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नई दिल्ली: किसान बिल की मुखालिफत करते हुए गुज़िश्ता रोज़ पंजाब असेंबली में अपोज़ीशन का किरदार अदा कर रही शिरोमणि अकाली दल ने NDA (National Democratic Alliance) का साथ छोड़ दिया है. अकाली दल 1997 से NDA का हिस्सा थी. इससे पहले इसी बिल की मुखालिफत में अकाली दल की जानिब से मरकज़ी हुकूमत में कैबिनेट मिनिस्टर रहीं हरसमिरत कौर ने भी मोदी हुकूमत के साथ छोड़ दिया था.
अब सवाल यह उठता है कि 23 सालों से भाजपा की पॉलिसियों के साथ खड़ी रहने वाली अकाली दल के सामने ऐसी क्या मजबूरी आ गई कि उसे NDA का से हाथ झटकना पड़ा. दरअसल इसकी कई वजहें सामने आ रही हैं. तो आइए हम आपको अकाली दल की उन मजबूरियों से आपको आगाह कराते हैं.
पंजाब में 2022 में होने वाले इंतेखाबात
सबसे अहम वजह है कि अगले साल यानी 2022 में पंजाब में असेंबली इलेक्शन होने वाले हैं और अकाली दल की पंजाब के किसान और सिख तबके अच्छी पकड़ है. पंजाब के लगभग 90 फीसदी किसान जट्ट हैं. लिहाज़ा किसानी मुद्दों का सीधा संबंध सिख तबके से भी है. इसीलिए साल 2022 में होने वाले चुनावों में अकाली दल अपना वजूद बनाना चाहता है, क्योंकि 2017 के इतेखाबात में अकाली महज़ 17 सीटों पर ही सिमट कर रह गई थी.
कांग्रेस ने भी किया मजबूर
पंजाब में फिलहाल कांग्रेस की हुकूमत है और जिस किसान बिल को मोदी हुकूमत ने किसानों के लिए क्रांति बताया है, कांग्रेस उसी बिल को ज़ोरदार मुखालिफत कर रही है और पंजाब के किसानों (अकाली दल का वोट बैंक) को लुभाकर अपनी तरफ खींच रही थी. कांग्रेस बार-बार सवाल खड़े रही थी कि अकाली दल किसान मुखालिफ है, इसीलिए वो मरकज़ी हुकूमत के इन बिलों के साथ खड़ी नज़र आ रही है. अकाली दल ने अपना वोट बैंक को कायम रखने पहले हुकूमत का साथ छोड़ा और बाद में एनडीए से अलग हो गई.
भाजपा को नहीं पड़ेगा कोई फर्क
बता दें कि अकाली दल के अलग होने से मोदी हुकूमत को कोई खासा नुकसान नहीं होने वाला. क्योंकि लोक सभा में भाजपा के पास मुकम्मल अकसरियत है और अकाली दल के लोक सभा में महज़ दो और राज्यसभा में तीन एमपीज़ है. इसलिए मोदी सरकार के लिए फिलहाल कोई चुनौती नहीं लेकिन अपने पुराने साथी शिरोमणि अकाली दल के नाता तोड़ लेने से बीजेपी के लिए एक खटका जरूर है.
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