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Muslim Boycott Campaign: दक्षिण पंथी हिंदू संगठनों ने देश में मुसलमानों के खिलाफ आर्थिक बहिष्कार की मुहिम शुरू कर दी है. इसी का नतीजा है कि कभी फल जिहाद, थूक जिहाद, मूत्र जिहाद, तो कभी जीन्स जिहाद के रूप में मुसलमान कारोबारियों का बहिष्कार करने की अपील की जा रही है. ताजा मामला मथुरा का है, जहाँ मुसलामन दर्जियों के बहिष्कार का मामला सामने आया है. मथुरा के फलाहारी बाबा ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से अपील की है कि वो ऐसा आदेश जारी करें जिससे कृष्ण जन्माष्टमी पर सिर्फ सनातनी हिंदू कारीगरों द्वारा बनाई गई पोशाकें ही खरीदी जाए. हिन्दू भगवान आखिर किसी मुसलमान का सिला हुआ पोशाक कैसे पहन सकते हैं ?
फलाहारी बाबा के इस अपील से मथुरा में राधा- रानी का पोशाक सिलने वाले सैकड़ों मुस्लिम कारीगरों पर रोजगार का संकट पैदा हो सकता है. पहले से ही उत्तर प्रदेश के संभल और दिल्ली के खयाला में 'जीन्स जिहाद' के नाम पर मुसलमानों के कारोबार का बहिष्कार झेल रहे इस समाज के रोजगार पर दोहरी मार पड़ सकती है.
दरअसल, मुस्लिम कारोबारियों और कारीगरों के बहिष्कार का ये एक आजमाया फोर्मुला बन गया है. किसी एक की गलती को पूरे समाज की गलती बताकर उसे प्रचारित करना और फिर उसे पूरे समूह का बहिष्कार करना इसमें शामिल है. इसकी शुरुआत सबसे पहले दिल्ली से हुई थी. दिल्ली सरकार के मौजूदा पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा ने हिंदू इकोसिस्टम से एक ग्रुप बनाया था. इस व्यवस्था के तहत देशभर में मुसलमानों के खिलाफ नफरत के बीज बोए गए. अब नफरत के ये बीज गांवों के कोने-कोने तक पहुंच गए हैं. इस मुहिम के तहत मुसलमानों का आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह का बहिष्कार शामिल है.
नया विवाद क्या है ?
दरअसल, मथुरा में श्री कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर श्रृंगार पोशाक का बड़े पैमाने पर कारोबार किया जाता है. इस पोशाक के निर्माण का कारोबार करोड़ों रुपये का होता है. दुनियाभर से अकीदतमंद मथुरा में राधा-कृष्ण, बाल गोपाल और झांकियों के लिए विशेष पोशाकें खरीदने आते हैं. इन पोशाकों को मुस्लिम कारीगर महीनों पहले से जरी, गोटा, मोती और रंगीन धागों से बड़ी मेहनत से तैयार करते हैं लेकिन इस साल कृष्ण जन्मभूमि-मस्जिद मामले में याचिकाकर्ता दिनेश फलाहारी ने सीएम योगी आदित्यनाथ और लोगों से अपील की है कि वह राधा-कृष्ण, बाल गोपाल और झांकियों के लिए विशेष पोशाकें मुसमलानों से न खरीदें. उन्होंने कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर सिर्फ सनातनी हिंदू कारीगरों द्वारा बनाई गई पोशाकें ही खरीदने की गुजारिश की है.
इससे पहले ब्रज में होली के मौके पर भी दिनेश फलाहारी ने विवाद खड़ा किया था. उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर मुस्लिम समुदाय के लोगों को होली कार्यक्रमों में एंट्री न देने की मांग की थी. इस बयान ने स्थानीय स्तर पर तनाव बढ़ा दिया था. कई सामाजिक और राजनीतिक नेताओं ने इसे भेदभाव फैलाने वाला कदम बताया है.

महाकुंभ में भी हो चुका है मुसलमानों का बहिष्कार
वहीं, महाकुंभ के दौरान मुस्लिम समुदाय के लोगों की एंट्री रोकने और उन्हें दुकानें न लगाने देने के लिए एक अभियान भी चलाया गया था. यह अभियान हिंदू संगठनों और कई बड़े धर्मगुरुओं ने भी चलाया था. सोशल मीडिया पर इस अभियान का खूब प्रचार-प्रसार किया गया. कुंभ के दौरान साधुओं का एक समूह यह जांच कर रहा था कि कहीं मुस्लिम समुदाय के लोगों ने दुकानें तो नहीं लगाईं और कुंभ मेले में कोई मुस्लिम तो नहीं घुसा है ?
