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PM Narendra Modi appeal: एक दिन पहले प्रधानमंत्री ने मुल्क की अवाम से अपील की थी कि पेट्रोल-डीजल कम इस्तेमाल कीजिए, सोना कम खरीदिए, विदेश यात्राएं टालिए, खाने के तेल और खाद की खपत घटाइए और जहाँ तक मुमकिन हो 'वर्क फ्रॉम होम' अपनाइए. प्रधानमंत्री की इस अपील ने पूरे देश में एक नई बहस छेड़ दी है. सरकार इसे राष्ट्रीय हित में ज़रूरी कदम बता सकती है, लेकिन अवाम के मन में एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या यह अपील आर्थिक दूरदर्शिता का प्रतीक है या फिर नीतिगत असफलताओं की एक तरह से स्विकोरोक्ति है?
अगर मुल्क हकीकत में मुश्किल आर्थिक दौर से गुजर रहा है, तो सबसे पहले जिम्मेदारी किसकी बनती है, जनता की या सत्ता की? लोकतंत्र में किसी भी अपील का नैतिक असर तभी पड़ता है, जब नेतृत्व खुद अपने आचरण से उदाहरण पेश करे. लेकिन यहाँ स्थिति उलटी दिखाई दे रही है. अवाम से पेट्रोल बचाने को कहा जा रहा है, जबकि राजनीतिक रैलियों, बड़े आयोजनों और सरकारी दौरों पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं. अगर सचमुच ईंधन बचाना राष्ट्रीय प्राथमिकता है, तो क्या यह उचित नहीं होता कि प्रधानमंत्री और सरकार पहले खुद कुछ प्रतीकात्मक और व्यावहारिक कदम उठाते?
आवाम पूछ रही है कि पेट्रोल-डीजल कम खरीदने की अपील से पहले क्या यह मुमकिन नहीं था कि गैर- ज़रूरी राजनीतिक रैलियों को सीमित किया जाता? क्या सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों, विधायकों और सांसदों को बड़े-बड़े शक्ति प्रदर्शन के लिए बार-बार बुलाने की परंपरा रोकी नहीं जा सकती थी? क्या गंगा एक्सप्रेसवे और जेवर एयरपोर्ट जैसे उद्घाटन वर्चुअल माध्यम से नहीं किए जा सकते थे, जिनमें हजारों गाड़ियों और बसों का इस्तेमाल हुआ? अगर अवाम से त्याग माँगा जा रहा है, तो शुरुआत सत्ता के शीर्ष से होनी चाहिए थी.
यही नहीं, सवाल यह भी है कि जब देश आर्थिक दबाव में है, तब सांसदों और विधायकों को मिलने वाली अनेक मुफ्त सुविधाओं पर पुनर्विचार क्यों नहीं किया जाता? जनता से कहा जा रहा है कि वह खर्च कम करे, लेकिन नेताओं के लिए मुफ्त पानी, बिजली, यात्रा और अन्य विशेषाधिकार यथावत बने हुए हैं. अगर वास्तव में राष्ट्रीय संकट है, तो देशहित में सभी सांसदों, विधायकों और उच्च पदों पर बैठे प्रतिनिधियों के वेतन और सुविधाओं में अस्थायी कटौती क्यों नहीं की जाती? जनता के बीच यह भावना मजबूत हो रही है कि त्याग सिर्फ आम आदमी के हिस्से में आता है, जबकि सत्ता वर्ग खुद को उससे अलग मानता है.
इस पूरे विमर्श में एक बड़ा विरोधाभास 'स्वदेशी' और 'आत्मनिर्भरता' के नारों को लेकर भी सामने आता है. वर्षों से जनता से विदेशी सामानों के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने की अपील की जाती रही, लेकिन आलोचकों का इलज़ाम है कि खुद सत्ता और शीर्ष नेतृत्व के जीवन में विदेशी वस्तुओं, विदेशी तकनीक और विदेशी ब्रांडों का इस्तेमाल लगातार दिखाई देता रहा. जनता पूछती है कि अगर स्वदेशी वास्तव में राष्ट्रीय नीति का आधार है, तो उसका सबसे स्पष्ट उदाहरण नेतृत्व के आचरण में क्यों नहीं दिखाई देता?
