)
Pakistan News: पाकिस्तान में मदरसे धार्मिक और सामाजिक जीवन का एक अहम हिस्सा बने हुए हैं, लेकिन हाल ही में एक रिपोर्ट में बताया गया है कि उन पर कट्टरपंथ और चरमपंथ को बढ़ावा देने का इल्जाम लग रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, मौलवियों के विरोध और सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण मदरसों को आधुनिक शिक्षा प्रणाली में शामिल नहीं किया जा सका है. इसका नतीजा यह हुआ है कि मदरसों से पढ़े हुए लोग आधुनिक दुनिया और समाज से अलग-थलग महसूस करते हैं और इसलिए वे चरमपंथी विचारधाराओं के प्रभाव में आसानी से आ जाते हैं.
'पाकिस्तान ऑब्ज़र्वर' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1947 में आज़ादी के बाद से लगातार सरकारों ने मदरसा शिक्षा में सुधार करके उसे मुख्यधारा प्रणाली में लाने और कट्टरपंथ में इसकी भूमिका को सीमित करने की कोशिश की है. हालांकि, हर कोशिश को मौलवियों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा, जिससे सफलता नहीं मिली.
रिपोर्ट में कहा गया है, "लड़ाकों को प्रेरित करने और धार्मिक शिक्षा को एक राजनीतिक हथियार में बदलने के लिए मदरसे के सिलेबस में जानबूझकर चरमपंथी विचारों को शामिल किया गया था. छात्रों को सिखाया जाता था कि धर्मत्याग और बहुदेववाद दुनिया भर में मौत की सज़ा के लायक हैं, जिससे उन्हें ऐसी सज़ाओं को लागू करने का धार्मिक अधिकार मिलता था. उन्होंने यह भी सीखा कि केवल मुसलमानों को ही शासन करने का अधिकार है, जिससे गैर-मुस्लिम सरकारें अवैध हो जाती हैं."
इसमें आगे कहा गया है, "इसके अलावा, मदरसों ने इस विश्वास को बढ़ावा दिया कि हर जगह मुसलमानों को एक ही इस्लामिक खिलाफत के तहत एकजुट होना चाहिए, जिससे स्वतंत्र मुस्लिम राष्ट्र-राज्य अस्वीकार्य हो जाते हैं. आधुनिक संप्रभु राष्ट्र-राज्य को बहुदेववाद के एक रूप के रूप में दिखाया गया जो इस्लाम के साथ मेल नहीं खाता. इन विचारों ने एक कठोर वैचारिक ढांचा तैयार किया जिसने उग्रवाद और बहुलवादी राजनीतिक प्रणालियों के प्रति असहिष्णुता को बढ़ावा दिया."
रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि मदरसा सुधार में एक मुख्य चुनौती वित्तीय निगरानी है. मदरसों की देखरेख प्रशासक (मुंतज़िम) करते हैं जो लगभग पूरी आज़ादी के साथ काम करते हैं, कोई बाहरी ऑडिट नहीं होता है और सभी खर्च मदरसे के प्रमुखों द्वारा अप्रूव किए जाते हैं.
रिपोर्ट में बताया गया है, "असफल सुधार प्रयासों का लगातार जारी रहना गहरे सामाजिक, राजनीतिक और संस्थागत कारकों में निहित है. मौलवियों का विरोध इस मुद्दे के मूल में है. धार्मिक नेता सुधार प्रस्तावों को अपने अधिकार, प्रभाव और पहचान के लिए सीधे खतरे के रूप में देखते हैं. राजनीतिक स्वार्थ इस समस्या को और बढ़ा देता है. लगातार सरकारों ने वैधता और समर्थन के लिए मौलवियों पर भरोसा किया है, जिससे वे सीधे धार्मिक संस्थानों को चुनौती देने को तैयार नहीं हैं."
इसमें कहा गया है, “इसके अलावा, सरकार का रवैया भी एक जैसा नहीं रहा है. आतंकवादी हमलों या इंटरनेशनल दबाव जैसे संकटों के दौरान सुधार के प्रयास तेज़ होते हैं, लेकिन जैसे ही फौरी ज़रूरत खत्म होती है, उन्हें छोड़ दिया जाता है. इस रुक-रुक कर चलने वाले पैटर्न ने लंबे समय तक चलने वाले बदलाव को रोक दिया है, जिससे मदरसा सेक्टर कट्टरपंथी असर के लिए कमज़ोर हो गया है.”