)
Mohan Das Karamchand Gandhi Birthday: आज भारत सहित पूरी दुनिया में राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म दिन मनाया जा रहा है. गांधी को याद किया जा रहा है. उनके बताये रास्ते पर चलने का अज्म लिया जा रहा है. मोहनदास करमचंद गांधी 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में पैदा हुए थे और 30 जनवरी 1948 को दिल्ली में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई. मोहनदास करमचंद गांधी (Mohan Das Karamchand Gandhi) का देश की आज़ादी में अमूल्य योगदान है. उन्होंने दुनिया को जो सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह का दर्शन दिया वह अपने आप में अप्रतिम है.
मोहनदास करमचंद गांधी एक समावेशी समाज और देश की कल्पना करते थे. सत्य, अहिंसा, शान्ति, भाईचारा, स्वदेशी और सादगी पर जोर देते थे. जो कहते थे पहले खुद उसपर अमल करते थे. उनका दर्शन व्यावहारिक था. इतिहासकार मानते हैं कि दर्शन पर इस्लाम का घोर प्रभाव था. जेल में रहते हुए उन्होंने सभी धर्मों के अध्ययन के साथ इस्लाम का भी गहन अध्ययन किया था.
देश- दुनिया के मुसलमान गांधी से प्रेम करते हैं और करते थे. गांधी के प्रति मुसलमानों का ये प्रेम और गांधी का उनके प्रति प्रेम ही कुछ लोगों के बीच गांधी के प्रति घृणा और फिर उनकी हत्या की वजह बन गई.
कुछ इतिहासकार यहाँ तक मानते हैं कि मोहनदास करमचंद गांधी (Mohan Das Karamchand Gandhi) को महात्मा बनने के पीछे भी कुछ मुसलामानों का साथ और सहयोग शामिल है. अगर दादा अब्दुल्ला अपना केस लड़ने के लिए बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी को दक्षिण अफ्रीका नहीं बुलाया होता, और फिर बिहार के स्थानीय पत्रकार मुनीश ने बार- बार चिट्ठी लिखकर बैरिस्टर और एक उभरते आन्दोलनकारी नेता मोहनदास करमचंद गांधी को चंपारण न बुलाया होता, तो हो सकता है कि मोहनदास करमचंद गांधी की राह कुछ और हो सकती थी.
जब मोहनदास करमचंद गांधी (Mohan Das Karamchand Gandhi) लंदन से कानून की पढ़ाई करने के बाद बैरिस्टर के रूप में भारत लौटे थे, तो खुद को एक वकील के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे. उनका संघर्ष भी वही था, जो दुनिया के हर नए वकील का होता है. उस वक़्त उन्हें दक्षिण अफ्रीका जाकर एक केस की पैरवी करने का शानदार अवसर मिला था. उस अवसर ने एक ऐतिहासिक प्रक्रिया की नींव रखी जिसने 'बैरिस्टर एम के गांधी' को 'महात्मा गांधी' और 'राष्ट्रपिता' में तब्दील कर दिया.
दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ सत्याग्रह के जरिये अपनी लड़ाई लड़ने और इसमें काबिले जिक्र कामयाबी हासिल करने वाले गांधीजी जब 1915 में भारत लौटे, तो अंग्रेजों के खिलाफ यहाँ भी उनका उनका पहला हथियार सत्याग्रह ही बना. भारत लौटने के बाद उन्होंने जो पहला अभियान चलाया, वह प्रसिद्ध '1917 का चंपारण किसान संघर्ष' था. किसान नेता शेख गुलाब (1857-1920) और पत्रकार पीर मुहम्मद अंसारी मुनीस (1882-1949) ने 'चंपारण किसान संघर्ष' की मजबूत नींव रखी थी. इस तरह नील के बागानों और कारखानों के ब्रिटिश मालिकों और गांधीजी के चंपारण आगमन से पहले उनका समर्थन करने वाले अंग्रेज अधिकारियों के खिलाफ एक दशक तक उन दोनों ने इस संघर्ष को अपने बल-बूते जिंदा रखा था. पीर मुनीस ने न सिर्फ गांधीजी को चंपारण आमंत्रित करने वाला ज्ञापन तैयार किया, बल्कि स्थानीय कांग्रेसी नेता राज कुमार शुक्ल (1875-1929) के साथ लखनऊ में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में गए और गांधी से मिलकर 'चंपारण किसान संघर्ष' को मजबूती देने का आग्रह किया और उन्हें चंपारण बुलाया. आगे चलकर यही चंपारण आन्दोलन गांधी जी के भारतीय राजनीतिक जीवन का पहला आन्दोलन बना गया.