किसी भी विचार की विश्वसनीयता सिर्फ भाषणों से नहीं, बल्कि व्यवहार से बनती है. अगर आम नागरिक से विदेशी वस्तुओं का त्याग करने को कहा जाए, लेकिन दूसरी तरफ सत्ता प्रतिष्ठान खुद आलीशान विदेशी सुविधाओं और व्यवस्थाओं का इस्तेमाल करता दिखे, तो स्वाभाविक रूप से जनता के भीतर संदेह पैदा होता है. यही वजह है कि सरकार की अपीलों को लेकर लोगों के बीच भरोसे का संकट बढ़ता जा रहा है.
सबसे गंभीर प्रश्न जवाबदेही का है. अगर पेट्रोल महँगा है, तो सरकार टैक्स कम क्यों नहीं करती? अगर खाद और खाने का तेल महँगा है, तो किसानों और उपभोक्ताओं के लिए ठोस राहत नीति कहाँ है? अगर विदेश यात्राएँ कम करने की बात कही जा रही है, तो क्या देश के भीतर पर्यटन, रोजगार और आय के पर्याप्त अवसर विकसित किए गए हैं?
विडंबना यह भी है कि 'वर्क फ्रॉम होम' की सलाह उस देश में दी जा रही है, जहाँ करोड़ों लोग दिहाड़ी मजदूरी, खेती, छोटे व्यापार, दुकानों और फैक्ट्रियों पर निर्भर हैं. एक रिक्शा चालक, मजदूर, किसान या दुकानदार घर बैठकर काम कैसे करेगा? यह सलाह सिर्फ उस सीमित वर्ग पर लागू होती है जिसके पास डिजिटल और कॉर्पोरेट नौकरियाँ हैं. लेकिन जो रोज कमाता और रोज खाता है, उसके लिए सरकार की योजना क्या है?
राजनीतिक आलोचक यह भी कह रहे हैं कि सरकार ने वक़्त रहते ज़रूरी आर्थिक तैयारी नहीं की. चुनावी राजनीति और प्रचार को प्राथमिकता दी गई, जबकि वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के संकेत पहले से मौजूद थे. विपक्ष के नेता Rahul Gandhi सहित कई लोगों ने पहले ही आर्थिक चुनौतियों को लेकर चेतावनी दी थी, लेकिन सरकार ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया. आज जब हालात कठिन हो रहे हैं, तो उसका बोझ जनता पर डाला जा रहा है.
जनता के भीतर यह धारणा भी बन रही है कि सरकार 'त्याग' की भाषा का इस्तेमाल अपनी जिम्मेदारी कम करने के लिए कर रही है. कोविड काल की यादें अभी भी ताजा हैं, जब लाखों मजदूरों और गरीबों ने भारी कठिनाइयाँ झेली थीं. अब एक बार फिर लोगों को डर है कि संकट का बोझ नीचे के वर्गों पर अधिक पड़ेगा, जबकि फैसले लेने वाले वर्ग पर उसका असर सीमित रहेगा.
अगर वास्तव में देशहित सर्वोपरि है, तो जनता यह भी अपेक्षा करती है कि प्रधानमंत्री और अन्य शीर्ष नेता गैर-जरूरी यात्राओं और भव्य आयोजनों को सीमित करें. लोग कह रहे हैं कि अगर तेल बचत की इतनी चिंता है, तो नेतृत्व खुद सादगी और संयम का उदाहरण प्रस्तुत करे. यही नैतिक नेतृत्व की पहली शर्त होती है.
देशभक्ति सिर्फ जनता से त्याग माँगने का नाम नहीं है. सच्ची देशभक्ति तब दिखाई देती है जब सत्ता, जनता के साथ बराबरी से कठिनाइयाँ साझा करे. अगर आम नागरिक से कुर्बानी माँगी जा रही है, तो नेताओं को भी अपने वेतन, सुविधाओं और सरकारी खर्चों में कटौती करके मिसाल पेश करना चाहिए.
आज देश की जनता भाषण नहीं, समाधान चाहती है. उसे रोजगार चाहिए, महँगाई से राहत चाहिए, किसानों को उचित दाम चाहिए, युवाओं को अवसर चाहिए और आर्थिक सुरक्षा चाहिए. लोकतंत्र में नेतृत्व का दायित्व जनता पर बोझ डालना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जहाँ नागरिक सम्मान और स्थिरता के साथ जीवन जी सकें. जनता अब सवाल पूछ रही है- और यह सवाल केवल अर्थव्यवस्था का नहीं, जवाबदेही और नैतिक नेतृत्व का भी है.
लेखक-
मुहम्मद उस्मान एडवोकेट अज़हरी मुस्लिम स्कॉलर हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं.