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नई दिल्ली: हर व्यक्तित्व के कई पहलू होते हैं, किसी भी एक पक्ष के सिरे हम उसका सटीक मूल्यांकन नहीं कर सकते हैं. उसी तरह सरदार खुशवंत सिंह (Khushwant Singh) का चरित्र हैं, जिसके अनगिनत आयाम हैं. मेरे ख्याल से खुशवंत सिंह इतना बेबाक,बिंदास, बेलौस, बेखौफ़ और विवादास्पद शख्स भारत में शायद ही दूसरा हुआ हो. जिन्होंने अपने चुटीले किस्सागोई के माध्यम से दशकों तक कई गंभीर बातें कहीं.
खुशवंत सिंह (Khushwant Singh) ने अपनी साफगोई पत्रकारिता से पाठकों के दिल में एक खास पैठ बना ली थी. तमाम लोग उनसे वैचारिक असहमति के बावजूद भी उनके साहसिक और मजेदार लेखन को बडे़ चाव से पढ़ते थे, खासकर उनके संस्मरण. उनके पास एक से बढ़कर एक किस्सों का एक जखीरा था, जिसको वह बेहद ही दिलचस्प अंदाज में बयां करते थे. हमेशा एक चर्चित शख्सियत रहे.
खुशवंत सिंह ने वकील,राजनयिक,अध्यापक,पत्रकार,संपादक, इतिहासकार,राजनेता ,स्तंभकार और लेखक के रूप में अपनी भूमिका निभाई. इन सबके अलावा वह एक स्वतंत्रत टिप्पणीकार थे, वह समसामयिक मुद्दों पर राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से अपना निर्भीक पक्ष रखते थे. खुशवंत सिंह के संस्मारणात्मक लेख ऐक दस्तावेज सरीखे हैं, जिनमें ब्रिटिश इंडिया, देश का विभाजन, बंटवारे की त्रासदी,आजाद भारत, नया रूप धारण करती दिल्ली, अभिजात्य वर्ग की जीवन शैली,बदलती सियासत के साथ-साथ देश की बदलती सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हैसियत का पूर्ण विवरण मिलता हैं.
खुशवंत सिंह ,कुलदीप नायर के बाद एक ऐसे पत्रकार और लेखक थे ,जो पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी समान रूप से लोकप्रिय थे. खुशवंत सिंह पर अश्लीलता का आरोप लगते रहा हैं, पर उन्होंने अपने लेखन में कई वर्जनाओं को तोड़ते हुए मनुष्य की स्वभाविक इच्छाओं पर खूब कलम चलाया हैं.
पारंपरिक देश भारत में सेक्स शब्द से हमेशा से ही सार्वजनिक रूप से परहेज किया जाता रहा हैं. मगर खुशवंत सिंह ने इस विषय पर जमकर लिखा हैं. इसी कारण वह कई आलोचकों के निशाने पर भी रहे हैं. मगर खुशवंत सिंह ने अपनी भावना को छुपाने की बजाय,उसे कलमबद्ध कर तात्कालीन परिवेश के अनुसार बहुत ही साहसिक कार्य किया. यह काम उस समय किया ,जब इस विषय पर लोग बात करने तक से कतराते थे। अपनी वैचारिक स्पष्टता को अपनी शख्सियत का हिस्सा मानने वाले खुशवंत सिंह ने सियासतदारों भी से कई बार अदावत मोल ले ली, पर अपने विचारों से समझौता नहीं किया.
इंदिरा गांधी के 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के विरोध में पदम भूषण लौटाना या भिडांरावाले का विरोध करना या ताउम्र धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का वकालत करना। ऐसे तमाम पहलू हैं, जो उनकी को एकबद्धता को दर्शाते हैं. खुशवंत सिंह एक कठिन अनुशासन में अपनी दिनचर्या का पालन करते थे, बिना पूर्व अनुमति लिए आए किसी भी आगंतुक से वह मिलते तक नहीं थे, चाहे वह कितना भी महत्वपूर्ण व्यक्ति क्यों ना। अपनी इसी दैनिकी के वजह से उन्होंने एक अच्छी सेहत और लंबी उम्र पाई। लेकिन वह स्वयं इसके पीछे नित्य शराब का सेवन मानते थे.
जीवन परिचय
2 फरवरी 1915 को खुशवंत सिंह का जन्म एक संपन्न परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम सर शोभा सिंह था ,जो पेशे से ठेकेदार थे. उनकी माता का नाम लेडी वर्याम कौर था. उनका विवाह कंवल मलिक से हुआ था,जिनसे एक पुत्र राहुल सिंह और एक पुत्री माला हैं. एक शानदार जीवन जीने वाले खुशवंत सिंह का 20 मार्च, 2014 को 99 वर्ष की आयु में निधन हो गया. वर्ष 2007 में, इनको पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया.
