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Mehshar Afridi Poetry: महशर अफ्रीदी का असली नाम सफदर आजम था. वह 15 जनवरी को उत्तराखंड के रुड़की में पैदा हुए. उन्होंने 10 साल की उम्र से ही शायरी पढ़नी शुरू की. उन्होंने बचपन से उर्दू पढ़ी जिसकी वजह से उन्हें उर्दू शायरी से लगाव हो गया. इसके बाद वह मशहूर शायर बने.
तेरे होंठों के तबस्सुम का तलबगार हूँ मैं
अपने ग़म बेच दे रद्दी का ख़रीदार हूँ मैं
ये शोहरतें नए दुश्मन बहुत बनाती हैं
सँभल के रहना तुम्हारी हवा ज़ियादा है
हर एक चेहरा नज़र से चखा हुआ देखा
हर इक नज़र से अछूता शबाब या'नी तू
ये अश्क दिल पे गिरें तो बहुत चमकता है
कभी ये आइना तेज़ाब से निखार के देख
हर एक साँस रगड़ खा रही है सीने में
और आप कहते हैं आहों पे और काम करूँ
अना का बोझ कभी जिस्म से उतार के देख
मुझे ज़बाँ से नहीं रूह से पुकार के देख
ग़नीमत है परिंदे मेरी तन्हाई समझते हैं
अगर ये भी न हों तो घर के वीराने से मर जाऊँ
मेरी हालत पे तकब्बुर नहीं अफ़्सोस भी कर
तेरा आशिक़ नहीं जानाँ तिरा बीमार हूँ मैं
तू मिरे लम्स की तासीर से वाक़िफ़ ही नहीं
तुझ को छू लूँ तो तिरे जिस्म का हिस्सा हो जाऊँ
ज़मीं पर घर बनाया है मगर जन्नत में रहते हैं
हमारी ख़ुश-नसीबी है कि हम भारत में रहते हैं
तुम उस को देख कर छू कर भी ज़िंदा लौट आए हो
मैं उस को ख़्वाब में देखूँ तो हैरानी से मर जाऊँ
मैं तुझ को पा कर ही मुतमइन हूँ अब और कोई तलब नहीं है
जो आज तक था नसीब से वो मुतालबा ख़त्म हो गया है