Moving hand over back and head of minor girl without sexual intent does not amount to outraging modesty: बंबई हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने एक निचली अदालत के सजा के फैसले को पलटते हुए कहा कि बिना गलत इरादे से पीठ और सिर पर हाथ फेरने से अवयस्क लड़की की लज्जा भंग नहीं होती है.
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मुंबईः बंबई हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने 28 वर्षीय एक शख्स की दोषसिद्धी को रद्द करते हुए कहा है कि बिना किसी गलत नीयत के किसी नाबालिग लड़की की पीठ और सिर पर सिर्फ हाथ फेर देने से उसकी लज्जा भंग नहीं होती है.
न्यायमूर्ति भारती डांगरे की सिंगल बेंच ने दोषसिद्धी को रद्द करते हुए कहा कि ऐसा नहीं लग रहा है कि कसूरवार शख्स का कोई गलत इरादा था. उसकी बातों से लगता है कि वह पीड़िता को एक बच्ची के तौर पर ही देख रहा था. न्यायाधीश ने कहा, ‘‘किसी स्त्री की लज्जा भंग करने के लिए, किसी का उसकी लज्जा भंग करने की मंशा रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है’’ 12-13 साल की पीड़िता ने भी किसी गलत इरादे का जिक्र नहीं किया था. उसने कहा कि उसे कुछ गलत हरकतों की वजह से असहज महसूस हुआ था.’’ अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि अपीलकर्ता की मंशा लड़की की लज्जा भंग करने की थी.
निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में दी थी चुनौती
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, 15 मार्च 2012 को अपीलकर्ता 18 साल का था और वह कुछ दस्तावेज देने लड़की के घर गया था. लड़की उस वक्त अपने घर में अकेली थी. उसने लड़की के सिर और पीठ पर हाथ फेरा जिससे वह घबराकर मदद के लिए चिल्लाने लगी. निचली अदालत द्वारा मामले में दोषी ठहराने और छह महीने की सजा सुनाने के बाद मुजरिम ने हाईकोर्ट का रुख किया था. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि निचली अदालत का फैसला सही नहीं था और पहली नजर में ऐसा लगता है कि शख्स ने बिना किसी गलत इरादे के, बिना सोचे समझे वह आचरण किया था.
यह मामला 2012 का है, जब 18 साल के शख्स पर 12 साल की एक लड़की की लज्जा भंग करने के इल्जाम में मामला दर्ज किया गया था. पीड़िता के मुताबिक, मुल्जिम ने उसकी पीठ और सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था कि वह बड़ी हो गई है. अदालत ने 10 फरवरी को मामले में फैसला सुनाया, जिसकी प्रति 13 मार्च को उपलब्ध कराई गई थी.
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