मुहर्रम इस्लाम के मानने वालों के लिए ग़म का महीना होता हैं क्योकिं तकरीबन 1400 साल पहले मुहर्रम के महीने में ही कर्बला की जंग हुई थी, जिसकी दास्तान सुनकर ही रूह कांप उठती है.
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नई दिल्ली: माहे मुहर्रम का चांद नज़र आ गया है. कल यानी 21 अगस्त को मुहर्रम की पहली तारीख़ होगी. इस्लामिक कैलेंडर के लिहाज़ से मुहर्रम साल का पहला महीना होता है. इसे साल-ए-हिजरत भी कहा जाता है.
मुहर्रम इस्लाम के मानने वालों के लिए ग़म का महीना होता हैं क्योकिं तकरीबन 1400 साल पहले मुहर्रम के महीने में ही कर्बला की जंग हुई थी, जिसकी दास्तान सुनकर ही रूह कांप उठती है. ये लड़ाई बातिल के खिलाफ इंसाफ के लिए लड़ी गई. जिसमें अहल-ए-बैत ने अपनी जान को कुर्बान कर इस्लाम को बचाया था. इस जंग में इमाम हुसैन के साथ उनके 72 साथियों की शहादत हुई थी. जिनके गम में लोग आज भी मातम करते है.
इस बार मुहर्रम पर दिखेगा कोरोना का असर
मौजूदा दौर में कोरोना के बढ़ते हुए मामलों का असर इस बार मुहर्रम पर भी नज़र आ रहा है. इस बार एक साथ इकट्ठा होकर मजलिसें करने पर पाबंदी है. वहीं भीड़ में मातम और ताज़िया निकालने पर भी पाबंदी लगाई गई है. हुकूमत की जानिब से इसे लेकर बाकायदा गाइडलाइन जारी की गई है. शिया तबके के उलेमाओं ने भी लोगों से दरखास्त की है कि वो गाइडलाइन पर अमल करें.
10 मुहर्रम रोज-ए-आशुरा:
यूं तो मुहर्रम का पूरा महीना ही बहुत मुकदद्स और गम का महीना होता है लेकिन मुहर्रम का 10वां दिन जिसे रोज-ए आशुरा भी कहते हैं. सबसे अहम दिन होता है. 1400 साल पहले मुहर्रम के महीने की 10 तारीख को ही इमाम हुसैन की शहीदत हुई थी. उसी गम में मुहर्रम की 10 तारीख को ताजिए निकाले जाते हैं.
शिया तबके के लोग मातम करते हैं. मजलिस पढ़ते हैं, काले रंग के कपड़े पहनकर गम का इज़हार करते हैं. यहां तक की शिया तबके के लोग मुहर्रम की 10 तारीख को भूखे प्यासे रहते हैं, क्योंकि इमाम हुसैन और उनके काफिले के लोगों को भी भूखा रखा गया था और भूख की हालत में ही उनको शहीद किया गया था. जबकि सुन्नी तबके के लोग रोजा-नमाज करके अपना इज़हारे गम करते हैं.