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Bihar Election 2025: बिहार में विधानसभा इलेक्शन होने वाले हैं. इस बीच पीएम नरेंद्र मोदी गयाजी जिले पहुंचे और बिहार को 6800 करोड़ की सौगात दी. इस ऐलान के बाद बिहार का सियासी पारा हाई हो गया. इस बीच, सियासी जानकार और लोग आपस में चर्चा कर रहे हैं कि क्या बिहार में इस घोषणा के बाद राजनीतिक समीकरण बदलेंगे और क्या यह एनडीए गठबंधन का मास्टरस्ट्रोक है. ऐसे में आज हम आपको बिहार के गयाजी जिले की इमामगंज विधानसभा सीट के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां विधानसभा चुनाव 2025 में किस पार्टी के जीतने की संभावना है. आइए जानते हैं.
गया जिले में मौजूद इमामगंज विधानसभा सीट न सिर्फ़ सियासी दृष्टि से, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी काफी अहम है. इमामगंज का नाम मुस्लिम शासक राजा इमाम बख्श ख़ान से जुड़ा है. इससे इस इलाके की ऐतिहासिक पहचान मुसलमानों से जुड़ती है. यहां आदिवासियों और चेरो विद्रोहियों के बीच मुस्लिम ज़मींदार भी प्रभावशाली रहे हैं. इसी तरह, बिहार इलेक्शन में भी मुसलमान इस विधानसभा में किंगमेकर की भूमिका निभाते हैं. खासकर तब जब पिछड़ों, महादलितों और दलितों के वोटों में बंटवारा होता है. इस सीट पर करीब 17 फीसद मुस्लिम वोटर्स हैं.
इमामगंज में करीब 17 फीसद मुस्लिम वोटर्स हैं. इस इलाके में मुस्लिम समुदाय मुख्य रूप से छोटे किसान, व्यापारी, दस्तकार और मेहनतकश वर्ग से बनता है. यहां की बड़ी मुस्लिम आबादी कारीगर तबकों और किसानों से जुड़ी है. गढ़ा-लोहे का काम, बढ़ईगीरी, बुनकरी और खेती-बाड़ी इनकी आम पहचान है. इमामगंज में मुस्लिमों का एजुकेशन का स्तर औसत से कम है. हालांकि, नई पीढ़ी धीरे-धीरे हायर एजुकेशन और सरकारी नौकरी की तरफ बढ़ रही है. यहां बेरोजगारी का आलम यह है कि मुस्लिम नौजवान खाड़ी देशों और दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में रोज़गार की तलाश में पलायन करते हैं.
1980 तक कांग्रेस का था दौर
वाजेह हो कि इमामगंज विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र गया जिले में स्थित है और औरंगाबाद लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आता है. यह सीट अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित है, इसलिए कोई भी मुस्लिम, पिछड़ा, अत्यंत पिछड़ा और उच्च जाति का व्यक्ति इस सीट से इलेक्शन नहीं लड़ सकता है, लेकिन मुसलमानों का इतना प्रभाव है कि उनके समर्थन के बिना किसी भी दल की जीत आसान नहीं है. आज़ादी के बाद से लेकर 1980 तक मुसलमान कांग्रेस के साथ मजबूती से जुड़े रहे. इमामगंज में कांग्रेस की शुरुआती जीतों में मुस्लिम वोटरों का बड़ा योगदान रहा. उस दौर में मुसलमान कांग्रेस को अपनी राजनीतिक सुरक्षा और पहचान का सहारा मानते थे.
नीतीश, मांझी फैक्टर के बाद राजद का दबदबा
नीतीश कुमार की सियासत में जब जीतन राम मांझी उभरे, तो मुसलमानों का बड़ा हिस्सा उनके साथ चला गया. मांझी ने दलित और मुस्लिम समाज को जोड़कर मजबूत समीकरण बनाया. यही वजह रही कि 2015 और 2020 में उन्होंने इस सीट पर जीत दर्ज की. मुसलमानों ने उन्हें बीजेपी-विरोधी विकल्प मानकर समर्थन दिया. वहीं, हाल के सालों में राजद (RJD) की ताकत औरंगाबाद लोकसभा क्षेत्र में बढ़ी है. 2024 लोकसभा चुनाव में राजद को छह की छह विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली, जिसमें मुस्लिम वोटरों की निर्णायक भूमिका रही. इमामगंज में लगभग 17 फीसद मुस्लिम वोट हैं, जो राजद के लिए स्वाभाविक बढ़त का काम करते हैं.
जन सुराज का असर
वहीं, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने 2024 के उपचुनाव में 37,000 से ज्यादा वोट हासिल किए. इसमें मुस्लिम युवाओं का भी एक हिस्सा शामिल था. PK का "सामाजिक न्याय और विकास" वाला नैरेटिव मुस्लिम समाज को आकर्षित कर रहा है. यह संकेत है कि मुसलमानों का एक वर्ग बदलाव की तलाश में है. हालांकि, यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि यह सीट कौन सी पार्टी जीतेगी. कुल मिलाकर इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला होने की संभावना है.