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कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें भी इस चलन की तरफ इशारा करती हैं और इंडिया हेट लैब की रिपोर्टों के मुताबिक, मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने वाले भाषणों में साफ बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे सामाजिक बंटवारे की चुनौतियों की तरफ ध्यान दिलाते हैं. मकसद किसी समुदाय को कठघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि उस माहौल पर ध्यान देना है, जहाँ नफरत आम होती जा रही है. जब किसी एक पर जुल्म होता है, तो उसका घाव पूरे देश को लगता है.
हिंसा के प्रमुख कारण
इस हालात के पीछे कई वजहें हैं. सबसे बड़ी वजह राजनीतिक बंटवारा है. जब राजनीति "हम" और "वो" के आधार पर खड़ी होने लगे, तो समाज में अविश्वास और दूरियाँ बढ़ना तय है. किसी पूरे वर्ग को "वोट बैंक", "घुसपैठिया" या "खतरा" जैसे शब्दों में पेश करना आपसी एकता को कमजोर करता है.
दूसरी वजह नफरती भाषण का आम हो जाना है. कुछ मंचों, सोशल मीडिया और सार्वजनिक भाषणों में ऐसे शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं जो किसी पूरे धार्मिक वर्ग के खिलाफ नफरत और दुश्मनी को बढ़ावा देते हैं. तहसीन पूनावाला बनाम भारत संघ (2018) में सुप्रीम कोर्ट ने भीड़ की हिंसा को कानून के राज के लिए गंभीर खतरा माना और सरकारों को सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए. यह याद रखना जरूरी है कि बोलने की आज़ादी का मतलब किसी वर्ग की बेइज्जती या उसके खिलाफ नफरत फैलाने की छूट नहीं है.
तीसरी वजह कानून लागू करने को लेकर उठने वाले सवाल हैं. जब अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई में देरी हो या इंसाफ होता हुआ न दिखे, तो समाज में यह सोच बनती है कि भीड़ कानून से ऊपर है. किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए यह सबसे खतरनाक स्थिति है.
सोशल मीडिया ने इस समस्या को और उलझा दिया है. झूठे वीडियो, फर्जी खबरें और सांप्रदायिक अफवाहें कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती हैं. डिजिटल दुनिया की यह नफरत कई बार असली दुनिया में खून-खराबे की वजह बन जाती है.
इसका असर पूरे देश पर
सबसे पहला असर डर और अनिश्चितता का माहौल है. जब किसी नौजवान को सिर्फ उसके नाम, दाढ़ी, टोपी या हिजाब की वजह से शक की नजर से देखा जाए, तो उसके मन में अपने ही देश के बारे में असुरक्षा पैदा होती है. इससे समाज में अलगाव और "मुहल्लों में सिमटने" की सोच बढ़ती है.
दूसरा, असर आर्थिक है. अगर किसी कारोबारी या मजदूर का बहिष्कार सिर्फ उसकी धार्मिक पहचान की वजह से किया जाए, तो नुकसान सिर्फ उस व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था का होता है.
तीसरा असर भारत की दुनिया भर में साख पर पड़ता है. दुनिया भारत को सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में देखती है. इसलिए धार्मिक आज़ादी, कानून का राज और बराबरी से जुड़े सवाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अहमियत रखते हैं.
सबसे बड़ा नुकसान हमारी गंगा-जमुनी संस्कृति को होता है. यही वह संस्कृति है जहाँ मंदिरों के निर्माण में मुस्लिम कारीगर अपना हुनर दिखाते हैं, और अजमेर शरीफ जैसी दरगाहों पर हर धर्म के लोग श्रद्धा से हाजिरी देते हैं. यही हिंदुस्तान की असली पहचान है.
कुरान और संविधान का संदेश
इस समस्या का पहला हल कानून का बराबर और निष्पक्ष राज है. भीड़ की हिंसा, नफरत पर आधारित अपराध और नफरती भाषण के मामलों में तुरंत, निष्पक्ष और साफ-सुथरी कार्रवाई होनी चाहिए. किसी भी रसूखदार व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं समझा जाना चाहिए.
राजनीति को भी धार्मिक बंटवारे से बाहर निकलना होगा. वोट शिक्षा, सेहत, रोजगार और विकास के नाम पर माँगे जाएँ, न कि धार्मिक भावनाएँ भड़का कर. शिक्षा, बातचीत और आपसी मेल-जोल को भी बढ़ावा देना होगा. स्कूलों और विश्वविद्यालयों में साझी विरासत, संविधान और सभी धर्मों के योगदान को बराबरी से पढ़ाया जाए. धार्मिक नेता और संत मिलकर शांति और एकता का संदेश दें.
मीडिया की भी बड़ी जिम्मेदारी है. खबर का मकसद आग लगाना नहीं, सच्चाई सामने लाना होना चाहिए. सनसनी और नफरत से टीआरपी मिल सकती है, मगर देश नहीं बनता.
मुस्लिम समाज के नाम एक संदेश
मुस्लिम समाज को शिकायत करने के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी समझना होगा. कुरान कहता है: "ऐ लोगो! हमने तुम्हें एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हें क़बीलों और बिरादरियों में इसलिए बाँटा ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो. अल्लाह के नज़र में सबसे ज़्यादा इज्जत वाला वही है जो सबसे ज़्यादा नेक है." (सूरह अल-हुजुरात 49:13)
मुसलमानों का जवाब गुस्सा नहीं, बल्कि शिक्षा, कारोबार और अच्छे व्यवहार होना चाहिए. डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, अज़ीम प्रेमजी और इरफ़ान पठान जैसी शख्सियतें बताती हैं कि ज्ञान, सेवा और अच्छे चरित्र से दिल भी जीते जा सकते हैं, और देश भी मजबूत होता है. हर नाइंसाफी का जवाब अदालत, संविधान और शांति के रास्ते से दिया जाना चाहिए, न कि भावनात्मक टकराव से.
निष्कर्ष
भारत का मुसलमान किसी खास छूट या मेहरबानी का चाहने वाला नहीं है. वह सिर्फ वही हक चाहता है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 25 हर हिंदुस्तानी को देते हैं—बराबरी, इज्जत, धार्मिक आज़ादी और कानून का बराबर संरक्षण. हिंदुस्तान की असल आत्मा नफरत में नहीं, बल्कि उस साझी संस्कृति में बसती है जहाँ मंदिर की घंटियाँ और मस्जिद की अज़ान एक-दूसरे के लिए खतरा नहीं, बल्कि इस देश की रंग-बिरंगी पहचान का हिस्सा हैं. आज जरूरत किसी एक वर्ग की जीत या हार की नहीं, बल्कि संविधान, इंसाफ, शांति और सामाजिक एकता की रक्षा की है, क्योंकि नफरत कभी किसी कौम को महान नहीं बनाती; देशों का निर्माण इंसाफ, मुहब्बत और इंसानियत से होता है.
लेखक- मुहम्मद उस्मान एडवोकेट अज़हरी, मुस्लिम स्कॉलर