कांवड़ के दौरान मुसलमानों का बहिष्कार
पिछले दो सालों से कांवड़ यात्रा के दौरान मुस्लिम व्यापारियों और दुकानदारों का आर्थिक बहिष्कार करने के लिए एक अभियान चलाया गया, जिसमें दुकानों पर नेमप्लेट या बोर्ड लगाना भी शामिल था. इस अभियान का मकसद ग्राहकों को दुकानदार के नाम से पहचानना और यह तय करना था कि उन्हें कहां से खरीदारी करनी है. इस तरह के संदेश सोशल मीडिया और व्हाट्सएप ग्रुपों के ज़रिए फैलाए गए ताकि यह विचार लोगों तक व्यापक रूप से पहुंचे. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा करने पर रोक लगाने का हुक्म दिया था, लेकिन इसके बावजूद धर्म और नाम के आधार पर मुस्लिम कारोबारियों से ये भेदभाव लगातार जारी है.
यहां तक कि अब किसी भी त्योहार में मुसलमानों के एंट्री पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठ रही है. छठ पूजा हो या दिवाली, हर त्योहार पर हिंदू संगठन और हिंदू समाज के लोग यह मांग करने लगते हैं कि कोई भी मुसलमान त्योहार में शामिल न हो. साथ ही, हिंदू समाज के लोग मुसलमानों की पहचान के लिए खड़े हो जाते हैं और अगर उन्हें कोई मुसलमान दिखता है, तो उसकी पिटाई कर देते हैं. पिछले साल भी डांडिया नाइट्स के दौरान हंगामा हुआ था. एक मुस्लिम व्यक्ति अपने दोस्त के साथ डांडिया नाइट्स देखने गया था, लेकिन हिंदू संगठनों के लोगों ने उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया था.
क्या है हिंदू इकोसिस्टम
हिंदू इकोसिस्टम की शुरुआत 2020 में दिल्ली सरकार के पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा ने की थी. इसके तहत 16 नवंबर 2020 को उन्होंने एक्स (ट्विटर) पर एक मुहिम शुरू कर लोगों से गूगल फॉर्म भरवाया. इस फॉर्म का मकसद एक संगठित ग्रुप तैयार करना था, जो देशभर के गांवों तक मुसलमानों के बहिष्कार का संदेश पहुंचाए. यह अभियान ऑनलाइन नेटवर्किंग और सोशल मीडिया के जरिए फैलाया गया, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसमें जुड़ें और इस विचारधारा को आगे बढ़ाएं. इस काम के लिए लाखों व्हाट्सएप ग्रुप बन चुके हैं, जिसमें डॉक्टर, इंजिनियर, वकील, पत्रकार, शिक्षक, प्रोफेसर, स्टूडेंट्स, कारोबारी जैसे पढ़े लिखे लोग भी मुसलमानों से कोई सामान न खरीदने की अपील करते हैं.

कैसे काम करता है हिंदू इकोसिस्टम
इस हिंदू इकोसिस्टम के तहत, हर गांव में यह संदेश दिया गया कि हर हिंदू को हिंदू दुकानों से ही सामान खरीदना चाहिए और मुसलमानों को किसी भी त्योहार, शादी या किसी भी अवसर में शामिल नहीं करना चाहिए. इसके साथ ही हिंदुओं के मन में डर पैदा किया गया और कई फर्जी खबरें फैलाई गईं. यह काम सोशल मीडिया के साथ-साथ व्हाट्सएप और टेलीग्राम पर भी अभियान चलाकर किया गया.
साल 2020 के दंगों के दौरान इस अभियान को बहुत तेजी से बढ़ावा दिया गया और मुसलमानों को समाज में खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया गया. कोविड 2020 के दौरान यह अभियान ज्यादा चलाया गया। इस अभियान में मुसलमानों को बदनाम करने के लिए कहा गया कि मुसलमान ही कोविड फैला रहे हैं. इस तरह यह संदेश गांवों तक पहुंचाया गया. इसका नतीजा यह हुआ कि आज मुसलमानों का हर तरह से बहिष्कार किया जा रहा है.
