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Muhammad Ali Jinnah Death: ब्रिटिश भारत के पूर्व विदेश मंत्री लॉर्ड पेथिक लॉरेंस ने कहा था कि गाँधी के बिना हिंदुस्तान को आज़ादी, लेनिन और माओ के बिना, रूस और चीन में साम्यवादी क्रांति आ सकती थी लेकिन जिन्ना के बिना पाकिस्तान नहीं बन सकता था. यानी भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के लिए जिन्ना सबसे ज्यादा जिम्मेदार थे. लेकिन ये विडंबना और जिन्ना की बदकिस्मती ही कही जायेगी कि जिस पाकिस्तान के लिए उन्होंने मुल्क के दो टुकड़े करवा दिए, उस मुल्क को वो कभी फलता- फूलता नहीं देख पाए और आज़ादी के साल भर बाद ही पाकिस्तान की घोर गरीबी और अस्तित्व के संकट के बीच जिन्ना ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.
14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान भारत से अलग होकर एक आज़ाद मुल्क बना, और 11 सितम्बर, 1948 को 71 साल की उम्र में कराची में जिन्ना की मौत हो गई. जिन्ना की मौत बेहद तकलीफदेह थी. आखिरी वक़्त में पाकिस्तान के इस कायदे आज़म के साथ उनकी बहन फातिमा के अलावा कोई नहीं था. उनकी मौत टीबी, कैंसर और न्यूमोनिया से हुई थी. कहा जाता है कि महात्मा गाँधी की मौत हत्या की वजह से हुई और पाकिस्तान में जिन्ना की मौत अपनी पाकिस्तान के प्रति उनके घोर समर्पण के कारण हुई, क्यूंकि इस वजह से वो अपने स्वास्थ्य पर भी ध्यान नहीं दे सके.
जिन्ना की मौत के बाद वायसराय लॉर्ड लुईस माउंटबेटन ने कहा था कि अगर जिन्ना की बीमारी के बारे में उन्हें पहले से पता होता तो वे भारत की आज़ादी को कुछ महीनों के लिए और टाल देते. माउंटबेटन ने ऐसा इसलिए कहा, क्यूंकि जिन्ना को काफी सालों से टीबी की बीमारी थी , लेकिन उन्होंने ये बात सबसे छुपकर रखी थी, ताकि उनकी वजह से पाकिस्तान की आज़ादी की मांग में कोई अड़चन ने पैदा हो जाए.
इतिहासकार बताते हैं कि मुहम्मद अली जिन्ना 1930 के दशक से ही तपेदिक से पीड़ित थे. यह बात उनकी बहन फ़ातिमा जिन्ना सहित उनके कुछ करीबी जानते थे, लेकिन उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग उन की बिमारी की तरह जिन्ना की बीमारी को भी दुनिया से छिपा कर रखा गया. जब लोग जिन्ना के गिरती सेहत पर सवाल उठाते थे तो, जिन्ना उनसे कहते थे कि अपनी व्यस्त दिनचर्या से होने वाली थकान की वजह से वो कमजोर हो रहे हैं.
1947 में पाकिस्तान की आज़ादी के वक़्त तक, जिन्ना का स्वास्थ्य काफ़ी बिगड़ चुका था. टीबी की वजह से उनका वजन गिरकर महज 37 किलो रह गया था. इसके बावजूद वो पिछले 30 सालों से रोजाना 50 सिगरेट तक पी जाते थे. सिगरेट ने उनके फेफड़े में कैंसर पैदा कर दिया था. इसके बावजूद उनकी मेज़ पर क्रेवन "ए" सिगरेट और क्यूबा के सिगार का एक डिब्बा हमेशा पड़ा रहता था. बिमारी से उनकी भूख मर चुकी थी, और वो एक तरह से चाय, कॉफ़ी और सिगरेट, सिगार पर ही जिन्दा थे.
1948 में, जिन्ना की हालत और भी गंभीर हो गई. वो सरकारी आवास में अकेले पड़े रहते थे. इस दौरान सिर्फ उनकी बहन फ़ातिमा और उनके कुछ भरोसेमंद खादिम ही उनसे मिल पाते थे. उसी साल जून में, जिन्ना अपनी बहन फातिमा के साथ स्वास्थ्य लाभ के लिए बलूचिस्तान के ठंडे क्षेत्र क्वेटा चले गए. लेकिन वहां भी वो आराम नहीं कर पाए और अपने आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करते रहे. इस दौरान, उन्होंने कमांड एंड स्टाफ कॉलेज के अफसरों को खिताब करते हुए पाकिस्तान की सुरक्षा के महत्व पर ज़ोर दिया और कहा, "आप, पाकिस्तान की अन्य सेनाओं के साथ, पाकिस्तान के लोगों की ज़िन्दगी, संपत्ति और सम्मान के ट्रस्टी हैं. कमज़ोर स्वास्थ्य के बावजूद, पाकिस्तान के भविष्य और उसकी रक्षा के प्रति उनकी यह प्रतिबद्धता अटूट थी. जिन्ना की अंतिम सार्वजनिक उपस्थिति 1 जुलाई 1948 को स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान के उद्घाटन समारोह में हुई थी. उसके बाद वो किसी अवामी जलसे में नजर नहीं आये.
