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Islamic Knowledge: इस्लाम में एकेश्वरवाद यानी एक खुदा की इबादत की जाती है और आइडल वर्शिप यानी मूर्ति पूजा को शिर्क (महापाप ) के तौर पर देखा जाता है. इब्राहिम (अलैहि.) के जमाने से ही हमेशा एक खुदा की इबादत होती आई थी, खुदा की तरफ से भेजे गये सभी पैगंबरों ने अपने लोगों को यही पैगाम दिया था. हज़रत इब्राहिम भी एक ही खुदा को मानने वाले थे और उन्होंने अपने लोगों से एक खुदा की इबादत करने के लिए कहा, और काबे की तामीर की, लेकिन फिर काबे में मूर्तियां कहां से पहुंच गईं और इनकी इबादत कैसे शुरू हो गई? आइये जानते हैं पूरी डिटेल.
उस वक्त के लोगों को हज़रत इब्राहिम (अलैहि.) और हज़रत इस्माइल (अलैहि.) से बेइंतेहां मोहब्बत थी. दोनों ने ही काबे की तामीर की थी, ताकि मुसलमान वहां नमाज़ अदा कर सके और उसका तवाफ कर सकें. अब उस दौर के लोगों ने इसके आस-पास के पत्थरों को भी पाक मानना शुरू कर दिया और उसे घर में लेजाकर उनकी परिक्रमा करना शुरू कर दिया.
लोगों का मानना था कि ये पत्थर खुदा और उनके बीच का जरिया है, वह जो भी दुआ मांगते, इस पत्थर के जरिए मांगते थे. आलम ये था कि अगर कोई बिजनेस या सफर पर जाया करता तो अपने साथ पत्थर ले लिया करता, ताकि उनके काम में बरकत हो सके और सफर के दौरान महफूज रहें. धीरे-धीरे तुफैल से मांगना बुतों की पूजा में तब्दील हो गया. हालांकि, इसे होने में कई शताब्दियां लगीं.
मोहम्मद इनायतुल्लाह सुब्हानी अपनी किताब 'जीवनी हज़रत मुहम्मद (स.अ)' में लिखते हैं लोग इन पत्थरों को ऐसे चूमते थे जैसे 'हजरे असवद' को चूमा जाता है. इस तरह वह अकीदा जिसके लिए हज़रत इब्राहिम (अलैहि) ने जद्दोजहद की थी वह वापस लौट आया.
इस अकीदा को और पुख्ता पहाड़ से फूटी ज्वालामुखी ने कर दिया. लोगों ने उससे निकली पत्थरों को उठाकर उनकी इबादत करनी शुरू कर दी और इन्हें आसमान से टूटी रूहानी सितारे समझने लगे. अब लोगों में इतनी बुतपरस्ती फैल गई कि अगर कोई उन्हें ऐसा पत्थर मिलता जिसकी बनावट जानदार की शक्ल से मिलती जुलती होती तो वे उसे घर में ले आते और उसकी इबादत करना शुरू कर देते.
इसके बाद अरबों ने खुद पत्थरों को कांटना-छांटना शुरू कर दिया और फिर उसे शक्ल देते और उन्हें किसी बुजुर्ग या देवता के साथ जोड़ते और उसकी इबादत करना शुरू कर देते.
मक्का में सबसे पहली मूर्ति जो आई और काबा के आंगन में लगाई गई वह हुबल की थी. उसे लाने वाले शख्स का नाम अम्र-बिन-लुहय्यी था. वह कहीं सफर पर गया था, उसने रास्ते में देखा कि कुछ लोग एक मूर्ति की पूजा कर रहे हैं, उसने उनसे गुराजिश की वे उसे एक मूर्ति दे दें और वह उसकी इबादत करेंगे. लोग उसे हंसी खुशी मूर्ति देने को तैयार हो गए और वह इसे लेकर मक्का आ गया.
धीरे-धीरे मक्का में मूर्तियों के आने का सिलसिला शुरू हुआ. इनमें से दो अहम मूर्तियां इसाफ और नाइला थीं. ये जमजम के कुए पर लगा दी गई थीं, जो पूरी तरह से पट चुका था और लोग इसका नाम भी नहीं जानते थे.
हर कबीले की अपनी मूर्ति थी. मिसाल के तौर पर कुरैश उज़्ज़ा नाम की मूर्ति को पूजते थे. लात, ताइफ के एक कबीले सकीफ की मूर्ति थी और मनात मदीने के दो मशहूर कबीले औस और खसरज की मूर्ति थी.
अब काबा जिसे इब्राहिम (अलैहि.) और इस्माइल (अलैहि.) ने एक खुदा की इबादत के लिए बनाया था और इसे बड़ी तमन्नाओं से अपना अपना खून पसीना एक किया था. ये अब बुतों का घर बन गया, और कौम इब्राहिम अलैहिस्सलाम की तौहीद उनकी तालीम भूल बैठी.