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Kazi Nazrul Islam:काजी नजरुल इस्लाम; ये नाम तो कभी न कभी आप ने ज़रूर सुना होगा. आज इस महान आत्मा की पुण्यतिथि है. कुछ लोग इन्हें कामरेड, कवि तो कुछ लोग विद्रोही कवि के तौर पर जानते हैं. लेकिन ये इन सब से भी ज्यादा और ऊंची हस्ती थे. वो पैदा तो भारत में हुए थे. पूरी ज़िन्दगी भारतीय बनकर रहे, लेकिन उनकी मौत बांग्लादेश में हुई. बांग्लादेश ने उन्हें अपना राष्ट्रिय कवि बना लिया. पूरी दुनिया उनकी इज्ज़त में अदब से अपना सर झुका लेती है..
काजी नजरुल इस्लाम 25 मई 1899 को ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रेसीडेंसी के आसनसोल के चुरुलिया गांव में एक बेहद गरीब मुस्लिम परिवार में पैदा हुए थे.
उनके पिता, काज़ी फ़कीर अहमद, एक मस्जिद में इमामत करते थे. इस गरीबी ने उन्हें 'दुखु मियां' (दुखों का बेटा) नाम दिया. बचपन में वो इसे नाम से पुकारे गए. 1908 में पिता की मौत के बाद, नज़रुल ने अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए मुअज़्ज़िन का काम किया.
इसके साथ ही एक मदरसे में कुरान, इस्लामी दर्शन और धर्मशास्त्र का अध्ययन किया. पढाई और गरीबी से संघर्ष करते हुए उन्होंने कभी मस्जिद में मुअज्जिन का काम किया तो कभी चाय की दुकानों में ग्राहकों को चाय परोसी. लेकिन यही अभाव और गरीबी ने आगे चलकर उनके साहित्यिक तेवर और विद्रोही चेतना का कवि बना दिया. वह थियेटर समूहों से भी जुड़े और साहित्य, कविता व नाटकों की दुनिया में अपनी चमक बिखेड़ दी.
काजी नजरुल इस्लाम ने 18 साल की उम्र में ब्रिटिश भारतीय सेना भी ज्वाइन किया, और तीन साल तक 49वीं बंगाल रेजिमेंट में नौकरी की. फ़ौज की नौकरी करते हुए ही वो अपनी लेखनी को धार देते रहे. उनकी पहली गद्य रचना 'बाउंदुलेर आत्मकहिनी' और पहली कविता 'मुक्ति' उनकी फौजी नौकरी के दौरान ही प्रकाशित हुई.
सेना से लौटकर उन्होंने पत्रकारिता को अपनी क्रांति का हथियार बना लिया. 1920 में उन्होंने 'नवयुग' और बाद में 'धूमकेतु' पत्रिका निकाली, जिनमें उनकी धारदार लेखनी ने ब्रिटिश शासन को हिला दिया. अगस्त 1922 में प्रकाशित कविता 'आनंदमयी आगमने' पर उन्हें राजद्रोह के इलज़ाम में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. जेल में रहते हुए उन्होंने 'राजबंदी की जुबानबंदी' लिखी और 40 दिन की भूख हड़ताल कर दी.
उनकी रचनाएँ, जिनमें प्रतिष्ठित कविताएँ "बिद्रोही" (विद्रोही) और "भंगर गान" (विनाश का गीत) शामिल हैं, समानता, न्याय, साम्राज्यवाद-विरोध और उत्पीड़न के विरुद्ध विद्रोह की वकालत करती हैं. उन्होंने लगभग 4,000 गीत लिखे, जिन्हें नज़रुल गीती के नाम से जाना जाता है. इन गीतों में लोक, शास्त्रीय और भक्ति संगीत का मिश्रण था.
उनकी सबसे मशहूर कविता 'विद्रोही' ने ही उन्हें 'विद्रोही कवि' की उपाधि दिलाई थी. यह उपाधि महज सम्मान नहीं, बल्कि उनके पूरे जीवन दर्शन का निचोड़ थी. वे न सिर्फ उपनिवेशवाद, बल्कि धार्मिक कट्टरता, लैंगिक भेदभाव और सामाजिक अन्याय के भी प्रखर विरोधी रहे. उन्होंने बांग्ला गजलों की नई धारा शुरू की. अपनी रचनाओं में अरबी और फ़ारसी प्रभावों का इस्तेमाल किया. प्रेम, स्वतंत्रता और क्रांति को एक साथ पिरोकर धार्मिक सद्भाव को बढ़ावा दिया, इस्लामी और हिंदू दोनों भक्ति गीत लिखे, जाति और लैंगिक भेदभाव का विरोध किया. एक हिंदू महिला, प्रमिला देवी से उनका विवाह, एकता में उनके विश्वास को दर्शाता है.
भारत ने उन्हें 1960 में पद्म भूषण, बांग्लादेश ने एकुशे पदक से साम्मानित किया. उनकी कविताएँ और गीत आज भी प्रेरणा देते हैं, जिनका कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है. उनके लेखन ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान बंगालियों को प्रेरित किया था.
काजी नजरुल इस्लाम के साहित्य और गीतों ने न सिर्फ बंगालियों को आजादी के लिए प्रेरित किया बल्कि दुनिया को यह संदेश दिया कि कविता महज कागज पर लिखा शब्द नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ एक मजबूत हथियार के तौर पर काम करती है. उन्होंने 1920 में ही अपने लेख 'रोज-कियामत' में पर्यावरण संकट की भविष्यवाणी कर दी थी, जो दशकों बाद वैश्विक विमर्श का मुद्दा बन गया.
इससे यह जाहिर होता है कि वे सिर्फ विद्रोही कवि ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी मुफक्किर भी थे. काजी नजरुल इस्लाम की कवितायेँ आज भी बताती हैं कि बगावत कभी मरती नहीं, वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी आत्मा में जीवित रहती है. उनकी कविताएं और गीत बंगाल से निकलकर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में आजादी और न्याय की गूंज बन गई. बांग्लादेश ने उन्हें आधिकारिक रूप से अपना राष्ट्रीय कवि घोषित किया, लेकिन उनका प्रभाव भारत की मिट्टी और आत्मा में भी उतना ही गहरा है.
1942 में मात्र 43 वर्ष की उम्र में एक रहस्यमयी बीमारी ने काजी नजरुल इस्लाम की आवाज और याददाश्त छीन ली. कई इतिहासकार मानते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने उन्हें धीरे-धीरे जहर देकर उन्हें दिल दिमाग से कमजोर करने की साजिश की थी. नजरुल इस्लाम लंबे अरसे तक एकांतवास और बीमारी से जूझते रहे. 1972 में बांग्लादेश सरकार ने उन्हें और उनके परिवार को ढाका बुलाया था. बांग्लादेश सरकार ने उन्हें नागरिकता दी और राष्ट्रीय कवि घोषित किया. वहीं 29 अगस्त 1976 को उन्होंने आखिरी सांस ली. उन्हें ढाका विश्वविद्यालय के पास दफनाया गया.
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