बंटवारे तक के क़ानून बदल गए हैं. उनके धार्मिक शिक्षण संस्थानों को निशाना बनाया जा रहा है. सरकार ने न सिर्फ मदरसा बोर्ड को भंग कर दिया है, बल्कि धार्मिक शिक्षा पर भी रोक लगा रही है. सरकारी मदरसों में सामान्य शिक्षा लागू किया जा चुका है, जबकि निजी मदरसों को तरह-तरह के बहाने बनाकर उन्हें टारगेट किया जा रहा है. मदरसे सील किए जा रहे हैं.
अमित शाह के बयान से जहाँ सत्ता पक्ष और सरकार समर्थक लोग खुश हैं, वहीं मुस्लिम समाज और विपक्ष इसे लेकर सरकार पर हमलावर है. विरोध की पहली वजह ये हैं कि UCC संविधान में दिए गए नागरिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है. भारत जैसे विविधता वाले देश में ये व्यावहारिक भी नहीं है. ये बात सरकार खुद समझती भी है. यही वजह है कि सरकार ने UCC के प्रावधानों से आदिवासी समाज को बाहर रखा है. उन पर UCC के नियम और कानून लागू नहीं होंगे. ऐसे में ये सवाल उठाना लाजिमी है कि जब UCC से आदिवासी समाज को बाहर ही रखना है, तो UCC लागू ही क्यों किया जा रहा है ? क्या ये सिर्फ मुसलमानों के लिए लाया जा रहा है. उन्हें उनकी धार्मिक पहचान और अधिकारों से वंचित करने के लिए ऐसा किया जा रहा है? सरकार ठीक चुनाव से पहले इसे लाकर और लागू कर हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहती है?
UCC पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान पर इस्लामिक विद्वान मुफ़्ती वजाहत कासमी ने कहा, "UCC देश के विकास में बहुत अहम भूमिका निभाएगा. दुनिया भर के सभी विकसित और शिक्षित देशों में UCC लागू है. 'एक देश, एक कानून और एक संविधान' होना चाहिए और पूरे देश में एक ही व्यवस्था लागू होनी चाहिए. देश में अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ नहीं होने चाहिए. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे सबसे पहले उत्तराखंड में लागू किया था और कई अन्य जगहों पर भी इसकी तैयारी चल रही है. चूंकि NDA सरकार फैसले लेने में मजबूत और असरदार है, इसलिए हमें उम्मीद है कि उसके कार्यकाल में पूरे देश में UCC लागू हो जाएगा. हम इसका स्वागत करते हैं."
यूनिफॉर्म सिविल कोड पर मोलाना यासुब अब्बास ने कहा," हम लोग यूनिफॉर्म सिविल कोड के खिलाफ शुरुआत से रहे हैं. हम लोग इसका विरोध करेंगे. अगर यह लागू करेंगे तो इस खिलाफत करेंगे. चुनाव का वक़्त है, इसलिए इस तरह की चीजों का इस्तेमाल किया जा रहा है.
मौलाना यासुब अब्बास (ऑल इंडिया शिया पर्सनल ला बोर्ड महासचिव)
गृहमंत्री अमित शाह के बयान यूनिफॉर्म सिविल कोड पर दारुल उलूम के प्रवक्ता मौलाना सुफियान निजामी ने कहा कि हर हिंदुस्तानी को हक है कि वह अपने धर्म के मुताबिक, अपने शादी-बयाह और ज़मीन जायदाद से जुड़े मामलों का संचालन करे. उन पर जबरन यूनिफॉर्म सिविल कोड थोपना एक साजिश का हिस्सा है. उन्होंने कहा कि चुनाव आने की वजह से भी इस तरह की चीजें आती हैं. अभी 2029 में काफी वक़्त है, जब इस तरंग की चीजें लागू होंगी, फिर हम इसका विरोध करेंगे.
मौलाना सुफियान निजाम, दारुल उलूम प्रवक्ता
ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन अपना पक्ष रखते हुए कहा कि मुसलमान पहले ही बता चुके हैं कि उनको यूसीसी कभी भी स्वीकार नहीं है लेकिन अगर जबरदस्ती उनके ऊपर लागू किया जाता है, तो वह इसको मानेंगे नहीं बल्कि इसका विरोध करेंगे. मौलाना शहाबुद्दीन ने कहा कि सरकार को पहले यूसीसी से होने वाले मुसलमान को दिक्कतों को देखना चाहिए. उसके बाद यूसीसी को लागू करें उन्हें कोई आपत्ति नहीं है. फिलहाल किसी भी मुसलमान को UCC कबूल नहीं है.
मौलाना शाहबुद्दीन बरेलवी, अध्यक्ष , आल इंडिया मुस्लिम जमात
बिहार में भी समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है. जदयू के वरिष्ठ विधायक श्याम रजक के बिहार में UCC लागू नहीं होने के बयान के बाद अब हम सेकुलर के अध्यक्ष और बिहार सरकार में मंत्री संतोष सुमन ने अलग रुख सामने रखा है. उन्होंने कहा कि UCC पर विचार-विमर्श के बाद ही कोई फैसला होगा. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अमित शाह ने UCC को लेकर बात कही है, तो उसमें कुछ अच्छी बातें होंगी. इसे लागू करने में क्या दिक्कत है?
संतोष सुमन, हम नेता, बिहार सरकार में मंत्री
UCC बहुत सारे प्रदेश लागू भी कर चुके हैं, बहुत सारे प्रदेश लागू भी करेंगे. ये देश हित में ज़रूरत भी है. निश्चित रूप से गृह मंत्री ने सोच समझ के बयान दिया होगा. पूरा काम करके ही वो बयान देते हैं। लागू होना भी चाहिए."
सतीश चंद्र दुबे, केंद्रीय मंत्री
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के 2029 से पहले सभी 21 NDA राज्यों में UCC लागू करने के बयान पर BJP सांसद तरुण चुघ ने कहा, "गृह मंत्री अमित शाह ने 21 राज्यों में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू करने की घोषणा की है. यह एक स्वागत योग्य कदम है. प्रधानमंत्री मोदी ने तीन तलाक खत्म करके मुस्लिम महिलाओं का सम्मान बहाल किया और अब UCC इस सफर का अगला कदम है."
तरुण चुघ, BJP सांसद
कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने कहा, "क्या UCC से आर्थिक स्थिति ठीक हो जाएगी? क्या UCC से बेरोजगारी खत्म हो जाएगी? क्या UCC से पेट्रोल और डीजल की कीमतें कम हो जाएंगी? आप 21 राज्यों में UCC लागू करेंगे. UCC का मतलब है सिविल कोर्ट के अंदर यूनिफॉर्मिटी आनी चाहिए. आज हिंदुओं का, मुसलमानों का, क्रिश्चियन का पर्सनल कानून है. आप उन कानूनों को 21 जगह बना देंगे. यह एक ज़िद है मुसलमानों के खिलाफ."
कांग्रेस नेता राशिद अल्वी
.