कैरियर
दिल्ली के प्रतिष्ठित मॉडर्न स्कूल से अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने गवर्नमेण्ट कॉलेज, लाहौर और कैम्ब्रिज यूनीवर्सिटी लन्दन में शिक्षा प्राप्त करने के बाद लन्दन से ही क़ानून की डिग्री ली. वह लॉ की डिग्री लेने के बाद लाहौर उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस शुरू कर दी। उन्होंने शीघ्र ही स्वतंत्र हुए भारत के लिए एक राजनयिक के रूप अपनी सेवा दी. 1951 में आकाशवाणी से जुड़े और 1951 से 1953 तक भारत सरकार के पत्र 'योजना' का संपादन किया. फिर 'वीकली आफ इंडिया', 'न्यू डेल्ही', नेशनल हेराल्ड, आदि का संपादन किया. इनके संपादन काल में ही मुंबई से प्रकाशित प्रसिद्ध अंग्रेज़ी साप्ताहिक 'इलेस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया' ने सफलता के नए कीर्तिमान बनाएं. 1983 तक दिल्ली के प्रमुख अंग्रेज़ी दैनिक 'हिन्दुस्तान टाइम्स' के संपादक भी वह रहे. खुशवंत सिंह राज्यसभा के सदस्य भी रहे। वे 1980 से लेकर 1986 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे.
लेखन
खुशवंत सिंह मुख्य रूप से अंग्रेजी भाषा में लिखा करते थे। उनकी प्रमुख पुस्तकें 'ट्रेन टू पाकिस्तान' , 'ह्वाई आई सपोर्ट इमरजेंसी', देल्ही:अ,आई शैल नॉट हियर द नाईटेंगल, सेक्स, स्कॉच एंड स्कालरशिप और 'दि कंपनी ऑफ़ वूमन' और ‘खुशवंतनामा : दी लेसंस ऑफ माई लाइफ', पोर्ट्रेट आफ़ लेडी: कलेक्टेड स्टोरी. इनके अलावा, उन्होंने सिख इतिहास पर दो खंडों में एक क्लासिक किताब "हिस्ट्री आफ़ सिख" लिखा था. इन सब के अलावे उन्होंने लगभग 100 महत्वपूर्ण किताबें लिखी हैं.
खुशवंत सिंह और खूबसूरत औरतें
स्वभाव से खिलंदड़ खुशवंत सिंह खूबसूरत औरतों के कसीदे पढ़ना बखूबी जानते थे. उन्होंने एडविना माउंटबेटन ,अमृता शेरगिल, नरगिस दत्त, प्रतिमा बेदी, इंदिरा गांधी आदि के बारे में काफी रोचक ढंग से लिखा हैं. जिसका जिक्र खुशवंत सिंह ने अपनी आत्मकथा 'ट्रूथ, लव एंड लिटिल मेलिस' में बहुत ही खूबसूरती से किया हैं. जिसे लेकर वे विवादों से भी घिरे. आत्मकथा में लिखे एक खास प्रकरण को लेकर मेनका गांधी ने उन पर मुकदमा तक दायर कर दिया था. इसके अलावा अपने कॉलम में खुशवंत सिंह ने चार हिंदू महिलाओं उमा भारती, ऋतंभरा ,प्रज्ञा ठाकुर और मायाबेन कोडनानी पर गैर अमर्यादित टिप्पणी की थी, जिसको लेकर काफी बवाल हुआ था.
विवादों से नाता
खुशवंत सिंह के पिता सर शोभा सिंह की दिल्ली के लुटियंस को बनाने में बड़ी भूमिका की थी. मगर शहीद भगत सिंह के खिलाफ उनके गवाही को लेकर उनका जीवन विरोध होता रहा. खुशवंत सिंह ने कई मौकों पर अपने पिता का पक्ष स्पष्ट कर, एक जिम्मेदार नागरिक बताया. इसके अलावा सन् 1975 में इंदिरा गाँधी द्वारा लगाई गई इमरजेंसी को सही ठहरने की बात हो या दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी विचारधारा का विरोध करना हो या क्या अपनी लेखनी से अश्लीलता फैलाना. वह कहीं न कहीं विवादों में फँसने में कामयाब हो ही जाते थे. बहुयामी व्यक्तित्व के धनी खुशवंत सिंह उर्दू जुबान, शेरो-शायरी, प्रकृति के सानिध्य, हास्यप्रियता और महफिल के मुरीद थे. उनका कॉलम "विद मैलिस टूवार्ड्स वन एंड ऑल" हमेशा याद किया जाता रहेगा.
ए.निशांत
लेखक पत्रकार हैं. यहां वयक्त विचार उनके निजी विचार हैं.
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