Assam assembly election 2026: असम में विधानसभा की वोटिंग से ठीक पहले जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने अपने असम चैप्टर के सद्र और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक के प्रमुख मौलाना बदरुद्दीन अजमल के उस फैसले पर सवाल उठा दिया है, जिसमें उन्होंने ओवैसी की पार्टी AIMIM के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ रहे हैं. जमियत ने 24 घंटे में अजमल से इस पर जवाब मंगा था लेकिन 48 घंटे गुज़र जाने के बाद भी अजमल ने इसपर कोई जवाब नहीं दिया है, जिससे साफ़ जाहिर हो गया है कि बदरुद्दीन अजमल का स्टैंड क्या है?
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नई दिल्ली: असम में विधानसभा चुनाव के वोटिंग में सिर्फ 2 दिन शेष रह गए हैं, लेकिन इसके ठीक पहले मौलाना बदरुद्दीन अजमल AIMIM सद्र ओवैसी से गठबंधन और चुनाव प्रचार कराकर फंस गए हैं. जमीयत उलेमा-ए-हिंद के नोटिस को 48 घंटे बीत चुके हैं, लेकिन मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने कोई जवाब नहीं दिया, जबकि जवाब के लिए उन्हें सिर्फ 24 घंटे का वक़्त दिया गया था. इसके बावजूद अजमल की तरफ से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. इससे ये साफ़ हो गया है कि अजमल अब जमीयत उलेमा-ए-हिंद से ज्यादा असम में अपने सियासी भविष्य की चिंता कर रहे हैं. अजमल ऐसा तब कर रहे हैं जब उन्हें पता है कि इस बात के लिए उन्हें जमीयत उलेमा-ए-हिंद की तरफ से नुक्सान उठाना पड़ सकता है.
गौरतलब है कि असम में मौलाना बदरुद्दीन अजमल की ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट 30 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. यहाँ ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का मुकाबला कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों से हैं. पार्टी ने वर्तमान में 15 सीटों के साथ असम विधानसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है.असम में AIDUF के गढ़ में कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव से पार्टी चिंतित है.
AIDUF के सामने कांग्रेस और भाजपा के अलावा राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल भी थोड़ी बहुत चुनौती पेश कर सकती है.असम के मुस्लिम बहुल इलाकों में 12 विधानसभा सीटों पर उलेमा काउंसिल भी चुनाव लड़ रही है.
इसमें ख़ास बात ये है कि महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में मुस्लिम कयादत के नाम पर मुस्लिम बहुल सीटों पर चुनाव लड़ने वाली AIMIM 40 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले राज्य में खुद चुनाव लड़ने के बजाए वहां मौलाना बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को अपना समर्थन दे रही है. AIMIM के सद्र और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी असम में मौलाना बदरुद्दीन अजमल की पार्टी की हिमायत में चुनाव प्रचार कर रहे हैं. मौलाना बदरुद्दीन अजमल के साथ कैम्पेनिंग कर रहे हैं?
और यही ओवैसी बंगाल में ममता बनर्जी के सत्तारूढ़ दल TMC, कांग्रेस और भाजपा के खिलाफ लड़ने वाले और बंगाल में बाबरी मस्जिद की नीव रखने वाले TMC के बागी नेता हुमायु कबीर के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रहे हैं. बंगाल में ओवैसी ने 12 सीटों पर अपने उमीदवार उतारे हैं जबकि हुमायूं कबीर ने लगभग 180 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है.
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के सद्र महमूद मदनी ने असम में AIDUF के ओवैसी के साथ गठबंधन पर AIDUF के चीफ मौलाना बदरुद्दीन अजमल को तलब कर लिए है. जमीयत ने कहा है कि मौलाना बदरुद्दीन अजमल का ये कदम जमियत के सिद्धांतों के खिलाफ है. जमियत ओवैसी को देश में साम्प्रदायिक चेहरा मानते हैं. उसका मानना है की ओवैसी भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए काम करते हैं. वो मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करते हैं, और उसकी प्रतिक्रिया में हिन्दू वोट भाजपा के पक्ष में एकजुट हो जाता है. जमियत मानता है कि देश में मुसलमानों का हिट किसी मुस्लिम पार्टी में नहीं बल्कि सेक्युलर दलों के साथ ज्यादा सुरक्षित है.
यही वजह है कि जमियत पर कांग्रेसी होने का इलज़ाम भी लगता रहा है, लेकिन जब से केंद्र में मोदी सरकार है. जमियत मोदी सरकार की नीतियों का भी समर्थन करने लगी है. यहाँ तक कि कुछ लोग जमियत को भी भी संदेह की नजरों से सरकार के एक भोंपू संगठन के तौर पर देखने लगे हैं. लेकिन ये भी बड़ा सच है कि देश में अभी भी मुसलमानों के बीच जितना जमियत और महमूद मदनी की स्वीकार्यता है, उतना ओवैसी को नहीं है. लेकिन ओवैसी की बढ़ रही लोकप्रियता किसी के लिए भी खतरे या जलन की वजह बन सकती है!
मौलाना बदरुद्दीन अजमल जमीयत उलेमा-ए-हिंद के असम राज्य के प्रांतीय परिषद् के सद्र है. वो दारुल उलूम देवबंद की मजलिश-ए-शूरा के भी सदस्य हैं. मौलाना बदरुद्दीन अजमल जमीयत देवबंद मदरसे के विद्यार्थी भी रह चुके हैं, और वो जमियत के कद्दावर नेता होने के साथ ही मदनी परिवार के लम्बे अरसे से ख़ास रहे हैं. वो ऐसे व्यक्ति हैं, जो भतीजे वाले यानी महमूद मदनी की जमीयत उलेमा-ए-हिंद के पदाधिकारी होते हुए अरशद मदनी के भी बेहद करीब है.
मदनी परिवार देश का एक सम्मानित परिवार रहा है, आज़ादी की लड़ाई में उनके परिवार का अमूल्य योगदान रहा है. देश में जमीयत उलेमा-ए-हिंद की भूमिका भी सराहनीय रही है. इस संगठन ने हमेशा देश में साम्प्रदायिक और विभाजन की राजनीति का विरोध किया है. धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सद्भाव के लिए काम किया है. जमियत शुरू से ही ओवैसी की राजनीति को संदेह की नजरों से देखता है. इसलिए जब मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने ओवैसी की पार्टी से गटबंधन किया तो जमियत बिफर गई.
हालांकि, मौलाना बदरुद्दीन अजमल की भी अपनी मजबूरी है, वो बिहार में ओवैसी की पार्टी AIMIM के नतीजे देखकर उससे सबक ले चुके थे, इसलिए बिना किसी रिस्क के उन्होंने AIMIM का सपोर्ट ले लिया होगा. लेकिन अब ये देखना दिलचस्प होगा कि मौलाना बदरुद्दीन अजमल अपने धार्मिक और सामाजिक पहचान के साथ जमियत को ज्यादा महत्व देते हैं या असम में AIDUF की डूबती नाव और साख को बचाने के लिए अपने सियासी फैसले पर अटल रहते हैं.
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