आजाद हिन्दुस्तान की तारीख की पहली मुस्लिम खातून वजीरे आला के तौर पर उन्होंने काम किया
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नई दिल्ली/ मासूम सिद्दीकी: असम की साबिका वजीरे आला सैयदा अनवरा तैमूर का लम्बी बीमारी के बाद इंतेकाल हो गया है. 84 साला सैयदा अनवरा आस्ट्रेलिया में अपने बेटे के यहां रहकर इलाज करा रही थी. जहां लम्बी बीमारी के बाद उनकी मौत हो गई. सैयदा की मौत के बाद उन्हें खिराज-ए-अकीदत पेश करने वालों का तांता लग गया. पीएमओ इंडिया और कांग्रेस के अलावा दिगर लीडरान ने भी ट्वीट कर उन्हें खिराजे अकीदत पेश किया.
आज़ाद हिंदुस्तान की पहली मुस्लिम खातून वज़ीरे आला
24 नवम्बर 1936 को पैदा हुई सैयदा अनवरा तैमूर असम कांग्रेस की सरगर्म कारकुन थी. अपनी मेहनत और काबलियत के बूते वे 6 दिसम्बर 1980 को रियासत की वजीरे आला बनाई गईं. आजाद हिन्दुस्तान की तारीख की पहली मुस्लिम खातून वजीरे आला के तौर पर उन्होंने काम किया.
अनवरा की तालीम और सियासी सफर
सैयदा अनवरा 1956 में देवचरन बरुआ गर्ल्स कॉलेज, जोरहाट में इकोनामिक्स की लेक्चरर थीं. वह 1972, 1978, 1983 और 1991 में असम से एमएलए रह चुकी हैं. 1988 में उन्हें राज्यसभा के लिए मुंतखब किया गया. उन्होंने रियासती कैबिनेट में भी बतौर वजीर के तौर पर काम किया है. बाद में अनवरा 2011 में ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट में शामिल हुई.
कब आई थीं चर्चा में
साल 2018 के अगस्त महीने में असम में जारी हुए नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (एनआरसी) के फाइनल ड्राफ्ट में 40 लाख से ज्यादा लोगों का नाम नहीं था. इन्हीं लोगों में असम की वाहिद मुस्लिम खातून वजीरे आला रहीं सैयदा अनवरा तैमूर भी शामिल थीं. इस बात को लेकर उस वक्त तरह-तरह के सवाल उठाये गये थे.
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