वादी की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस काम को रोज़गार के तौर पर अपनाकर ऊंची तालीम और आला किस्म की जिंदगी बसर कर रहे हैं. जम्मू कश्मीर में यह नस्ल फल फूल रही है
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फारूक़ वानी/श्रीनगरः मुल्क की नौजवान नस्ल इस वक्त परंपराओं को जाल समझकर मॉडर्न तरीके अपनाकर खुद को स्मार्ट और आगे समझ रही है. लेकिन इन सब के बीच मुल्क की सबसे खूबसूरत और दहशतगर्दों के खतरें के बीच पलती जगहों में से एक जम्मू कश्मीर के नौजवान की सोच थोड़ी अलग है. यहां के नौजवानों ने अपनी तांबे के बर्तन बनाने की सदियों की रिवायत को अब भी जिंदा रखा है.
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नौजवान कमा रहे रोजी-रोटी
वादी की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस काम को रोज़गार के तौर पर अपनाकर ऊंची तालीम और आला किस्म की जिंदगी बसर कर रहे हैं. जम्मू कश्मीर में यह नस्ल फल फूल रही है और हजारों लोगों को इससे रोज़गार के वसीले पैदा हो रहे हैं. तांबे के गिलास से चाय के कप, पानी के जग और सर्दियों के दौरान तांबे के स्टीमर बनाकर इसे नई तकनीक से जोड़ा जा रहा है. जिससे वादी के घरो में स्टीम होकर पानी पहुंच रहा है.
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शादी में होता है इन बर्तनों का इस्तेमाल
तांबे के बर्तनों में रिवायती अंदाज में शादी के मौकों पर लज़ीज़ पकवान बनाने के साथ तांबे के ही बर्तनों में ही खाए भी जाते हैं. कश्मीरी रिवायती समावार, हुका, इज़्बंद सूज, खाने की प्लेट तक सभी चीजें तांबे से ही तैयार की जाती हैं और हर परिवार की तरफ से दुल्हन को तांबे के बरतन भी दिए जाते हैं. नई मशीनों ने इस कारोबार को कुछ हद तक नुकसान पहुंचाया है, लेकिन इन सब के बावजूद परंपरा जिंदा है.
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तांबे के कई फायदें
तांबे के बर्तन में रखा पानी पूरी तरह शुद्ध माना जाता है, क्योंकि इसमें बैक्टेरिया को खत्म करने की शक्ति होती है. इसमें मौजूद कॉपर हमारी सेहत के लिए सबसे मुफीद चीज है जो इंसान की कॉपर की कमी को दूर करता है. घाटी में ये परंपरा सदियों से चली आ रही है और इससे मस्जिद की मीनारों को बनाया जाता है और ऐसा माना जाता है कि इससे आसपास बिजली गिरने का खतरा भी टल जाता है.
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