जिन्ना इलाज कराने में हमेशा आनाकानी करते थे, लेकिन कभी भी खुद को बीमार नहीं दिखाना चाहते थे. कमजोरी के बाद भी किसी का सहारा नहीं लेते थे. उनकी बिमारी लगातार बढती जा रही थी. तपेदिक (टीबी) के साथ-साथ फेफड़ों का कैंसर बढ़ता जा रहा था. उस वक़्त तक टीबी की दवा स्ट्रेप्टोमाइसिन आ चुकी थी, और वह जिन्ना को दी जा रही थी, लेकिन उनकी सेहत में कोई सुधार नहीं हो रहा था. पाकिस्तानी सरकार ने उनके इलाज के लिए कुछ बेहतरीन डॉक्टरों की व्यवस्था की. इस बीच जिन्ना कभी क्वेटा तो कभी कराची आते- जाते रहे.
9 सितंबर 1948 तक, जिन्ना को निमोनिया हो गया था, जिससे उनकी पहले से ही नाजुक स्थिति और भी जटिल हो गई. डॉक्टरों ने उन्हें तुरंत क्वेटा छोडकर इलाज के लिए कराची लौटने की सिफ़ारिश की, जहाँ उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें और अच्छी देखभाल मिल सकेगी.
थोड़ी देर की ना नुकुर के बाद ही जिन्ना ने कराची जाने के लिए हामी भर दी. 11 सितंबर को उन्हें क्वेटा से कराची ले जाया गया. जिन्ना के निजी चिकित्सक डॉ. ए.एस. इलाही बक्स बताते हैं कि जिन्ना के इलाज न कराने की जिद और कराची लौटने की रजामंदी से ही उन्हें एहसास हो गया था की उनका वक़्त अब बेहद नजदीक है.
11 सितम्बर को क्वेटा से जिन्ना का विमान दोपहर में कराची पंहुचा. उन्हें वहां से सरकारी अस्पताल ले जाया जाना था. जब वो एयरपोर्ट से निकले तो उनकी एम्बुलेंस रास्ते में खराब हो गई. सितम्बर की गर्मी और उमस में बीमार और कमज़ोर जिन्ना, जो ठीक से बैठ भी नहीं पा रहे थे, उन्हें सड़क किनारे एक घंटे से ज़्यादा वक़्त तक इंतज़ार करना पड़ा. यह पल बेहद भावुक करने वाला था, जिन्ना जिस रास्ते पर खराब हुए एम्बुलेंस में बेचैनी में तड़प रहे थे, उसी पल सड़कों पर वाहन सरपट भाग रहे थे. किसी को इस बात की खबर नहीं थी कि उसके मुल्क का कायदे आज़म सड़क के किनारे खड़े खराब एम्बुलेंस में तड़प रहा है.
आखिरकार दो घन्टे बाद एक और एम्बुलेंस आई और जिन्ना को कराची के गवर्नमेंट हॉस्पिटल ले जाया गया.
जिन्ना का उसी शाम 10:20 बजे, 11 सितंबर 1948 को, 71 साल की उम्र में निधन हो गया. ये पाकिस्तान के निर्माण के ठीक एक वर्ष बाद हुआ. जिन्ना की मौत
एक नए स्थापित राष्ट्र के लिए विनाशकारी पल था. उनकी मौत ने एक युग का अंत कर दिया था. जिन्ना को उनकी मौत के अगले दिन, 12 सितंबर 1948 को, सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया. उनके जनाज़े की नमाज़ एक ऐतिहासिक घटना बन गयी जिसमें दस लाख लोग शामिल हुए.
कराची में स्थित, मज़ार-ए-क़ायद का मकबरा आज पाकिस्तान का एक राष्ट्रीय महत्व का एक स्थल है. यह पाकिस्तान के निर्माण में जिन्ना की महत्वपूर्ण भूमिका का स्मारक होने के साथ-साथ उनके नेतृत्व और दूरदर्शिता के प्रति राष्ट्र की श्रद्धा का भी प्रतीक है.
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