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Sambhal Judicial Report: उत्तर प्रदेश के संभल जिले की ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान 24 नवंबर 2024 को भड़की हिंसा की जांच को लेकर गठित न्यायिक समिति की रिपोर्ट सामने आ गयी है. खास बात ये है कि 450 पन्नों की ये रिपोर्ट CM योगी आदित्यनाथ को पेश किये जाने के पहले ही लीक हो गयी. वैसे इसे लीक कर दी गयी कहना ज्यादा उचित होगा. वो इसलिए कि कोई गोपनीय सरकारी दस्तावेज या रिपोर्ट आखिर कैसे लीक हो सकती है?
वैसे संभल हिंसा की जांच के लिए गठित की गई जांच समिति अपने सदस्यों को लेकर पहले दिन से ही संदेह के घेरे में है. इस समिति में इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस देवेंद्र कुमार अरोड़ा, रिटायर्ड IAS अमित मोहन और रिटायर्ड IPS अरविंद कुमार जैन को शामिल किया गया था, तभी से आरोप लग रहे हैं कि समिति के दो सदस्यों का पहले से सरकार की तरफ झुकाव है.
इस रिपोर्ट की सबसे दिलचस्प बात ये भी है कि लीक होते ही 450 पन्नों की रिपोर्ट में से कोई मूल सवाल बाहर नहीं आया.. मसलन ये हिंसा कैसे भड़की ? क्या ये स्वतःस्फूर्त था या पहले से इसकी कोई प्लानिंग या साजिश थी ? इसमें कौन लोग शामिल थे ? उनका क्या स्वार्थ था ? हिंसा को रोकने में पुलिस और लोकल इंटेलिजेंस क्यों और कैसे विफल हुई? हिंसा में मैं कौन किसकी गोली से मारा ? लोगों के पास हथियार कहाँ से आये ? छतों पर ईंट क्यों रखे गए? क्या हिंसा में किसी विदेशी ताकतों संगठनों का हाथ है? क्या पुलिस की गोली से मुस्लिम नौजवानों की मौत हुई थी ? हिंसा में कितनी सम्पत्ति का नुक्सान हुआ ?
डेमोग्राफी बदलाव में सिमट गयी संभल हिंसा की जांच
गौरतलब है कि इस हिंसा में 4 मुस्लिम नौजवानों की मौत हुई थी ? हिंसा के बाद लगभग 80 मुस्लिम नौजवानों को गिरफ्तार किया जा चुका है.. वहीँ इस मामले में दर्ज़नों लोग अभी भी फरार बताये जा रहे हैं. पुलिस पर छतों से कथित तौर पर पथराव करने के आरोप में 12 प्राथमिकी दर्ज की गईं है. आरोप पत्र के मुताबिक, इस मामले में कुल 159 आरोपी थे. लेकिन इस रिपोर्ट से ये सभी ज़रूरी सवालों के जवाब गायब हैं? या फिर उनपर बात नहीं हो रही है. जांच का परिणाम सिर्फ इस बात पर मोड़ दिया गया कि संभल में पलायन हो रहा है.. आज़ादी के वक़्त 55% आबादी मुस्लिम और 45% हिंदू थी; लेकिन, वर्तमान में हिंदू आबादी घटकर 15% रह गई है, जबकि मुस्लिम समुदाय बढ़कर 85% हो गया है.
मुसलमान, मदरसा, मस्जिद, आतंकवादी संगठनों को एकतरफा बताया गया दोषी
रिपोर्ट पेश होने के एक दिन बाद इस पूरी घटना/ हिंसा का सूत्रधार मुस्लमान, मदरसा, मस्जिद, आतंकवादी संगठनों को बताया गया है..जबकि राज्य सरकार, पुलिस- प्रशासन की विफलता पर कोई सवाल नहीं उठाया गया है. हिंसा कभी भी एकतरफा नहीं फैलती है. इसके लिए दो पक्ष जिम्मेदार होते हैं. लेकिन रिपोर्ट के अबतक के सामने आये परिणामों से दूसरा पक्ष गायब है, जिसे उसे क्लीनचिट दिया जा रहा हो. सर्वे टीम के साथ हिंदूवादी संगठन के पदाधिकारियों का जाना, और वहां जय श्री राम और मुस्लिम विरोधी नारे लगाने के मामले को या ती जांच समिति ने नज़र अंदाज़ किया है, या उसपर लोग चर्चा नहीं करना चाह रहे हैं?
इस रिपोर्ट पर राज्य सभा सांसद और उत्तर प्रदेश के पूर्व DGP बृजलाल ने भी बड़ा इलज़ाम लगाया है. बृजलाल ने बताया कि सफीकुर रहमान वर्क और आजम खान के दबाव में संभल में पूर्व में हुई हिंसा में कोई कार्रवाई नहीं की गई. जिस तरह संभाल में पाकिस्तानी कनेक्शन है, संभल में हिंदुओं को मारा गया और दोषियों को समाजवादी पार्टी के के अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव ने उनका संरक्षण दिया उनके मुकदमे वापस लिए इस वजह से संभल में आज की स्थिति बनी है. बृजलाल संभल के ताजा हिंसा और जांच रिपोर्ट पर बोलने के बजाये 1978 के संभल हिंसा की कहानी सुना रहे हैं..
रिपोर्ट पर क्या है इलाके के मुसलमानों की प्रतिक्रिया ?
वहीँ, संभल हिंसा की जांच रिपोर्ट को लेकर मुस्लिम पक्ष ने रिपोर्ट को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया है. संभल के मुस्लिम समाज का कहना है कि आज तक किसी भी सरकार ने संभल का विकास नहीं किया. यहाँ रोजी- रोजगार का संकट है. रोजगार के लिए लोग पलायन कर रहे हैं. हिन्दू भी यहाँ से बेहतर अवसर की तलाश में गए हैं या जा रहे हैं. यहां कोई हिंदू मुस्लिम नहीं करता है. जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली बात है. सरकार अपने हिसाब से रिपोर्ट तैयार करवाई है.
संभल में लोगों को रोजी- रोजगार देने के बजाय हिंदू मुस्लिम कराया जा रहा है. ये सब सिर्फ राजनीति हो रही है. पॉलिटिकल स्टंट के अलावा इसमें कुछ नहीं है.
क्या कहते हैं संभल जामा मस्जिद के सद्र ?
रिपोर्ट में संभल से हिन्दुओं के पलायन के सवाल पर संभल जामा मस्जिद के सदर जफर अली कहते है, " इस बारे में मुझे अभी कोई जानकारी नहीं है. 1947 में क्या था, अब क्या हैं? अभी रिपोर्ट सार्वजनिक हुई नहीं है तो किस तरह से प्रतिक्रिया दी जा सकती है? 450 पेज की रिपोर्ट हैं पढ़ने में वक़्त लगेगा बिना पढ़े मैं क्या बोल सकता हूं? मेरे उपर भी आरोप लगा है. मैं खुद चार महिने जेल रह कर आया हूँ. मैंने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी है. मैं तो सभी लोगों से अनुरोध करता हूँ कि आपलोग सौहार्द से आपस में मिलजुल कर रहें."
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