दिखने लगा है इसका असर
इस तरह की अपील का साफ़ असर अब दिखने लगा है. इसी का नतीजा है कि हिन्दू मोहल्ले और गाँव में मुस्लिम फेरीवाले को प्रवेश करने से रोकने और उनके साथ मारपीट करने की ख़बरें आती रहती है.. हिन्दू- मुस्लिम मिक्स आबादी या हिन्दू बहुल इलाकों में कारोबार करने वाले मुस्लिम कारोबारी बताते हैं कि उनके व्यपार में 30 से 60- 70 फीसदी की गिरावट हुई है.. ग्राहक कम हो गए हैं.. माल की बिक्री कम हो गई है.
दिल्ली के जैतपुर इलाके में महीना भर पहले राशन स्टोर खोलने वाले अन्सा हक़ कहते हैं, "पहले मेरी दुकान दिल्ली के आया नगर में थी. रोज़ का औसत 1.5 लाख की बिक्री थी, जो कुछ माह से घटकर रोजाना- 20 से 30 हज़ार पर आ गयी थी. इस वजह से दुकान का किराया, स्टाफ का खर्चा और खुद का खर्चा निकलना मुश्किल हो रहा था. इस वजह से इस इलाके में आकर दुकान खोलनी पड़ी."
सेल कम क्यों हुआ?
इस सवाल पर अन्सा हक़ ने बताया कि ये व्हाट्सएप ग्रुप की वजह से कम हुआ है, जिसमें मुल्लों से सामान न खरीदने की अपील की जाती है. क्या जैतपुर में ये समस्या नहीं होगी ? इस सवाल पर अन्सा हक़ हंस कर बोलते हैं, अल्लाह बेहतर जाने. जैतपुर हिन्दू- मुस्लिम मिक्स आबादी वाला एक इलाका है. अन्सा हक़ जैसे लाखों मुस्लिम कारोबारी इस उत्तर भारत में मिल जाएंगे, जो इस आर्थिक बहिष्कार की मार झेल रहे हैं.
मुस्लिम कैब वालों के साथ किया जा रहा आर्थिक बहिष्कार
ये आर्थिक बहिष्कार की मार मुस्लिम कारोबारी के साथ मुस्लिम ऑटो ड्राईवर, कैब चालक, इलेक्ट्रीशियन, AC टेकनेशियन, घरेलु सहायक आदि भी झेल रहे हैं. उन्हें काम देना या उनसे काम लेना बहुत से हिन्दू अब पसंद नहीं करते हैं. ऐसा कई बार हुआ जब मुस्लिम कैब चालक की बुकिंग उसका नाम देखने के बाद रद्द कर दिया है.
कैब चालक, राशिद अहमद कहते हैं, "कई बार लोग नाम देखते ही कोई और बहाना बनाकर कैब बुक नहीं करते हैं. लेकिन इसकी असल वजह पता होती है." लक्ष्मी नगर में रहने वाले इलेक्ट्रीशियन मोहम्मद मुजम्मिल कहते हैं, "अब उन्हें हिन्दू घरों से पहले से कम बुलावा आता है. लोग पहले की तरह अब उनपर भरोसा नहीं करते हैं."
मुस्लिम कारीगर ने क्या कहा?
उधर मथुरा में दिनेश फलाहारी की अपील पर मुस्लिम कारीगर रियाज कहते हैं, "हम दशकों से मथुरा की संस्कृति का हिस्सा हैं और यह बयान उनकी रोज़ी-रोटी पर हमला है. इस तरह के बयान समाज में नफरत फैलाने की कोशिश है. प्रशासन को ऐसे तत्वों पर कार्रवाई करनी चाहिए. मथुरा हमेशा से शांति और एकता का प्रतीक रही है और इसे वैसा ही बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है."
सबसे बड़ा सवाल
रियाज, अन्सा हक़, मुजम्मिल और राशिद जैसे लोग क्या सोचते हैं इस बात की कोई अहमियत नहीं है, बड़ा सवाल ये है कि हिन्दू समाज का बहुसंख्यक तबका इस समस्या को लेकर क्या सोचता है? सवाल ये भी है कि क्या अगर रोजी- रोज़गार में धर्म के आधार पर इस तरह का भेदभाव बढ़ा तो ये देश और समाज की एकता और अखंडता को बरकरार रख पायेग या उसे छिन्न-भिन्न कर देगा?