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Zee SalaamZee Salaam ख़बरेंJung-E-Badra: इस्लाम की पहली लड़ाई जब बड़ी फौज से भिड़ कर 313 मुसलमानों की हुई थी जीत

Jung-E-Badra: इस्लाम की पहली लड़ाई जब बड़ी फौज से भिड़ कर 313 मुसलमानों की हुई थी जीत

Jung-E-Badra, The first battle of Islam: आज यानी 7 मार्च और 17वें रमजान को हिंदुस्तान में कई जगहों पर जंग-ए-बदर को याद किया गया, और इसे शौर्य दिवस के तौर पर मनाया गया. इस मौके पर मुसलमानों से अपनी एकता और नैतिक सचरित्रता को पुख्ता करने की अपील की गई. ये जंग इस्लाम के आखिरी पैगम्बर हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहि वस्लम की क़यादत में लड़ी और जीती गई थी. इस जंग के बारे में कहा जाता है कि सिर्फ 313 मुसलमान सैनिकों ने हज़ार से ज्यादा विरोधियों को शिकस्त दी थी, जो उस वक़्त इस्लाम और मुसलमान के सबसे बड़े दुश्मन थे और लगातार मुसलमानों के लिए चुनौती बनकर खड़े थे.इस जंग के बाद मक्का में इस्लाम की एकछत्र स्थापना हो गई थी. 

AI आधारित प्रतीकात्मक तस्वीर
AI आधारित प्रतीकात्मक तस्वीर

इस जंग को क्यों कहते हैं जंग-ए-बदर? 

जंग का मतलब युद्ध या लड़ाई से है, और ये लड़ाई तत्कालीन सऊदी अरब के मदीना शहर से 175 किलो मीटर दूर मक्का के रास्ते में बद्र की पहाड़ी के पास लड़ी गई है. ये लड़ाई इसी जगह पर हुई थी, जिसमें मुसलमानो को किसी अदृश्य सहायता (अल्लाह की सहायता) से विजयी हासिल हुई थी.

ये इस्लाम धर्म की पहली लड़ाई थी, जो 2 हिजरी यानी संभावित 7 मार्च 624 ईस्वी को मदीना के नए- नए ईमान लाए मदीना के मुसलमानों और मक्का के कुरैश कबीले के बीच लड़ी गई, जो इस्लाम को नहीं मानते थे और मुहम्मद को अपना शत्रु मानते थे. इसी कबीले से पैगंबर मुहम्मद (ﷺ) भी आते थे.
कुरैश कबीले के लोग  मुहम्मद(स.) की जान के दुश्मन बन गए थे. वो उनके क़त्ल का हर वक़्त मौका तलाश करते थे. उनका मक्का में रहना दूभर कर दिया था, और इस प्रताड़ना से तंग होकर उन्हें मदीना पलायन करना पड़ा था. 

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जंगे बदर (Battle of Badr) इस्लाम की पहली और सबसे निर्णायक ऐतिहासिक जंग थी. सिर्फ 313 मुसलमानों ने पैगंबर मुहम्मद (ﷺ) के नेतृत्व में 1000 मजबूत मक्का की सेना को हराया था, जिसके बाद मक्का में इस्लाम का वर्चस्व स्थापित हो गया. इस जंग में  मुहम्मद(स.) ने कोई आक्रमण नहीं किया था बल्कि उन्होंने ये जंग डिफेन्स में लड़ी थी. 

इस जंग का उल्लेख कुरआन में भी किया गया है.
"अल्लाह ने बद्र में तुम्हारी सहायता की जबकि तुम बहुत निर्बल थे. तो तुम्हें चाहिए कि अल्लाह से डरते रहो, ताकि तुम कृतज्ञता दिखा सको." (सूरा-3, आले-इमरान, आयत-123)

यह जंग सन दो हिजरी, फ़रवरी 623 ईसवी को हुआ. इसकी वजह यह थी कि जब नबी (पैगम्बर) कुरैश कबीले के विधर्मियों से तंग होकर अपने साथियों को लेकर मदीना आ गए तो मक्का के विधर्मियों (इस्लाम विरोधियों) को यह बात पसन्द नहीं आई कि मुसलमान मदीना में शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करें. इसलिए उन्होंने मक्का के सरदार अबू-सुफ़यान के नेतृत्व में एक बहुत बड़ा व्यापारिक दल शाम (सीरिया) भेजा ताकि वहाँ से धन कमाकर मक्का लाया जाए और फिर उसके द्वारा युद्ध का सामान खरीदकर मदीने पर आक्रमण कर दिया जाए और मुहम्मद और उनके साथियों को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया जाए.