मोहनदास करमचंद गांधी अगर भारत आकर यहाँ की राजनीति में शामिल होने के लिए वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और समाज सुधारक गोपाल कृष्ण गोखले को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे, तो भारत आने के पहले दक्षिण अफ्रीका में दादा अब्दुल्ला को अपना मार्गदर्शक और अभिभावक मानते थे.
दादा अब्दुल्ला गांधी के एक मार्गदर्शक के रूप में
दक्षिण भारतीय इतिहासकार सैयद नसीर अहमद अपनी किताब MAHATHMA GANDHI : MUSLIM ASSOCIATES & FOLLOWERS, 2020 Azad House of Publications,Amaravathi Road,Guntur Dist, Andhrapradesh में लिखते हैं, गाँधीजी का दादा अब्दुल्ला के साथ जुड़ाव और दक्षिण अफ्रीका में उनके सामने आई परिस्थितियों ने बैरिस्टर एम.के. गाँधी का ध्यान सार्वजनिक कार्यों की तरफ मोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. अब्दुल्ला दक्षिण अफ्रीका में मेसर्स दादा अब्दुल्ला एंड कंपनी के प्रमुख साझेदार थे. दादा अब्दुल्ला का पूरा नाम अब्दुल्ला हाजी आदम झावेरी था. वे गांधीजी के आबाई शहर पोरबंदर, गुजरात प्रान्त के मूल निवासी थे. उनकी व्यावसायिक फर्म से संबंधित कई मुकदमे दक्षिण अफ्रीका की अदालतों में चल रहे थे.
मेसर्स दादा अब्दुल्ला एंड कंपनी के एक साझेदार शेख अब्दुल करीम झावेरी ने गाँधी को उन मुकदमों में अपने वकीलों की मदद के लिए दक्षिण अफ्रीका आमंत्रित किया था. जब गाँधी 1892 में दक्षिण अफ्रीका पहुँचे, तो दादा अब्दुल्ला ने खुद बंदरगाह पर गाँधी का इस्तकबाल किया और उन्हें अपनी फर्म के क्वार्टर में ले गए थे. तब से दादा अब्दुल्ला दक्षिण अफ्रीका में उनके सभी प्रयासों में गाँधी के मार्गदर्शक बने रहे. गांधीजी ने देखा कि दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ किस तरह भेदभाव किया जाता था, और उन्होंने खुद भी कई मौकों पर इसका अनुभव किया. वे वहाँ भारतीयों की लाचारी को समझने लगे थे. उन्होंने दादा अब्दुल्ला और उनके सहयोगियों से इस सम्बन्ध में और भी जानकारी हासिल की. दादा अब्दुल्ला ने इस संबंध में गांधीजी के सामने आने वाली कई परिस्थितियों में उनका मार्गदर्शन भी करते थे.
दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए ऐसे कई मौके आए जब दादा अब्दुल्ला ने गांधीजी को वहां के कुछ स्थानीय तौर- तरीकों को अपनाने से यह कहते हुए रोक दिया कि ये दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के आत्मसम्मान के लिए नुकसानदेह होंगे. वहां रहने वाले भारतीय अपनी अलग पहचान के साथ रहते थे और उसपर गर्व करते थे. इस बात का ज़िक्र गांधीजी ने अपनी आत्मकथा‘सत्य के साथ मेरे प्रयोगों की कहानी’में खुद किया है.
22 मई 1894 को दादा के साथ नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना
दक्षिण अफ्रीका में लंबे अरसे से रह रहे भारतीयों के वोटिंग राईट को ख़त्म करने के लिए दक्षिण अफ्रीकी सरकार द्वारा एक कानून पास किया जाना था. भारतीय समुदाय इसका विरोध कर रहे थे. सरकार पर इसके खिलाफ दबाव बनाने और भारतियों के हक़ के लिए लड़ने को 22 मई 1894 को दादा अब्दुल्ला की पहल पर नेटाल इंडियन कांग्रेस नाम के एक संगठन की स्थापना की गई. दादा अब्दुल्लाह इस संगठन के अध्यक्ष बने और गांधीजी को नेटाल इंडियन कांग्रेस का सचिव बनाया. हाजी मोहम्मद हाजी दादा, अब्दुल कादिर, हाजी दादा हाजी हबीब, मूसा हाजी एडम, पी. दावजी महोमेद, पीरन महोमेद, हुसेन मिरान, एडमजी मियांखान, मूसा हाजी कासिम, महोमेद कासिम जीवा, दाऊद महोमेद, हुसेन कासिम आमोद तिली, उमर हाजी अबा, हाजी महोमेद (पी.एम.बर्ग), कैमरूडीन (पी.एम.बर्ग) इस संगठन के प्रमुख मेंबर और पदाधिकारी बने थे. गुलाम हुसेन रंदेरी, शमशूदीन, जी.ए. जैसे प्रमुख व्यक्ति बासा, इब्राहिम एम. खत्री, शेख फरीद, वरिंद इस्माइल, जोसुब अब्दुल करीम, इस्माइल कादिर, ईसोप कदुआ, महोमेद एसाक, महोमेद हाफजी, उस्मान अहमद और मोहम्मद तैयब, कार्यकारी समिति में थे.
गांधीजी को यहीं से मिली सार्वजनिक जीवन में उतरने की प्रेरणा
गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, "नेटाल इंडियन कांग्रेस में सक्रिय रूप से काम करने और से मुझे सार्वजनिक काम सीखने के अवसर मिले और मैंने इसके लिए अपनी क्षमता का कुछ अंश अर्जित किया." दक्षिण अफ्रीका में अपने 21 वर्षों के प्रवास के दौरान, गांधीजी को कई लोगों से, मुख्यतः हाजी ईसा समद, अब्दुल गनी, मोहम्मद खासिम, कमरुद्दीन, आदमजी मिया खान और दाऊद सेठ से, उनके द्वारा किए गए संघर्ष के लिए पूर्ण सहयोग मिला. सत्याग्रह आंदोलन और फीनिक्स समझौते को भौतिक और नैतिक समर्थन देने के अलावा, दादा अब्दुल्ला ने अपने व्यापारिक साझेदारों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करने के सफल प्रयास किए. अपने लेख‘दादा अब्दुल्ला और महात्मा गांधी’में इसका ज़िक्र करते हुए प्रो. योदेंद्र यादव ने लिखा है, "हम कह सकते हैं कि दादा अब्दुल्ला दक्षिण अफ्रीका सत्याग्रह आंदोलन में महात्मा गांधी के पहले समर्थक थे. उन्होंने उन्हें एक पिता की तरह ही शिक्षा दी और उनका समर्थन किया."
गांधीजी के साथ भारत आए इमाम साहब
एक मुक़दमे की पैरवी करने दक्षिण अफ्रीका गए बैरिस्टर गांधी वहां भारतीय के हक़ के लिए लड़ने वाले और सत्याग्रह आंदोलन चलाने वाले एक नेता नेता बन चुके थे. इस आन्दोलन से वहां भारतीय के हक़ में कई बदलाव हुए. लेकिन गांधीजी 1915 में अपने आश्रम और अन्य गतिविधियों को 1914 में अपने सहयोगियों को सौंपकर भारत वापस लौट आये. उस वक़्त गांधीजी के साथ फीनिक्स आश्रम के एक सहयोगी इमाम अब्दुल खादिर बावजीर (-1931) भी भारत आ गए थे. उन्होंने गांधीजी द्वारा भारत में स्थापित साबरमती आश्रम में प्रिंटिंग प्रेस का काम संभाला. अब्दुल खादिर की पत्नी साहिबा, उनकी बेटियाँ फातिमा बेगम और अमाना कुरैशी (1905-1967) भी प्रिंटिंग प्रेस में काम करती थीं. इमाम अब्दुल ख़ादिर, जिन्हें गांधीजी प्यार से 'इमाम साहब' कहते थे और प्यार से अपने भाई की तरह मानते थे, और उनका परिवार साबरमती आश्रम में गांधीजी के परिवार के साथ रहता था.
मुस्लिम माइनॉरिटी से जुड़ी ऐसी खबरों के लिए विजिट करें https://zeenews.india.com/hindi/zeesalaam