जब यह व्यापारिक दल व्यापार करने के बाद मक्का वापस जा रहा था तो नबी को इसके विषय में पता चल गया. इसलिए आप (स.) ने तीन सौ तेरह मुसलमानों को लेकर इस दल का घेराव किया, लेकिन अबू-सुफ़यान भी बहुत चालाक और मक्कार था,उसको आप (स.) के आने की खबर मिल गई थी.  उसने तुरन्त ज़मज़म नामक एक व्यक्ति को मक्का भेज दिया और उनसे अपने व्यापारिक दल की रक्षा के लिए कहा. चूंकि मक्का के इस्लाम विरोधी लोग मदीने पर आक्रमण करने की योजना बनाए हुए थे. इसलिए वहाँ के सरदार एक हज़ार की सेना लेकर मदीने पर चढाई के लिए निकल पडे थे. यह एक नई रणनीति थी. मुसलमान अपनी तादाद और  युद्ध सामग्री में शत्रु के तिहाई थे. नबी ने अपने साथियों से परामर्श किया कि इस परिस्थिति में क्या किया जाय?

एक व्यक्ति का विचार था कि व्यापारिक दल पर आक्रमण किया जाए. आप (स.) ने फिर परामर्श किया. इस पर कुछ सरदार खड़े हुए जो आप के विचार को समझ गए थे. उन्होंने कहा, “ऐ अल्लाह के रसूल! अल्लाह ने आपको जो निर्देश दिया है, आप वह करें, हम आपके साथ हैं. हम बनी इसराईल की तरह यह नहीं कहेंगे कि ऐ मूसा तुम और तुम्हारा रब युद्ध करे, हम तो यहाँ बैठे रहेंगे. बल्कि यह कहेंगे कि चलिए आप और आपका रब युद्ध करें हम आपके साथ हैं.” 

ये मुहाजिरों के सरदार मिकदाद-बिन-अम्र थे. परन्तु आप (स.) चाहते थे कि मदीने के अनसार के सरदार भी जंग को लकर अपने विचार प्रकट करें. इसलिए आप (स.) ने फिर कहा लोगो, मुझे परामर्श दो. इसपर साद-बिन-मुआज़ समझ गए और कहा, "ऐ अल्लाह के रसूल आप हम से परामर्श चाहते हैं?" आप ने फ़रमाया, "हाँ.” इस पर साद-बिन-मुआज़ ने कहा, "हम आप पर ईमान लाए, हम आपके साथ हैं. अगर आप समुद्र में भी प्रवेश करेंगे तो हम भी आपके साथ प्रवेश कर जाएँगे. हम में (अर्थात अनसार में) से एक व्यक्ति भी पीछे नहीं रहेगा." इस पर नबी प्रसन्न हो उठे और आपने जिहाद करने का ऐलान कर दिया.

 इस्लामी इतिहास का यह बहुत ही कठिन मोड़ था. तीन सौ तेरह व्यक्तियों की सेना, जिनके पास युद्ध-सामग्री भी बहुत कम थी, अपने से तीन गुनी बड़ी और युद्ध-सामग्री से भरी सेना का सामना करने - युद्ध के लिए निकल पड़ी. यह ऐसी घड़ी थी कि अगर यह मुट्ठी-भर सेना परास्त हो जाती तो एक अल्लाह की वन्दना करने वाला कोई न रहता.

इस्लाम के महान विद्वान मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने कुरआन की व्याख्या में लिखा है-"कभी-कभी कोई साधारण-सी घटना युद्ध को जीत या हार में बदल देती है. वाटरलू के युद्ध ने तो यूरोप का नक़्शा बदल जाता, क्योंकि ऐसी दशा में नेपोलियन को बारह बजे तक जंग के मैदान के सूखने के सम्बन्ध में सभी इतिहासकार सहमत है कि अगर 17 और 18 जून 1815 ईसवी की रात बारिश न होती तो उसके थमने की प्रतीक्षा न करनी पड़ती, बल्कि सवेरे से ही युद्ध प्रारम्भ हो जाता, और 'वलोशर' के पहुँचने से पहले ही 'वेलिंगटन' की हार हो जाती. इसी तरह अगर बद्र में मुसलमानों की जीत न होती तो सारे संसार की हिदायत का नक़शा उलट जाता."

इसी ओर नबी ने अपनी दुआ में माँगा था, "ऐ अल्लाह, अगर आज ये तेरे मुट्ठि भर बन्दे हलाक हो गए तो फिर धरती पर तेरी सच्ची वन्दना करने वाला कोई नहीं रहेगा." इस युद्ध में मुसलमान विजयी हुए. मक्का के बड़े-बड़े सरदार मारे गए और फिर यहीं से इस्लामी इतिहास का एक नया अध्याय प्रारम्भ हुआ. इस विषय पर क़ुरआन में अल-अनफ़ाल नामक पूरी एक सूरा उतरी. 

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